जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत आरोपी भारतीय सेना के एक जवान को अग्रिम जमानत दे दी है। हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने बालिग होने के बाद आरोपी से शादी कर ली है और मजिस्ट्रेट के समक्ष यह बयान दिया है कि उसकी प्रारंभिक शिकायत रिश्तेदारों और पुलिसकर्मियों के दबाव व प्रभाव में आकर दर्ज कराई गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत 27 अक्टूबर 2025 को तनु देवी (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा महिला पुलिस थाना, कठुआ में याचिकाकर्ता राकेश कुमार और उसके भाई के खिलाफ दर्ज कराई गई एक लिखित रिपोर्ट से हुई थी। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने पॉक्सो एक्ट की धारा 4, 6, 12, 15 और बीएनएस, 2023 की धारा 64, 65, 75, 351, 352 के तहत प्राथमिकी (FIR) संख्या 0018/2025 दर्ज की थी।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता राकेश कुमार का पक्ष अधिवक्ता श्री अमित गुप्ता ने रखा।
अपनी प्रारंभिक शिकायत में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि सेना में कार्यरत याचिकाकर्ता राकेश कुमार अक्सर उसके घर आता था और “यौन संबंध बनाने के लिए उसे सम्मोहित (hypnotised) कर दिया था।” उसने दावा किया था कि वह उस समय नाबालिग थी और आरोपी पिछले तीन वर्षों से अपनी “हवस” पूरी करने के लिए उसका यौन शोषण कर रहा था। पीड़िता का यह भी आरोप था कि आरोपी उसे अपने मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो दिखाकर शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाता था और किसी को बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देता था। इसके अलावा, उसने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी तस्वीरें फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करने की धमकी दी थी, और याचिकाकर्ता का भाई भी पैसे का लालच देकर यौन संबंध बनाने का दबाव बनाता था और मना करने पर गाली-गलौज करता था।
हालांकि, जांच के दौरान पीड़िता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), कठुआ को एक आवेदन देकर अपना बयान दोबारा दर्ज कराने का अनुरोध किया। उसने कहा कि उसका पिछला बयान सही तथ्यों पर आधारित नहीं था और आरोप लगाया कि उस पर “याचिकाकर्ता के खिलाफ बयान देने के लिए पुलिस अधिकारियों द्वारा दबाव डाला गया था।”
इसके बाद उसने सत्र न्यायालय (ट्रायल कोर्ट), कठुआ में एक आवेदन और हलफनामा दाखिल किया। इसमें उसने कहा कि वह “पुलिस अधिकारियों द्वारा बहकावे में थी और उनके प्रभाव में थी क्योंकि उस समय वह केवल याचिकाकर्ता से शादी करना चाहती थी।” उसने यह भी स्पष्ट किया कि अब वह बालिग हो चुकी है और बिना किसी देरी के याचिकाकर्ता से शादी करना चाहती है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), कठुआ के समक्ष दर्ज कराए गए बयान में पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह पिछले तीन सालों से याचिकाकर्ता से प्यार करती थी। उसने बताया कि जब याचिकाकर्ता ने एक महीने तक उसका फोन नहीं उठाया, तो उसे लगा कि उसे धोखा दिया गया है। इसी डर में आकर वह अपने रिश्तेदारों और हिमाचल पुलिस के बहकावे व प्रभाव में आ गई और उसने एफआईआर दर्ज करा दी। पीड़िता ने आगे कहा कि बालिग होने के बाद अब उसकी शादी याचिकाकर्ता से हो चुकी है, इसलिए वह कोई कानूनी कार्रवाई नहीं चाहती है। दोनों ने एफआईआर रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में एक संयुक्त याचिका भी दायर की है।
पक्षों की दलीलें
सत्र न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। ट्रायल कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 482(4) के तहत लगाए गए प्रतिबंध का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया था।
याचिकाकर्ता के वकील श्री अमित गुप्ता ने तर्क दिया कि चूंकि पीड़िता ने बालिग होने के बाद याचिकाकर्ता से शादी कर ली है और मजिस्ट्रेट की अदालत में स्पष्ट कर दिया है कि उसने पुलिस और रिश्तेदारों के प्रभाव में आकर एफआईआर दर्ज कराई थी, इसलिए आरोपी के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है।
राज्य (प्रतिवादी संख्या 1) की ओर से उपस्थित सरकारी वकील श्री सुनील मल्होत्रा ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने आरोपों की गंभीरता और बीएनएसएस की धारा 482(4) के तहत लागू वैधानिक प्रतिबंध का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत न देने की दलील दी।
वहीं, निजी प्रतिवादी (पीड़िता तनु देवी) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता श्री अभिषेक गुप्ता ने स्पष्ट किया कि उनकी मुवक्किल को याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
जस्टिस राजेश सेखरी की एकल पीठ ने मामले के रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि तथ्यात्मक स्थिति पूरी तरह से निर्विवाद है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में टिप्पणी की:
“रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से स्थापित स्थिति यह है कि पीड़िता-निजी प्रतिवादी ने मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने बयान में साफ तौर पर कहा है कि वह याचिकाकर्ता से प्यार करती थी और उसने पुलिस अधिकारियों व अपने रिश्तेदारों की सलाह पर उसके और उसके भाई के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। उसने यह भी बताया कि अब उसकी शादी याचिकाकर्ता से हो चुकी है और वह उसी के साथ रहना चाहती है।”
यह देखते हुए कि पीड़िता को जमानत देने पर कोई आपत्ति नहीं है, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अर्जी स्वीकार कर ली। अदालत ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार 25,000 रुपये के मुचलके और इतनी ही राशि के निजी मुचलके पर रिहा किया जाए।
हाईकोर्ट ने इस जमानत के साथ निम्नलिखित शर्तें भी लागू की हैं:
- वह जमानत का उल्लंघन नहीं करेगा, अभियोजन के साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा और न ही गवाहों को डराएगा-धमकाएगा;
- वह ट्रायल कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय सीमा से बाहर नहीं जाएगा; तथा
- वह नियमित रूप से ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होगा।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: राकेश कुमार बनाम यूटी ऑफ जेएंडके और अन्य
- केस नंबर: बेल एप्लीकेशन नंबर 377/2025
- पीठ: जस्टिस राजेश सेखरी
- फैसले की तारीख: 18 मई, 2026

