बॉम्बे हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में पुणे फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें अलग हो रहे एक दंपती की छह महीने की अनिवार्य ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि माफ करने की मांग ठुकरा दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति और पत्नी दोनों को ही वित्तीय समझौते से कोई आपत्ति नहीं है, तो अदालतों को अपनी ओर से वित्तीय मुद्दे उठाकर प्रक्रिया को नहीं अटकाना चाहिए।
7 सितंबर को फैसला सुनाते हुए जस्टिस शिवकुमार डिगे ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने ऐसे वित्तीय पहलुओं पर सवाल खड़े करके अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा लांघी, जिन पर दोनों पक्षों में से किसी ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। जस्टिस डिगे ने कहा कि यदि दोनों पक्ष आपसी रजामंदी से अलग होना चाहते हैं और पत्नी को वित्तीय निपटारे को लेकर कोई एतराज नहीं है, तो जज को अपनी ओर से ऐसा मुद्दा बनाकर अर्जी खारिज नहीं करनी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला देकर फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी अर्जी
यह मामला तब हाईकोर्ट पहुंचा जब अगस्त में पुणे फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B(2) के तहत छह महीने की प्रतीक्षा अवधि समाप्त करने की दंपती की साझा अर्जी नामंजूर कर दी थी।
फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ‘अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर’ मामले का हवाला दिया था, जिसमें वैधानिक प्रतीक्षा अवधि माफ करने की शर्तें तय की गई हैं। फैमिली कोर्ट का तर्क था कि उस नजीर की तीसरी शर्त के मुताबिक दोनों पक्षों के बीच स्थायी गुजारा भत्ते और बच्चों की कस्टडी से जुड़े सभी मसले पूरी तरह सुलझ जाने चाहिए। चूंकि पति ने अभी तक स्थायी गुजारा भत्ते की पूरी रकम नहीं चुकाई थी, इसलिए फैमिली कोर्ट ने इसे एक अनसुलझा वित्तीय विवाद मानते हुए छूट देने से इनकार कर दिया था।
डेढ़ साल से अलग रह रहे थे पति-पत्नी, मानसिक तनाव का दिया हवाला
इस मामले में पुणे के कोथरुड निवासी 51 वर्षीय पति और मुंबई में रहने वाली 44 वर्षीय पत्नी ने 2 जुलाई को पुणे फैमिली कोर्ट में तलाक की संयुक्त याचिका दायर की थी। दोनों अलग-अलग शहरों में अपनी नौकरी और करियर की जिम्मेदारियों के चलते 18 महीने से अधिक समय से अलग रह रहे थे।
याचिका में दंपती ने स्पष्ट किया था कि उनके बीच सुलह की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं और अब साथ रहना बिल्कुल संभव नहीं रह गया है। उन्होंने अदालत से छह महीने की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि से छूट देने की गुहार लगाई थी, ताकि अनावश्यक कानूनी देरी के कारण उनकी मानसिक और भावनात्मक परेशानी और न खिंचे।
अधिवक्ताओं ने फैसले का स्वागत किया, बताया व्यक्तिगत गरिमा की जीत
फैमिली कोर्ट से राहत न मिलने के बाद दंपती ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट में पति का पक्ष वकीलों की टीम ने रखा, जिसमें एडवोकेट मयूर सालुंके, अजिंक्य सालुंके, अमोल खोब्रागड़े और पल्लवी सालुंके शामिल थे।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए एडवोकेट मयूर सालुंके ने कहा कि यह निर्णय व्यक्तिगत गरिमा और त्वरित न्याय के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह फैसला साफ संदेश देता है कि वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं को आधुनिक वैवाहिक वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए।

