बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: महाराष्ट्र के पूर्व DGP संजय पांडे के खिलाफ दर्ज FIR रद्द, कोर्ट ने कहा- ‘निजी रंजिश’ के लिए कानून का दुरुपयोग

बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) संजय पांडे, वरिष्ठ वकील शेखर जगताप और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज कई प्राथमिकियों (FIR) और उनके आधार पर शुरू की गई सभी आपराधिक कार्यवाहियों को पूरी तरह खारिज (Quash) कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति सुमन श्याम की खंडपीठ ने बुधवार को इस मामले पर फैसला सुनाया। अदालत ने इन आपराधिक कार्यवाहियों को “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” करार देते हुए स्पष्ट किया कि यह पूरा मामला केवल “निजी रंजिश” से प्रेरित है। गुरुवार को उपलब्ध हुए अपने विस्तृत आदेश में अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से “अस्पष्ट और साक्ष्यों से परे” हैं। पुलिस द्वारा पेश की गई ‘सी’ समरी (C Summary) रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ये मनगढ़ंत आरोप पहले ही झूठे साबित हो चुके हैं।

क्या था पूरा मामला और क्या थे आरोप?

यह कानूनी विवाद साल 2024 में कारोबारी संजय मिश्रीमल पुनामिया द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों से शुरू हुआ था। पुनामिया ने आरोप लगाया था कि पूर्व DGP संजय पांडे, वरिष्ठ वकील शेखर जगताप, सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) सरदार पाटिल और इंस्पेक्टर मनोहर पाटिल ने मिलकर उनके खिलाफ एक बड़ी आपराधिक साजिश रची है।

पुनामिया ने अपनी शिकायतों में मुख्य रूप से निम्नलिखित आरोप लगाए थे:

  • फर्जी नियुक्ति का आरोप: पुनामिया का दावा था कि आरोपियों ने साल 2021 में एडवोकेट शेखर जगताप का एक फर्जी नियुक्ति पत्र तैयार किया। इसका उद्देश्य जगताप को जबरन वसूली और धोखाधड़ी के विभिन्न मामलों में विशेष सरकारी वकील (Special Public Prosecutor) के रूप में पेश करना था, ताकि पुनामिया को लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखा जा सके।
  • राजनीतिक हस्तियों को फंसाने का दबाव: कारोबारी ने आरोप लगाया कि पुलिस तंत्र का दुरुपयोग कर उन पर पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह और अन्य राजनीतिक नेताओं को फंसाने के लिए दबाव डाला गया था। उनका कहना था कि संजय पांडे और अन्य अधिकारियों ने पुराने मामलों को अवैध रूप से दोबारा खोलने और नए फर्जी मामले दर्ज करने की धमकी देकर उनसे जबरन झूठे बयान दर्ज कराए।
  • अस्पताल में दी गई धमकी: पुनामिया ने एक विशिष्ट घटना का उल्लेख करते हुए दावा किया कि जब वह अस्पताल में भर्ती थे, तब संजय पांडे के निर्देश पर कुछ पुलिस अधिकारियों ने उन पर तत्कालीन उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को एक शहरी भूमि सीमा (ULC) घोटाले में झूठा फंसाने का दबाव बनाया था। इसके बदले में उनके खिलाफ चल रहे मामलों को रफा-दफा करने का लालच दिया गया था।
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हाई कोर्ट का विश्लेषण: “आदतन मुकदमेबाज” है शिकायतकर्ता

मामले के तथ्यों की जांच करने के बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने संजय मिश्रीमल पुनामिया के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने शिकायतकर्ता के खुद के आपराधिक इतिहास और मुकदमों की लंबी फेहरिस्त पर ध्यान केंद्रित किया।

न्यायालय ने पाया कि पुनामिया खुद जबरन वसूली, धमकी और गोपनीय सरकारी दस्तावेजों की चोरी जैसे कई गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे हुए हैं। इसी वजह से दोनों पक्षों के बीच गहरी व्यक्तिगत दुश्मनी रही है।

पीठ ने पुनामिया को एक “आदतन मुकदमेबाज” (habitual litigant) करार दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी उजागर किया कि पुनामिया द्वारा दायर एक पूर्व अपील के सिलसिले में उनके खिलाफ पहले से ही न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) के तहत कार्यवाही चल रही है।

शिकायतों की प्रकृति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा:

“इन दोनों मामलों में लगाए गए आरोप एक हताश और प्रतिशोधी दिमाग की उपज हैं। शिकायतकर्ता इस मामले में केवल एक ऐसी जांच (fishing inquiry) की मांग कर रहा है, जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं है।”

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अदालत ने आगे चेतावनी देते हुए कहा:

“कानूनी प्रक्रिया का उपयोग किसी भी छिपे हुए या अनुचित एजेंडे को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि कोई आपराधिक कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण इरादे से की गई है, तो उसे रद्द किया जाना अनिवार्य है।”

अदालत का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने माना कि पूर्व DGP संजय पांडे और अन्य अधिकारियों के खिलाफ बार-बार एफआईआर दर्ज कराना कानून की स्थापित प्रक्रिया का सीधा दुरुपयोग था। नतीजतन, खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सभी संबंधित एफआईआर और उनके आधार पर शुरू की गई आपराधिक कार्यवाहियों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। इस फैसले के साथ ही इस विवादित मुकदमेबाजी का अंत हो गया है।

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