बॉम्बे हाई कोर्ट ने सार्वजनिक संस्थानों में अस्थायी नियुक्तियों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि सरकारी या सार्वजनिक संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट (संविदा) पर काम करने वाले कर्मचारी सिर्फ लंबे समय की सेवा के आधार पर स्थायी नौकरी (नियमितीकरण) का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि अगर तय नियमों और पात्रता को दरकिनार कर किसी को नियमित किया जाता है, तो यह सार्वजनिक रोजगार में ‘बैकडोर एंट्री’ यानी पिछले दरवाजे से प्रवेश देने जैसा होगा, जिसकी कानूनन अनुमति नहीं है।
जस्टिस आर. आई. चागला और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे में कानूनी अधिकारी के रूप में कार्यरत युवराज बालासाहेब भरामले की याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा समाप्ति (टर्मिनेशन) के नोटिस को अदालत में चुनौती दी थी और संस्थान में स्थायी किए जाने की मांग की थी।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जिस ‘एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (लीगल)’ के पद पर याचिकाकर्ता कार्यरत थे, वह वास्तव में कोई स्वीकृत (Sanctioned) पद था ही नहीं। इसे केवल संस्थान की तत्कालीन प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अस्थायी रूप से तैयार किया गया था।
कैसे शुरू हुआ एक दशक लंबा यह विवाद?
इस कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2015 से होती है। आईआईटी बॉम्बे ने उस समय ‘एग्जीक्यूटिव ऑफिसर’ के एक अस्थायी और अनारक्षित पद के लिए विज्ञापन निकाला था। शिवाजी यूनिवर्सिटी से साल 2000 में एलएलबी और 2002 में कमर्शियल व क्रिमिनल लॉ में मास्टर्स डिग्री पूरी कर चुके युवराज बालासाहेब भरामले ने इस पद के लिए आवेदन किया।
चयन प्रक्रिया के बाद, 8 फरवरी 2016 को भरामले को संस्थान की तरफ से नियुक्ति पत्र मिला, जिसमें साफ तौर पर लिखा था कि यह नियुक्ति तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित है। उन्होंने 11 अप्रैल 2016 को संस्थान में अपना कार्यभार संभाला।
इसके बाद समय-समय पर उनके इस अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) को आगे बढ़ाया गया:
- अप्रैल 2017: उनके वेतन में बढ़ोतरी की गई, लेकिन साथ ही लिखित तौर पर यह स्पष्ट किया गया कि मूल अनुबंध की अन्य सभी शर्तें पहले जैसी ही रहेंगी।
- मई 2019: एक बार फिर उनके समेकित वेतन (Consolidated Salary) में इजाफा हुआ और दोबारा इस बात को दोहराया गया कि उनकी नौकरी पूरी तरह संविदात्मक (Contractual) है।
- 13 मार्च: संस्थान की ओर से उन्हें एक आधिकारिक नोटिस मिला, जिसमें सूचित किया गया कि उनका मौजूदा अनुबंध 23 अप्रैल को समाप्त हो रहा है और इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
इस सेवा समाप्ति नोटिस के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने मांग की कि उन्हें ‘एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (लीगल)’ या ‘डिप्टी रजिस्ट्रार (लीगल)’ के पद पर नियमित किया जाए और बकाया वेतन व अन्य सेवा लाभ दिए जाएं।
याचिकाकर्ता की दलील: ’10 साल की बेदाग सेवा को न किया जाए नजरअंदाज’
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील असीम नफाड़े ने अदालत में दलील दी कि आईआईटी बॉम्बे द्वारा अचानक अनुबंध को समाप्त करना पूरी तरह से मनमाना, तर्कहीन और कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है।
उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी नियोक्ता केवल ‘अस्थायी’, ‘अनुबंधित’ या ‘तदर्थ (Ad-hoc)’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके किसी कर्मचारी को उसके संवैधानिक रोजगार के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता, खासकर तब जब वह लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहा हो।
वकील ने अदालत का ध्यान इस बात की ओर भी खींचा कि भरामले ने संस्थान में लगभग 10 वर्षों तक बेदाग छवि और बेहतरीन रिकॉर्ड के साथ काम किया। उनकी काम के लिए कई बार सराहना भी की गई। उन्होंने कोर्ट से अपील की कि यदि याचिकाकर्ता परमानेंट पदों के लिए तय उम्र सीमा को पार भी कर चुके हैं, तो एक दशक की समर्पित सेवा को देखते हुए इस तकनीकी आधार पर उनके अधिकारों को नहीं छीना जाना चाहिए।
IIT बॉम्बे का पक्ष: ‘नियमित और कॉन्ट्रैक्ट नौकरी में होता है बुनियादी अंतर’
आईआईटी बॉम्बे की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता नौशाद इंजीनियर ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने आईआईटी के नियमों (Statutes) का हवाला देते हुए नियमित रोजगार और कॉन्ट्रैक्ट रोजगार के बीच के बुनियादी अंतर को रेखांकित किया।
वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता न तो नियमित कर्मचारियों की श्रेणी में आते हैं और न ही वे ‘वर्कमैन’ (कामगार) के दायरे में आते हैं। साल 2016 के नियुक्ति पत्र को अदालत के समक्ष रखते हुए उन्होंने साबित किया कि यह नियुक्ति शुरू से ही पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित थी। इसके अलावा, जिस पद पर उनकी नियुक्ति हुई थी, वह कभी भी संस्थान का स्वीकृत ढांचागत पद नहीं था, बल्कि केवल तात्कालिक प्रशासनिक काम को संभालने के लिए बनाया गया था।
हाई कोर्ट की टिप्पणी: ‘संवैधानिक मर्यादाओं और नियमों का पालन जरूरी’
दोनों पक्षों को सुनने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने आईआईटी बॉम्बे की दलीलों पर सहमति जताई। कोर्ट ने माना कि 2015 के नौकरी के विज्ञापन और उसके बाद जारी किए गए सभी आदेशों में बार-बार स्पष्ट किया गया था कि यह काम अस्थायी और अनुबंध पर आधारित है।
पीठ ने याचिकाकर्ता की स्थायीकरण की मांग को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा:
“याचिकाकर्ता की इस मांग को स्वीकार करने का अर्थ पहले प्रतिवादी (IIT बॉम्बे) के संस्थान में पिछले दरवाजे (बैकडोर) से प्रवेश देना होगा, जिसकी कानूनन कतई इजाजत नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत सार्वजनिक प्रशासन में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना अनिवार्य है, लेकिन इन सिद्धांतों का इस्तेमाल बिना स्वीकृत पद के किसी अस्थायी कर्मचारी को स्थायी करने के लिए नहीं किया जा सकता।
हालांकि, मानवीय आधार पर राहत देते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संस्थान के आधिकारिक आवास में रहने के लिए 8 जून तक का अतिरिक्त समय प्रदान किया है।

