सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: क्या देशभर में लापता बच्चों के पीछे कोई संगठित गिरोह है? केंद्र सरकार से मांगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के लापता होने की बढ़ती घटनाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई और केंद्र सरकार से पूछा कि क्या इसके पीछे कोई अखिल भारतीय नेटवर्क या राज्य-विशिष्ट संगठित गिरोह सक्रिय है। अदालत ने सभी राज्यों से डेटा एकत्र करने का निर्देश देते हुए चेतावनी दी कि सहयोग नहीं करने वाले राज्यों पर सख्त आदेश दिए जा सकते हैं।

यह मामला गुरिया स्वयं सेवा संस्थान नामक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें कई राज्यों में बच्चों के लापता होने और अब तक न मिलने के मामलों को उजागर किया गया था। याचिका में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में दर्ज पांच मामलों का हवाला दिया गया, जिनमें नाबालिग लड़के-लड़कियों को अगवा कर बिचौलियों के नेटवर्क के जरिए झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भेजा गया।

इससे पहले 9 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह बीते छह वर्षों के लापता बच्चों का राष्ट्रीय आंकड़ा प्रस्तुत करे और गृह मंत्रालय में एक समर्पित अधिकारी की नियुक्ति करे, जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय स्थापित कर डेटा संकलित करने में सहायता करे।

न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान केंद्र से स्पष्ट सवाल किया:

“हम यह जानना चाहते हैं कि बच्चों के गायब होने की इन घटनाओं के पीछे कोई राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क है या कोई राज्य-विशिष्ट गिरोह? क्या यह एक पैटर्न है या केवल संयोग?”

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अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि जिन बच्चों को बचाया गया है, उनसे पूछताछ की जानी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि उनके गायब होने के लिए कौन जिम्मेदार है।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि कुछ राज्यों ने लापता बच्चों और अभियोजन संबंधी आंकड़े साझा किए हैं, लेकिन करीब एक दर्जन राज्य अब तक जानकारी नहीं दे पाए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक सभी राज्यों से आंकड़े नहीं मिलते, कोई ठोस विश्लेषण करना संभव नहीं है।

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पीठ ने आंकड़े नहीं भेजने वाले राज्यों पर नाराजगी जताई और कहा कि यदि आवश्यक हुआ तो कड़े आदेश दिए जाएंगे:

“जरूरत पड़ी तो हम सख्त आदेश पारित करेंगे।”

वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने केंद्र सरकार की पहल का समर्थन करते हुए सभी राज्यों को निर्देश देने की मांग की, ताकि वे समय पर आवश्यक जानकारी दे सकें।

  • 18 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने एक समाचार रिपोर्ट पर चिंता जताई थी जिसमें कहा गया था कि हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। अदालत ने इसे गंभीर मुद्दा बताया था और कहा था कि देश में दत्तक प्रक्रिया जटिल है, जिससे लोग अवैध रास्ते अपनाने को मजबूर होते हैं।
  • कोर्ट ने यह भी कहा था कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस एजेंसियों के बीच समन्वय की भारी कमी है।
  • अदालत ने एक केंद्रीय पोर्टल बनाने का सुझाव दिया था, जिसे गृह मंत्रालय के अधीन चलाया जाए और हर राज्य से एक समर्पित अधिकारी नियुक्त किया जाए, जो लापता बच्चों से जुड़ी शिकायतों की निगरानी और सूचनाओं का प्रसार करे।

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