इंजीनियरिंग छात्र की मौत पर मुआवजा बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा: ‘छात्र की काल्पनिक आय को अकुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन के बराबर नहीं माना जा सकता’

सुप्रीम कोर्ट ने 12 मई, 2026 को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में साल 2000 में एक सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले 22 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे में भारी बढ़ोतरी की है। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने स्पष्ट किया कि इंजीनियरिंग डिग्री की पढ़ाई कर रहे छात्र की काल्पनिक आय (Notional Income) की तुलना किसी अकुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन से नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कुल मुआवजे की राशि को ₹13,44,000/- से बढ़ाकर ₹19,25,070/- कर दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह दुखद घटना 28 मई, 2000 की है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के छात्र करण पाल सिंह अपने एक सहपाठी के साथ मोटरसाइकिल से दिल्ली-मथुरा रोड पर कॉलेज जा रहे थे। जब वे कॉलेज की ओर मुड़ने के लिए सड़क के बीच के कट पर प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी दिल्ली की ओर से आ रहे एक ट्रक ने लापरवाही और तेज गति से मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। इलाज के दौरान सिंह ने दम तोड़ दिया।

होशियारपुर के मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (ट्रिब्यूनल) ने शुरुआत में ₹2,23,000/- का मुआवजा दिया था। इसके बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मृतक की काल्पनिक आय ₹6,000/- प्रति माह मानकर मुआवजे को बढ़ाकर ₹13,44,000/- कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने ‘फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स’ (भविष्य की संभावनाएं) देने से इनकार कर दिया था क्योंकि आय वास्तविक न होकर काल्पनिक थी। इस फैसले के खिलाफ मृतक की माता (अब उनकी बेटी के माध्यम से) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि मृतक एक मेधावी छात्र था, जिसने प्लास्टिक इंजीनियरिंग में फर्स्ट क्लास डिप्लोमा और ऑटो-कैड (AutoCAD) सर्टिफिकेट प्राप्त किया था। वह कंप्यूटर ट्रेनिंग देकर स्वतंत्र रूप से ₹4,000/- प्रति माह कमा भी रहा था। वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने आय का आकलन करने में गलती की और अरविंद कुमार मिश्रा बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस जैसे मामलों की अनदेखी करते हुए ‘फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स’ नहीं जोड़े।

वहीं, बीमा कंपनी (प्रतिवादी संख्या 3) ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि मृतक केवल एक छात्र था और उसकी कोई साबित आय नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि कंप्यूटर ट्रेनिंग से होने वाली आय के पर्याप्त सबूत नहीं हैं, इसलिए हाईकोर्ट का आकलन सही था।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एक युवा छात्र की क्षमता का सटीक आकलन करना “अत्यंत कठिन” है, लेकिन निचली अदालतों द्वारा तय की गई राशि अपर्याप्त है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इंजीनियरिंग छात्रों के पास पेशेवर क्षमता होती है जो अकुशल श्रम से कहीं अधिक है।

पीठ ने नवजोत सिंह बनाम हरप्रीत सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा:

“हम यह नहीं मानते कि एक प्रमुख संस्थान से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर रहे छात्र की काल्पनिक आय को अकुशल श्रमिक के लिए स्वीकार्य न्यूनतम मजदूरी के बराबर माना जाना चाहिए।”

अदालत ने गौर किया कि सिंह एक “शानदार शैक्षणिक भविष्य वाला मेधावी छात्र” था, जिसने पहले ही डिप्लोमा और पेशेवर प्रमाणपत्र हासिल कर लिए थे। इस आधार पर कोर्ट ने साल 2000 के मानकों के अनुसार उसकी मासिक काल्पनिक आय ₹12,000/- तय की।

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भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) को न जोड़ने के हाईकोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सरला वर्मा और प्रणय सेठी मामलों में निर्धारित सिद्धांतों के विपरीत है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि काल्पनिक आय में 40% भविष्य की संभावनाएं जोड़ी जानी चाहिए।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की गणना नए सिरे से इस प्रकार की:

  • आश्रय की हानि (Loss of Dependency): ₹18,14,400/- (₹12,000 आय + 40% फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स, 50% व्यक्तिगत खर्च कटौती और 18 के मल्टीप्लायर के आधार पर)।
  • पारंपरिक मदें (Conventional Heads): संपत्ति की हानि के लिए ₹15,000/-, मातृ-पितृ प्रेम (Consortium) की हानि के लिए ₹40,000/-, और अंतिम संस्कार के खर्च के लिए ₹30,000/- (शव को आगरा से पंजाब ले जाने के खर्च को देखते हुए)।
  • मोटरसाइकिल की क्षति: सर्वेयर की रिपोर्ट के आधार पर ₹25,670/-।
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कुल मुआवजा ₹19,25,070/- निर्धारित किया गया है। कोर्ट ने ब्याज दर को 7.5% प्रति वर्ष पर बरकरार रखा और प्रतिवादियों को आठ सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: मोहिंदर कौर (मृतक) एल.आर. के माध्यम से बनाम बृज लाल अरोड़ा और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ___ ऑफ 2026 (SLP (Civil) No. 580 of 2020 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस विजय बिश्नोई
  • दिनांक: 12 मई, 2026

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