अमरनाथ यात्रा समाप्त तो हिरासत का आधार भी खत्म: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने रद्द किया प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का मूल कारण या उद्देश्य ही समाप्त हो चुका है, तो उसे आगे जेल में बंद रखना पूरी तरह से अनुचित और गैर-कानूनी है।

न्यायमूर्ति संजय धर की एकल पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए गांदरबल प्रशासन द्वारा जारी हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता को मुख्य रूप से वर्ष 2025 की अमरनाथ यात्रा के दौरान सुरक्षा बनाए रखने के मद्देनजर हिरासत में लिया गया था। चूंकि वह यात्रा लगभग नौ महीने पहले ही संपन्न हो चुकी है, इसलिए अब हिरासत को जारी रखने का कोई वैध कारण नहीं बचता है।

अदालत ने टिप्पणी की, “ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2025 में होने वाली श्री अमरनाथजी यात्रा के मद्देनजर निवारक हिरासत में रखा गया था। चूंकि यात्रा की अवधि काफी समय पहले समाप्त हो चुकी है, इसलिए याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने का आधार भी अब खत्म हो चुका है। ऐसे में याचिकाकर्ता को हिरासत में रखना अब पूरी तरह से अनावश्यक है।”

क्या था पूरा मामला?

यह मामला पिछले साल का है, जब गांदरबल के जिला मजिस्ट्रेट ने 30 अप्रैल 2025 को याचिकाकर्ता के खिलाफ एक प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर जारी किया था। प्रशासन ने लोक सुरक्षा अधिनियम (PSA) की धारा 8 के तहत यह कार्रवाई की थी। अधिकारियों का तर्क था कि याचिकाकर्ता अमरनाथ यात्रा के दौरान राज्य की सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों में शामिल हो सकता है।

बता दें कि अमरनाथ यात्रा जम्मू-कश्मीर के हिमालयी क्षेत्र में स्थित पवित्र अमरनाथ गुफा के लिए होने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण वार्षिक हिंदू तीर्थयात्रा है। पिछले वर्ष यह यात्रा 3 जुलाई से 9 अगस्त तक आयोजित की गई थी।

READ ALSO  कोर्ट जमानत के लिए ऐसी शर्तें नहीं लगा सकतीं जो एक अलग अधिनियम के तहत शक्तियों का प्रयोग करने की राशि होगी: गुजरात हाई कोर्ट

प्रशासन ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराते हुए आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता लगातार आतंकी और अलगाववादी तत्वों की विचारधारा का समर्थन कर रहा था, उग्रवादियों का महिमामंडन कर रहा था और स्थानीय युवाओं को भड़काने का काम कर रहा था।

‘अस्पष्ट आरोप’ संवैधानिक अधिकारों का हनन

हाईकोर्ट ने केवल समय बीत जाने के आधार पर ही नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रियाओं और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस संजय धर ने पाया कि प्रशासन द्वारा हिरासत के लिए जो आधार बताए गए थे, वे बेहद “अस्पष्ट, अस्पष्ट और बुनियादी विवरणों से रहित” थे।

READ ALSO  ₹10 लाख की तलाक समझौता राशि छुपाने पर दिल्ली कोर्ट  ने महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की 

अदालत ने पाया कि हिरासत की फाइलों में कई महत्वपूर्ण जानकारियों का कोई उल्लेख नहीं था, जैसे:

  • वे विशिष्ट स्थान कौन से थे जहाँ कथित बैठकें हुईं?
  • उन आतंकवादियों, चरमपंथियों या अलगाववादियों की पहचान क्या थी, जिनके साथ याचिकाकर्ता के संबंध होने का दावा किया गया?
  • ये मुलाकातें किस तारीख या समय अवधि के दौरान हुईं?

हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(5) यह अनिवार्य बनाता है कि हिरासत के हर एक आधार को स्पष्ट और सविस्तार बताया जाए। यदि आरोपी को आरोपों की पूरी जानकारी ही नहीं मिलेगी, तो वह अपने बचाव में प्रभावी कानूनी चुनौती कैसे पेश कर पाएगा।

अदालत ने सख्त लहजे में कहा, “हिरासत के आधारों में अस्पष्टता डिटेनिंग अथॉरिटी (हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी) की व्यक्तिपरक संतुष्टि की बुनियाद पर ही प्रहार करती है, जिससे हिरासत का आदेश खुद-ब-खुद दूषित हो जाता है।”

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील, अधिवक्ता जी. एन. शाहीन ने पुरजोर तरीके से दलील दी कि पुलिस ने एक अवैध हिरासत को सही ठहराने के लिए मनगढ़ंत आरोप तैयार किए हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने याचिकाकर्ता को वे सबूत और दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए जो हिरासत का आधार बने थे, जो कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का सीधा उल्लंघन है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने ईशा फाउंडेशन मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, तमिलनाडु प्रदूषण बोर्ड के नोटिस खारिज किए

दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए सरकारी वकील वसीम गुल ने हिरासत के फैसले का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह कार्रवाई याचिकाकर्ता के पिछले आचरण को देखते हुए भविष्य में संभावित खतरों से बचने के लिए ली गई एक एहतियाती व्यवस्था थी। उन्होंने दावा किया कि हिरासत से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज याचिकाकर्ता को सौंप दिए गए थे और उन्हें पूरी तरह पढ़कर सुनाया व समझाया गया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि जब सुरक्षा की तात्कालिक वजह (अमरनाथ यात्रा) समाप्त हो चुकी हो, तो अस्पष्ट आरोपों के सहारे किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles