पंजाब निकाय चुनाव: मतपत्रों (Ballot Paper) से ही होगी वोटिंग, हाई कोर्ट ने खारिज की EVM की मांग; जानें पूरा मामला

पंजाब में होने जा रहे स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आगामी 26 मई को होने वाले चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के इस्तेमाल की मांग करने वाली जनहित याचिकाओं (PILs) पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि राज्य के 104 नगर निकायों (जिसमें 8 बड़े नगर निगम भी शामिल हैं) में मतदान पारंपरिक मतपत्रों (Paper Ballot) के जरिए ही कराया जाएगा। चुनाव के नतीजों की घोषणा यानी वोटों की गिनती 29 मई को होगी।

कोर्ट ने क्यों कहा— ‘अब बहुत देर हो चुकी है’?

यह विवाद तब हाई कोर्ट पहुंचा जब तीन अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर कर पंजाब राज्य चुनाव आयोग (SEC) के मतपत्रों से चुनाव कराने के फैसले को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि आधुनिक चुनावी मानकों को अपनाते हुए यह चुनाव केवल EVM के जरिए कराए जाने चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया अब बेहद उन्नत चरण (Advanced Stage) में पहुंच चुकी है। कोर्ट ने चुनाव कार्यक्रम की समय-सीमा का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया:

  • 13 मई: चुनाव कार्यक्रम और अधिसूचना का प्रकाशन।
  • 18 व 19 मई: हाई कोर्ट में याचिकाओं का दायर होना।
  • 19 मई: उम्मीदवारों द्वारा नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख।
  • 21 मई: हाई कोर्ट में बहस की समाप्ति।
  • 22 मई (शुक्रवार): अदालत का अंतिम आदेश।
  • 26 मई: मतदान का दिन।
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अदालत ने टिप्पणी की, “जब चुनाव कार्यक्रम 13 मई को ही घोषित हो चुका था, तो याचिकाकर्ताओं ने 18 और 19 मई को इतनी देरी से याचिकाएं दायर कीं। चुनाव प्रक्रिया अब जिस मोड़ पर है, वहां किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने या नया निर्देश जारी करने के लिए बहुत देर हो चुकी है।”

कानूनी पहलू: मतपत्रों का इस्तेमाल असंवैधानिक क्यों नहीं?

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य के चुनावी नियमों के कानूनी ढांचे पर विस्तार से चर्चा की। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि 2006 में EVM के नियम आने के बाद पुरानी मतपत्र प्रणाली अप्रासंगिक हो जानी चाहिए थी।

हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि साल 2006 में पंजाब नगर पालिका चुनाव नियमावली (1994) में धारा 48-A जोड़कर EVM के इस्तेमाल का प्रावधान शामिल किया गया था, लेकिन इसके बावजूद विधायिका ने मतपत्रों और मतपेटियों से जुड़े पुराने नियमों को खत्म नहीं किया था।

खंडपीठ ने 1994 के नियमों (जैसे नियम 52, 53, 54, 55, 58, 65, 67, 70 और 71) का हवाला दिया, जो आज भी मतपत्रों के प्रबंधन और उसकी कानूनी प्रक्रिया को परिभाषित करते हैं। दोनों प्रणालियों को एक साथ बनाए रखने के पीछे का तर्क देते हुए अदालत ने कहा:

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“हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी अशिक्षा, गरीबी और अज्ञानता से जूझ रहा है। इसी जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए नियम बनाने वाले प्राधिकारियों ने निकाय चुनावों में EVM का विकल्प लाते समय भी मतपत्रों और मतपेटियों के प्रावधान को जानबूझकर बनाए रखा।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य चुनाव आयोगों के पास प्रशासनिक लचीलापन होना जरूरी है, ताकि किसी विशेष परिस्थिति में वे वापस पारंपरिक मतपत्र प्रणाली पर लौट सकें।

व्यावहारिक मुश्किलें: रास्ते में ही अटकी रहीं EVM

इस कानूनी बहस के अलावा, राज्य सरकार और चुनाव आयोग ने अदालत के सामने कुछ ऐसी व्यावहारिक और प्रशासनिक अड़चनें रखीं, जिन्होंने आखिरी समय में EVM के उपयोग को नामुमकिन बना दिया।

पंजाब के एडिशनल एडवोकेट जनरल फेरी सोफत ने पत्रकारों को बताया कि राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, यदि राज्य को पर्याप्त संख्या में EVM मिल भी जाती हैं, तो भी उनके परीक्षण, आवंटन और मतदान केंद्रों पर स्थापना की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया में कम से कम 15 दिनों का समय लगता है।

इसके अलावा, राज्य चुनाव आयोग के वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि हालांकि केंद्रीय चुनाव आयोग ने गुरुवार सुबह राजस्थान से पंजाब के लिए EVM रवाना कर दी थीं, लेकिन वे मशीनें शुक्रवार तक चंडीगढ़ नहीं पहुंच सकी थीं। ऐसी स्थिति में 26 मई को होने वाले मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक मशीनों को समय पर तैनात और जांचना व्यावहारिक रूप से असंभव था।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और याचिकाकर्ताओं को विकल्प

हाई कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार आधुनिक युग में वापस मतपत्रों जैसी पारंपरिक व्यवस्था की ओर लौटना आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन याचिकाकर्ताओं की देरी के कारण कोर्ट के हाथ बंधे हुए हैं।

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पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट के इस विचार से प्रभावित हो सकते हैं कि मतपत्रों और मतपेटियों की पारंपरिक पद्धति पर वापस जाना उचित नहीं हो सकता है, लेकिन चूंकि याचिकाकर्ता बहुत देरी से अदालत आए हैं, इसलिए हम इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हैं।”

हालांकि, याचिकाकर्ताओं के कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए हाई कोर्ट ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी है कि वे मतदान और पूरी चुनावी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) के माध्यम से इसे कानूनी रूप से चुनौती दे सकते हैं।

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