इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर पति के रिश्तेदारों पर बिगैमी यानी दूसरी शादी के अपराध में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता कि उन्हें उस शादी की जानकारी थी। इसके लिए ऐसा प्रथम दृष्टया सबूत होना जरूरी है जिससे पता चले कि रिश्तेदारों ने दूसरी शादी कराने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, उसे आसान बनाया या इसके लिए प्रोत्साहित किया।
जस्टिस संदीप जैन ने इस मामले में धारा 482 CrPC के तहत दाखिल अर्जी को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए पति की मां और जेठानी को IPC की धारा 494 के तहत समन किए जाने का आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, पति राम प्रताप सिंह के खिलाफ बिगैमी के आरोप में समन बरकरार रखा गया। साथ ही आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत कार्यवाही भी जारी रहेगी।
हाईकोर्ट ने यह फैसला 11 अगस्त 2026 को सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला शकुंतला देवी की शिकायत से जुड़ा है। उनका कहना था कि 7 दिसंबर 1991 को हिंदू रीति-रिवाजों से उनकी शादी राम प्रताप सिंह से हुई थी।
शकुंतला के मुताबिक, शादी में उनके पिता ने अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार दहेज दिया था, लेकिन इसके बावजूद पति और ससुराल वाले संतुष्ट नहीं थे। आरोप था कि उनसे अतिरिक्त दहेज के रूप में 5,000 रुपये और एक स्कूटर की मांग की गई। इस मांग को पूरा नहीं करने पर उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज और धमकी दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि हालात ऐसे हो गए कि अपनी जान बचाने के लिए उन्हें ससुराल छोड़ना पड़ा।
शिकायत के मुताबिक, 28 मार्च 1997 को शकुंतला अपनी बड़ी बहन के साथ दोबारा ससुराल गईं ताकि वैवाहिक जीवन फिर से शुरू किया जा सके। आरोप है कि वहां दोनों के साथ मारपीट और गाली-गलौज हुई। इसी दौरान राम प्रताप सिंह ने कथित रूप से बताया कि उसने दूसरी शादी कर ली है।
इसके बाद 4 अप्रैल 1997 को IPC की धारा 494, 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत FIR दर्ज हुई।
जांच के बाद पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी। इसके खिलाफ शकुंतला ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की और आरोप लगाया कि राम प्रताप सिंह ने औरैया जिले के गांव ऊंचा निवासी पिंकी से दूसरी शादी की है। उन्होंने पुलिस जांच को भी निष्पक्ष नहीं बताया।
चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत के रूप में दर्ज किया। इसके बाद शकुंतला का बयान धारा 200 CrPC और गवाहों सरोज तथा मुन्नी देवी के बयान धारा 202 CrPC के तहत दर्ज किए गए। इन बयानों पर विचार करते हुए एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 3 मार्च 2003 को आरोपियों को संबंधित अपराधों में समन किया।
आरोपियों ने क्या दलील दी?
