सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा में भाषा के संवैधानिक महत्व पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राजस्थान सरकार को मातृभाषा आधारित शिक्षा के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक व्यापक नीति बनाने का निर्देश दिया है। राजस्थान हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश को रद्द करते हुए, अदालत ने स्पष्ट किया कि अपनी भाषा में समझने और समझाए जाने की क्षमता केवल सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह “अस्तित्व के अधिकारों” (existential rights) से जुड़ा मामला है।
मामले का संक्षिप्त विवरण
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील के रूप में आया था, जिसमें हाईकोर्ट ने तृतीय श्रेणी शिक्षकों (लेवल-I और लेवल-II) की भर्ती के पाठ्यक्रम में राजस्थानी भाषा को शामिल करने और इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि बुनियादी स्तर पर क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने में राज्य की निष्क्रियता संविधान के भाग III के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता पदम मेहता और एक अन्य ने राजस्थान हाईकोर्ट (जोधपुर) में जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा, 2021 (REET, 2021) के पाठ्यक्रम में राजस्थानी भाषा को शामिल किया जाए और बच्चों को उनकी स्थानीय भाषा या राजस्थानी में शिक्षा दी जाए।
27 नवंबर, 2024 को हाईकोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (writ of mandamus) तभी जारी किया जा सकता है जब याचिकाकर्ता कानूनी अधिकार सिद्ध करें और राज्य अधिकारियों की ओर से वैधानिक कर्तव्य निभाने में विफलता प्रदर्शित करें। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की दलीलें:
- राजस्थान में जहां हिंदी मुख्य आधिकारिक भाषा है, वहां राजस्थानी बोलने वाली जनसंख्या अनुच्छेद 350A के उद्देश्यों के लिए “भाषाई अल्पसंख्यक” के दायरे में आती है।
- मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) में निहित है।
- राज्य सरकार ने गुजराती, पंजाबी और सिंधी को पाठ्यक्रमों में शामिल किया है, लेकिन राजस्थानी को बाहर रखा है, जो “प्रतिकूल और अपमानजनक भेदभाव” है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 भी जटिल अवधारणाओं को समझाने के लिए गृह भाषा (home language) के उपयोग का समर्थन करती है।
प्रतिवादियों (राज्य सरकार) की दलीलें:
- वर्तमान में केवल उन्हीं भाषाओं में शिक्षा और भर्ती की जा रही है जो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। चूंकि राजस्थानी इसमें शामिल नहीं है, इसलिए इसके लिए कोई प्रशासनिक ढांचा मौजूद नहीं है।
- राजस्थान में राजस्थानी बोलने वाले भाषाई अल्पसंख्यक नहीं हैं।
- अनुच्छेद 350A केवल ‘निदेशात्मक’ (directory) प्रकृति का है और यह अनिवार्य कानूनी अधिकार पैदा नहीं करता।
- NEP, 2020 केवल एक कार्यकारी नीति है जिसका कोई वैधानिक बल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि REET-2021 की भर्ती प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन भाषा से जुड़े व्यापक संवैधानिक मुद्दे अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
भाषा के मूल तत्व पर
कोर्ट ने टिप्पणी की, “अपनी भाषा में समझने और समझाए जाने की क्षमता सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि अस्तित्व के अधिकारों का मामला है, क्योंकि समाज और दैनिक जीवन की गतिविधियों में सार्थक भागीदारी के लिए समझ का होना अनिवार्य है।”
संवैधानिक और वैधानिक अधिदेश
पीठ ने अनुच्छेद 19(1)(a), 21, 21A और 350A के अंतर्संबंधों पर जोर दिया। कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 29(2)(f) का उल्लेख किया, जो यह निर्देश देती है कि जहां तक व्यावहारिक हो, शिक्षा का माध्यम बच्चे की मातृभाषा होनी चाहिए।
कोर्ट ने ‘स्टेट ऑफ यूपी बनाम आनंद कुमार यादव’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि “शिक्षा का अधिकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार है।” इसके अलावा, ‘स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम एसोसिएटेड मैनेजमेंट ऑफ इंग्लिश मीडियम प्राइमरी एंड सेकेंडरी स्कूल्स’ मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बच्चे को अपनी पसंद की भाषा में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता है।
राज्य की निष्क्रियता की आलोचना
सुप्रीम कोर्ट ने आठवीं अनुसूची का हवाला देकर राजस्थानी को बाहर रखने के राज्य के तर्क को “संकीर्ण” और “पंडिताऊ दृष्टिकोण” (pedantic approach) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जब राजस्थानी पहले से ही कई विश्वविद्यालयों (जैसे जेएनवीयू जोधपुर, एमजीएसयू बीकानेर) में पढ़ाई जा रही है, तो यह कहना गलत है कि इसमें शैक्षणिक स्वीकार्यता की कमी है।
कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा, “नीति का अभाव एक कमी है जिसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है, न कि इसे मौजूदा निष्क्रियता के बचाव के आधार के रूप में पेश किया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और निम्नलिखित निर्देश दिए:
- नीति निर्माण: राजस्थान सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के आलोक में मातृभाषा आधारित शिक्षा के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक व्यापक नीति तैयार करे।
- मान्यता: राज्य राजस्थानी भाषा को शैक्षिक उद्देश्यों के लिए स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा के रूप में उचित दर्जा प्रदान करे।
- चरणबद्ध कार्यान्वयन: राज्य सभी स्कूलों (सरकारी और निजी) में राजस्थानी को एक विषय के रूप में पेश करने और प्राथमिक स्तर से इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने के लिए समयबद्ध कदम उठाए।
- अनुपालन: राजस्थान सरकार को 25 सितंबर, 2026 तक अनुपालन हलफनामा (compliance affidavit) दाखिल करना होगा।
इस मामले की अगली सुनवाई अनुपालन रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए 30 सितंबर, 2026 को होगी।
केस विवरण
- केस का नाम: पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील @ SLP (C) सं. 1425/2025
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
- दिनांक: 12 मई, 2026

