न्यायिक बुनियादी ढांचा सरकार की मेहरबानी नहीं, संवैधानिक आवश्यकता: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि अदालतों के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना सरकार की इच्छा या उसकी मेहरबानी पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जोधपुर स्थित अपनी प्रधान पीठ की इमारत की मरम्मत और पुनरुद्धार का काम तेजी से पूरा करने तथा अतिरिक्त कोर्टरूम के प्रस्ताव पर आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की डिवीजन बेंच ने हाईकोर्ट भवन की संरचनात्मक स्थिति को लेकर स्वतः संज्ञान से चल रही कार्यवाही के दौरान ये टिप्पणियां कीं। मामले में लगभग 21 मीटर ऊंचा ‘सेंट्रल डोम’ भी जांच के दायरे में है।

बेंच ने कहा कि न्यायपालिका संवैधानिक लोकतंत्र के तीन आवश्यक स्तंभों में से एक है और बुनियादी ढांचे तथा प्रशासनिक सुविधाओं के मामले में उसे किसी सामान्य सरकारी विभाग की तरह नहीं देखा जा सकता। न्याय का प्रशासन राज्य का एक आवश्यक संप्रभु और संवैधानिक कार्य है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना कार्यपालिका के विवेक, प्रशासनिक उदारता या सरकारी मेहरबानी का विषय नहीं है। यह न्याय तक प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों की सार्थक सुरक्षा से जुड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

वित्तीय कारणों से बुनियादी सुविधाओं को लगातार नहीं टाला जा सकता

हाईकोर्ट ने संसाधनों की उपलब्धता के सवाल पर कहा कि सार्वजनिक प्रशासन में वित्तीय पहलुओं का महत्व हो सकता है, लेकिन इन्हें न्यायिक कामकाज के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं को लगातार न देने या अपर्याप्त रखने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

बेंच ने स्पष्ट किया कि न्यायिक बुनियादी ढांचे को सरकार की ओर से अपने विवेक के आधार पर न्यायपालिका को दिया जाने वाला खर्च नहीं माना जा सकता। इसे न्याय व्यवस्था के सही ढंग से काम करने के लिए एक आवश्यक संवैधानिक जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए।

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हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा, स्वतंत्रता और प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए पर्याप्त वित्तीय, बुनियादी और प्रशासनिक संसाधन जरूरी हैं, ताकि अदालतें अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सकें और नागरिकों को समय पर सार्थक न्याय मिल सके।

बेंच ने ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन से संबंधित कार्यवाही सहित सुप्रीम कोर्ट की ओर से समय-समय पर न्यायपालिका के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे, बेहतर कार्य परिस्थितियों, आवासीय सुविधाओं, कोर्टरूम, कर्मचारियों और अन्य प्रशासनिक संसाधनों की आवश्यकता पर दिए गए जोर का भी उल्लेख किया।

IIT बॉम्बे की अंतिम रिपोर्ट में इमारत को मरम्मत योग्य बताया गया

हाईकोर्ट ने जोधपुर स्थित प्रधान पीठ की इमारत की स्थिति को लेकर 10 अगस्त को स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद 24 अगस्त को मामले की दोबारा सुनवाई हुई।

10 अगस्त को हाईकोर्ट ने IIT बॉम्बे की उस राय को रिकॉर्ड पर लिया था, जिसमें लगभग 21 मीटर ऊंचे ‘सेंट्रल डोम’ के कभी भी गिरने की आशंका जताई गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक इसकी स्थिति ऐसी थी कि परिसर में मौजूद लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता था।

राज्य सरकार ने 15 सितंबर को हाईकोर्ट को बताया कि IIT बॉम्बे की 3 सितंबर की अंतिम रिपोर्ट में भवन को मरम्मत योग्य पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सुझाए गए पुनरुद्धार कार्य को उचित तरीके और सामग्री से पूरा करने तथा बाद में सही रखरखाव किए जाने पर इमारत की शेष आयु कम से कम 20 वर्ष बढ़ाई जा सकती है।

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रिपोर्ट में भवन के करीब 40 प्रतिशत हिस्से पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत बताई गई है। बाकी हिस्से में भी मरम्मत और एहतियाती उपाय करने की आवश्यकता बताई गई है।

पुनरुद्धार कार्य तीन चरणों में प्रस्तावित है। इनमें क्रमशः 11,000 वर्ग मीटर, 12,000 वर्ग मीटर और 10,000 वर्ग मीटर क्षेत्र शामिल होगा। इसके अलावा 33,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में एहतियाती रखरखाव का काम किया जाएगा। पूरी प्रक्रिया को पूरा करने में लगभग 24 महीने लगने का अनुमान है।

पुनरुद्धार पर 117.65 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान

हाईकोर्ट भवन के पुनरुद्धार की कुल अनुमानित लागत 117.65 करोड़ रुपये है। पहले चरण के लिए 27.41 करोड़ रुपये और दूसरे चरण के लिए 30.24 करोड़ रुपये मंजूर किए जा चुके हैं। तीसरे चरण के लिए 60 करोड़ रुपये की मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है।

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि काम की निगरानी के लिए दो नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। अलग-अलग अंतराल पर निरीक्षण की जिम्मेदारी आठ अधिकारियों को दी गई है।

लगातार निगरानी सुनिश्चित करने के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) के चार अधिकारियों का तबादला किया गया है। इसके अलावा 11 सितंबर को एक समर्पित टीम गठित की गई, जिसमें एक अधीक्षण अभियंता और एक अधिशासी अभियंता भी शामिल हैं।

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राज्य सरकार ने यह भी बताया कि संबंधित लोक सेवकों के खिलाफ बड़ी सजा लगाए जाने के लिए चार्जशीट जारी की गई हैं। अधिकारियों को सुनवाई का अवसर देने के बाद जांच एक से दो महीने के भीतर पूरी होने की उम्मीद है।

50 अतिरिक्त कोर्टरूम के लिए भी तैयार होगी DPR

हाईकोर्ट ने विस्तारित भवन के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार करने को 1.5 करोड़ रुपये की मांग की थी। प्रस्तावित भवन में 50 कोर्टरूम बनाए जाने हैं और जरूरत पड़ने पर इसे 10 अतिरिक्त कोर्टरूम तक बढ़ाया जा सकेगा।

DPR तैयार करने के लिए 11 सितंबर को वित्तीय मंजूरी दे दी गई।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मौजूदा भवन के पुनरुद्धार का काम पूरा करने के लिए तत्काल कदम उठाने और अतिरिक्त कोर्टरूम से संबंधित प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।

मामले में अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।

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