एफआईआर दर्ज होने से पहले लोक सेवक को आय से अधिक संपत्ति का स्पष्टीकरण देने का कोई अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज एक प्राथमिकी (एफआईआर) को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने निर्णय सुनाया कि किसी आरोपी लोक सेवक के पास कथित रूप से आय से अधिक संपत्ति के मामले में एफआईआर दर्ज होने से पहले स्पष्टीकरण देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब संज्ञेय अपराध के विवरण उपलब्ध हों, तो ऐसी प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच करना अनिवार्य नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, दीना नाथ यादव ने 17 दिसंबर, 2025 को पुलिस स्टेशन लखनऊ सेक्टर (सतर्कता आयोग), लखनऊ में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संक्षेप में “अधिनियम, 1988”) की धारा 13(1)(बी) और 13(2) के तहत दर्ज एफआईआर (केस क्राइम नंबर 0028/2025) को चुनौती दी थी।

एफआईआर के अनुसार, सतर्कता विभाग द्वारा की गई एक खुली जांच (रिपोर्ट संख्या ANU-2-KHULI-86/2020) में यह पाया गया कि यादव ने एक लोक सेवक के रूप में कार्य करते हुए, अपने सभी ज्ञात और वैध स्रोतों से हुई कुल आय (जो लगभग 1.95 करोड़ रुपये थी) की तुलना में 2.51 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की थी। यह जांच रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता द्वारा अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से लगभग 55,00,000 रुपये अधिक खर्च किए जाने को दर्शाती है, जो आय से अधिक संपत्ति के दायरे में आता है। तदनुसार, 4 दिसंबर, 2025 को याचिकाकर्ता का मामला आगे की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सतर्कता विभाग को भेज दिया गया था।

यह खुली जांच 12 जून, 2020 के एक गोपनीय अर्ध-शासकीय पत्र के आधार पर शुरू हुई थी। याचिकाकर्ता और अन्य ने इससे पहले रिट याचिका संख्या 20001 (एसएस)/2020 (जयकार सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य) दायर कर सतर्कता जांच शुरू करने के आदेशों को चुनौती दी थी। उस याचिका में, रिट कोर्ट ने 20 दिसंबर, 2021 को एक अंतरिम आदेश पारित कर राज्य को याचिकाकर्ताओं से उनकी संपत्तियों के संबंध में कोई भी जानकारी मांगने से रोक दिया था, क्योंकि उस समय चल रही प्रक्रिया केवल एक तथ्य-खोज (fact-finding) जांच थी और एफआईआर दर्ज होने के बाद ही नियमित सतर्कता जांच शुरू होनी थी।

सतर्कता विभाग की 19 सितंबर, 2024 की जांच रिपोर्ट और 9 अक्टूबर, 2024 के गोपनीय ज्ञापन में यह दर्ज किया गया था कि याचिकाकर्ता के खिलाफ खुली जांच बिना उसका स्पष्टीकरण लिए या आय-व्यय के दस्तावेज मांगे बिना ही पूरी कर ली गई थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील इंदु प्रकाश सिंह ने तर्क दिया कि एफआईआर में लगाए गए आरोप पूरी तरह से झूठे हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(बी) के स्पष्टीकरण 1 (Explanation 1) पर विशेष बल दिया गया। इस स्पष्टीकरण के अनुसार, किसी व्यक्ति को अवैध रूप से समृद्ध माना जाएगा यदि वह या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक की संपत्ति या आर्थिक संसाधनों के कब्जे में पाया जाता है, जिसे वह लोक सेवक “संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर सकता।” याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि चूंकि अधिनियम की धारा 13 के तहत अपराध तभी बनता है जब लोक सेवक अपनी संपत्ति का संतोषजनक हिसाब न दे पाए, इसलिए सतर्कता विभाग द्वारा याचिकाकर्ता से स्पष्टीकरण मांगे बिना सीधे एफआईआर दर्ज करना कानूनी प्रक्रिया के विपरीत है। उनका तर्क था कि विभाग ने बिना स्पष्टीकरण का अवसर दिए सीधे प्राथमिकी दर्ज करके मामले को पहले से ही तय (pre-judge) कर लिया है।

READ ALSO  गैर-मौजूद पद को अवैध बताने वाला अभ्यर्थी उसी पद पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया गया कि 20 दिसंबर, 2021 को रिट कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम आदेश के कारण, जिसमें याचिकाकर्ता से संपत्ति की जानकारी मांगने पर रोक लगाई गई थी, याचिकाकर्ता के पास स्पष्टीकरण देने का कोई अवसर ही नहीं था। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट द्वारा अन्य समान मामलों (जैसे सुशील कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और राघवेन्द्र कुमार गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में पारित अंतरिम आदेशों का भी हवाला दिया, जहां स्पष्टीकरण का अवसर दिए बिना दर्ज की गई एफआईआर पर रोक लगाई गई थी।

