₹54,000 करोड़ की डिजिटल धोखाधड़ी ‘डकैती के समान’: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को SOP व मुआवजा तंत्र बनाने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे “सीधी डकैती या लूट” करार दिया और कहा कि इस तरह से ₹54,000 करोड़ से अधिक की रकम देश से निकाल ली गई है। शीर्ष अदालत ने इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए व्यापक प्रणालीगत सुधार के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन वी अंजनिया की पीठ ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी से निकाली गई राशि कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि इन अपराधों के पीछे या तो बैंकों के अधिकारियों की मिलीभगत हो सकती है या गंभीर लापरवाही।

शीर्ष अदालत ने गृह मंत्रालय (MHA) को निर्देश दिया कि वह भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), बैंकों और दूरसंचार विभाग (DoT) जैसे हितधारकों से परामर्श कर एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करे ताकि डिजिटल धोखाधड़ी और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।

अदालत ने नोट किया कि RBI पहले ही एक SOP बना चुका है, जिसके तहत बैंकों को साइबर धोखाधड़ी की आशंका पर डेबिट कार्ड अस्थायी रूप से होल्ड करने का अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने MHA को निर्देश दिया कि वह RBI और DoT के SOP को ध्यान में रखते हुए एक मसौदा समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार करे और चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दाखिल करे।

इसके साथ ही अदालत ने RBI, DoT और अन्य एजेंसियों को एक संयुक्त बैठक बुलाने को कहा ताकि डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों के लिए मुआवजा तंत्र तैयार किया जा सके। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा देने के मामले में “व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण” अपनाया जाए।

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अदालत ने CBI को निर्देश दिया कि वह डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों की पहचान करे और जांच शुरू करे। विशेष रूप से दिल्ली और गुजरात सरकारों को कहा गया है कि वे CBI को जांच के लिए आवश्यक स्वीकृति प्रदान करें।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से कहा था कि वह डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए अमीकस क्यूरी द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करे। अदालत ने यह भी कहा था कि साइबर अपराधियों द्वारा देश से भारी मात्रा में धन निकाले जाने पर रोक जरूरी है।

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इससे पहले, 1 दिसंबर 2025 को अदालत ने CBI को देशभर में डिजिटल अरेस्ट मामलों की 統一 जांच (unified investigation) करने का निर्देश दिया था। साथ ही RBI से यह भी पूछा था कि वह साइबर अपराधियों के बैंक खातों को ट्रेस और फ्रीज़ करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट एक नया और तेजी से फैलता साइबर अपराध है जिसमें ठग पुलिस, अदालत या सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर ऑडियो या वीडियो कॉल के जरिए लोगों को धमकाते हैं और उन्हें पैसों के लिए मानसिक रूप से बंधक बना लेते हैं।

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कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है और संबंधित सभी एजेंसियों को अपनी अद्यतन स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

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