आरोपियों की ओर से कहा गया कि दहेज की मांग, क्रूरता और मारपीट के आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है।
धारा 494 IPC के आरोप को लेकर दलील दी गई कि राम प्रताप सिंह की पिंकी से दूसरी शादी साबित करने के लिए भी कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत मौजूद नहीं है। कहा गया कि बिगैमी का अपराध बनाने के लिए प्रथम दृष्टया ऐसा तथ्य होना चाहिए जिससे यह दिखे कि दूसरी शादी संबंधित पर्सनल लॉ के तहत जरूरी वैवाहिक रस्मों को पूरा करते हुए हुई थी। केवल दूसरी शादी का आरोप या सुनी-सुनाई बात इसके लिए पर्याप्त नहीं है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि समन के स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस चरण पर सबूतों का बारीकी से मूल्यांकन करके यह तय करना जरूरी नहीं है कि आखिरकार दोषसिद्धि होगी या नहीं।
राज्य ने कहा कि शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों में दहेज की मांग, मारपीट और क्रूरता के आरोप लगातार सामने आए हैं। साथ ही यह भी आरोप है कि पहली शादी कायम रहते राम प्रताप सिंह ने दूसरी शादी की।
दूसरी शादी की जानकारी होना भर पर्याप्त नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के S. Nitheen and Others v. State of Kerala and Others और Sivaraman Nair and Others v. State of Kerala and Another के फैसलों का उल्लेख किया।
इन फैसलों में तय सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों का केवल नाम ले देना पर्याप्त नहीं है। उनके खिलाफ ऐसे विशेष आरोप होने चाहिए जिनसे उनकी सक्रिय भूमिका सामने आए।
कोर्ट ने कहा कि ठोस सबूत या किसी खास भूमिका के बिना सामान्य और व्यापक आरोप आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकते। ऐसे मामलों में अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए ताकि निर्दोष परिजनों को बेवजह आपराधिक कार्यवाही का सामना न करना पड़े।
धारा 494 IPC को लेकर हाईकोर्ट ने कहा:
“दूसरी शादी की केवल जानकारी होना अपने आप में पति के अन्य परिजनों को पति द्वारा किए गए बिगैमी के अपराध में आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा तथ्य होना चाहिए जिससे पता चले कि संबंधित रिश्तेदारों ने दूसरी शादी को संपन्न कराने में सक्रिय रूप से भाग लिया, उसे आसान बनाया या इसके लिए प्रोत्साहित किया।
पति के रिश्तेदारों की कोई खास भूमिका नहीं बताई गई
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता शकुंतला और उनकी बड़ी बहन सरोज ने अपने बयानों में यह नहीं बताया कि राम प्रताप सिंह की कथित दूसरी शादी कराने में उसके रिश्तेदारों ने क्या भूमिका निभाई थी।
शकुंतला की मां मुन्नी देवी ने जरूर आरोप लगाया था कि ससुर दशरथ सिंह, सास फूलन देवी और जेठानी विमला देवी ने दूसरी शादी में सहयोग किया और साजिश रची। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि यह एक सामान्य आरोप था। यह नहीं बताया गया कि उन्होंने किस तरह दूसरी शादी कराने में सक्रिय रूप से सहायता की, उसे आसान बनाया या इसके लिए प्रोत्साहित किया।
कोर्ट ने कहा:
“यह भी स्पष्ट है कि उपरोक्त गवाहों ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष अपने बयानों में दूसरी शादी संपन्न कराने में पति के रिश्तेदारों की ओर से किसी प्रत्यक्ष कृत्य या चूक का आरोप नहीं लगाया है।”
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर माना कि ट्रायल कोर्ट ने पति के रिश्तेदारों को धारा 494 IPC के अपराध में समन करके गलती की।
दहेज उत्पीड़न और मारपीट के आरोपों में चलेगा मुकदमा
हालांकि, हाईकोर्ट ने बाकी आरोपों के मामले में राहत नहीं दी। कोर्ट ने पाया कि IPC की धारा 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत समन बरकरार रखने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सामग्री मौजूद है।
कोर्ट ने शिकायतकर्ता, उनकी बहन और मां के बयानों का उल्लेख किया, जिनमें 5,000 रुपये और स्कूटर की अतिरिक्त मांग के साथ मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अर्जी को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए सास फूलन देवी उर्फ भुरानी और जेठानी विमला को IPC की धारा 494 के तहत समन करने का 3 मार्च 2003 का आदेश रद्द कर दिया।
वहीं, पति राम प्रताप सिंह के खिलाफ धारा 494 IPC के तहत समन को बरकरार रखा गया। आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत समन में भी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया।
हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2008 का अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि फैसले की प्रमाणित प्रति पेश किए जाने की तारीख से मुकदमे को तेजी से आगे बढ़ाते हुए, जहां तक संभव हो, एक साल के भीतर पूरा किया जाए।
केस डिटेल्स
केस: राम प्रताप सिंह व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
केस नंबर: एप्लीकेशन अंडर सेक्शन 482 नंबर 14813/2008
बेंच: जस्टिस संदीप जैन
फैसले की तारीख: 11 अगस्त 2026

