केरल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ट्रांसजेंडर पुरुष को एग फ्रीज कराने की मिली मंजूरी, अदालत ने कहा- ‘प्रजनन का अधिकार भी जीने के अधिकार का हिस्सा’

देश में लैंगिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, केरल हाईकोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर पुरुष को लिंग परिवर्तन (Gender Reassignment) की पूरी प्रक्रिया से पहले अपने एग्स (Oocytes) को निकालकर सुरक्षित (Cryopreserve) रखने की अनुमति दे दी है। 15 मई को सुनाए गए इस ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस शोभा अन्नम्मा ईपन ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसकी जैविक स्थिति के आधार पर प्रजनन संबंधी अधिकारों से वंचित करना, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत ‘जीने के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है।

यह फैसला भारत में कानून की तकनीकी परिभाषाओं और अपनी पहचान को जीने वाले ट्रांसजेंडर समुदाय के वास्तविक संघर्षों के बीच के अंतर को पाटने का काम करता है।

यह कानूनी लड़ाई तब शुरू हुई जब याचिकाकर्ता (एक ट्रांसजेंडर पुरुष) ने अपने एग्स सुरक्षित रखने के लिए एक निजी फर्टिलिटी सेंटर से संपर्क किया। याचिकाकर्ता ने हॉर्मोन थेरेपी और ब्रेस्ट रिमूवल (स्तन हटाने) की सर्जरी करवा ली थी, लेकिन उनके गर्भाशय (Uterus) और अंडाशय (Ovaries) पूरी तरह सुरक्षित थे। वह भविष्य में जैविक रूप से माता-पिता बनने के अपने विकल्प को सुरक्षित रखना चाहते थे।

हालांकि, निजी क्लिनिक ने इस प्रक्रिया को करने से मना कर दिया। क्लिनिक का तर्क था कि सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम, 2021 और उसके नियमों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए ऐसी प्रजनन सेवाओं का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

निजी क्लिनिक के इस इनकार से आहत होकर याचिकाकर्ता ने केरल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि केवल लैंगिक पहचान के आधार पर प्रजनन सेवाओं से इनकार करना मनमाना और उनके व्यक्तिगत अधिकारों पर हमला है।

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सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकार के वकील ने तर्क दिया कि एआरटी (ART) अधिनियम के तहत फर्टिलिटी सेवाएं केवल “कमीशनिंग कपल्स” (संतान चाहने वाले विवाहित जोड़ों) और “महिलाओं” तक ही सीमित हैं। सरकार का यह भी कहना था कि चूंकि याचिकाकर्ता ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम’ के तहत खुद को ‘पुरुष’ के रूप में पंजीकृत कराकर आधिकारिक प्रमाण पत्र हासिल कर लिया है, इसलिए वह अब कानूनन एक ‘महिला’ के रूप में मिलने वाले चिकित्सा लाभों का दावा नहीं कर सकते।

इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के कानूनी दल ने दलील दी कि उन्हें केवल ‘पुरुष’ मानकर उनके ट्रांसजेंडर होने की स्थिति की अनदेखी करना कानूनन गलत है। उन्होंने तर्क दिया कि फर्टिलिटी सेवाओं से इनकार करना निम्नलिखित संवैधानिक अधिकारों का हनन है:

  • अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता)
  • अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध)
  • अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार)
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याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों—नालसा बनाम भारत संघ (NALSA v. Union of India) और सुप्रियो बनाम भारत संघ का हवाला दिया। इसके अलावा, उन्होंने केंद्र सरकार के अपने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का भी जिक्र किया, जो ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य सेवा में प्रजनन क्षमता संरक्षण को एक वैध विकल्प मानता है।

हालांकि हाईकोर्ट ने एआरटी (ART) अधिनियम की धारा 21(g) की संवैधानिक वैधता पर सीधे फैसला नहीं सुनाया (क्योंकि इसे विशेष रूप से चुनौती नहीं दी गई थी), लेकिन जस्टिस ईपन ने याचिकाकर्ता के मार्ग में आने वाली कानूनी बाधाओं को दूर कर दिया।

अदालत ने कहा कि एआरटी कानून की धारा 21(g) के तहत महिलाओं (21 से 50 वर्ष) और पुरुषों (21 से 55 वर्ष) के लिए सेवाएं विनियमित हैं। कोर्ट ने साफ किया कि ‘बायोलॉजिकल सेक्स’ (जैविक लिंग) और ‘जेंडर आइडेंटिटी’ (लैंगिक पहचान) दो बिल्कुल अलग अवधारणाएं हैं।

फैसले में स्पष्ट किया गया कि “जैविक लिंग व्यक्ति के शारीरिक गुणों, जैसे क्रोमोसोम्स, हॉर्मोन्स और शारीरिक अंगों से तय होता है,” जबकि जेंडर किसी व्यक्ति की “आंतरिक रूप से महसूस की जाने वाली पहचान और उसकी सामाजिक भूमिका” को दर्शाता है।

चूंकि याचिकाकर्ता के गर्भाशय और अंडाशय पूरी तरह सुरक्षित और क्रियाशील हैं, इसलिए जैविक रूप से उनके पास एग्स निकालने की पूरी क्षमता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हालांकि याचिकाकर्ता प्राकृतिक रूप से भी गर्भधारण कर सकते थे, लेकिन राज्य उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, क्योंकि मानसिक और सामाजिक तौर पर उनकी पहचान एक पुरुष की है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, “याचिकाकर्ता, जैविक रूप से एक वयस्क महिला होने के नाते, अपने एग्स (Oocytes) को निकालने का अधिकार रखता है। इससे इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन के अधिकार सहित जीने के अधिकार का उल्लंघन होगा।”

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इस ऐतिहासिक फैसले के साथ केरल हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक मान्यता प्राप्त एआरटी बैंक (ART Bank) से संपर्क करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने बैंक को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता के एग्स को सुरक्षित निकाले और भविष्य में प्रजनन के लिए उन्हें सुरक्षित (Cryopreserve) रखे।

इसके साथ ही, व्यवस्था में बड़े सुधार की वकालत करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि यह सरकार का ‘परम कर्तव्य’ है कि वह लिंग परिवर्तन की चिकित्सा प्रक्रिया शुरू करने वाले सभी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बीच जागरूकता फैलाए, ताकि वे समय रहते अपने स्पर्म या एग्स को सुरक्षित रखने के विकल्प का लाभ उठा सकें।

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