प्रतिवादियों की दलीलें: प्रतिवादी राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA-I) श्री अनुराग वर्मा ने याचिका का विरोध किया।

पक्षों की दलीलें: राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय कर्नाटक राज्य बनाम श्री चेन्नाकेशव एच.डी. और अन्य (2025) 4 S.C.R. 608 पर भरोसा जताया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसले केंद्रीय जांच ब्यूरो बनाम थोममंद्रू हन्ना विजयलक्ष्मी (2021) 13 SCR 364 का संदर्भ लिया था। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि स्थापित कानून के अनुसार, एफआईआर दर्ज होने से पहले किसी भी आरोपी लोक सेवक को आय से अधिक संपत्ति के संबंध में स्पष्टीकरण देने का कोई अंतर्निहित या वैधानिक अधिकार नहीं है, इसलिए याचिका खारिज की होनी चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने इस मुख्य कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज करने से पहले लोक सेवक से स्पष्टीकरण मांगना या प्रारंभिक जांच करना अनिवार्य है।

इस विषय पर निर्णय लेने के लिए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा श्री चेन्नाकेशव एच.डी. (supra) मामले में प्रतिपादित सिद्धांत का उल्लेख किया:

“14. … एक आरोपी लोक सेवक को एफआईआर दर्ज होने से पहले कथित रूप से आय से अधिक संपत्ति के बारे में स्पष्टीकरण देने का कोई अधिकार नहीं है। हमारा भी यही मत है कि यह सही कानूनी स्थिति है क्योंकि इस स्तर पर लोक सेवक की सुनवाई का कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं है।”

इसके साथ ही, कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) 2 SCC 1 के ऐतिहासिक संविधान पीठ के फैसले का विश्लेषण किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि यदि प्राप्त जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध का होना प्रकट होता है, तो धारा 154 CrPC के तहत प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है। यद्यपि ललिता कुमारी मामले में यह माना गया था कि “भ्रष्टाचार के मामलों” में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की जा सकती है, हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि निर्णय में प्रयुक्त शब्द “की जा सकती है” (may be made) यह स्पष्ट करता है कि ऐसी जांच करना अनिवार्य नहीं है।

स्टेट ऑफ तेलंगाना बनाम मनागीपेट (2019) 19 SCC 87 मामले का उल्लेख करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक जांच का उद्देश्य केवल पूरी तरह से निराधार और प्रेरित शिकायतों को छानना है, न कि आरोपी को प्रारंभिक जांच की मांग करने का कोई अधिकार देना।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की आप नेता सत्येंद्र जैन की जमानत याचिका

याचिकाकर्ता द्वारा धारा 13(1)(बी) के स्पष्टीकरण 1 के आधार पर दी गई दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“इसका कारण यह है कि स्पष्टीकरण 1 में कहीं भी पूर्व स्पष्टीकरण लेने का उल्लेख नहीं है और जब कोई शब्द कानून का हिस्सा नहीं है, तो उसे उसमें नहीं पढ़ा जा सकता।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ (1991) 3 SCC 655 के फैसले को भी रेखांकित किया, जिसमें कोर्ट “संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर सकता” वाक्यांश पर विचार कर रहा था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल होने से पहले जांच अधिकारी के समक्ष स्पष्टीकरण का अवसर दिए जाने की मांग को खारिज करते हुए कहा था:

“75. … लेकिन यह कहना कि सभी सामग्री एकत्र करने के बाद जांच अधिकारी आरोपी को अवसर दे और उसे संपत्ति के अधिक होने का कारण बताने के लिए कहे और फिर तय करे कि स्पष्टीकरण संतोषजनक है या नहीं, जांच अधिकारी को एक जांच अधिकारी या न्यायाधीश के पद पर बिठाने जैसा होगा। जांच अधिकारी लोक सेवक के आचरण की जांच नहीं कर रहा है या आरोपी की संपत्ति और आय के बीच विसंगति के विवादित मुद्दों का निर्धारण नहीं कर रहा है। वह केवल सभी पक्षों से सामग्री एकत्र करता है और एक रिपोर्ट तैयार करता है जिसे वह अदालत में आरोप पत्र के रूप में दाखिल करता है।”

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि जब आरोपी लोक सेवक को आरोप पत्र दाखिल होने से पहले जांच अधिकारी के समक्ष स्पष्टीकरण देने का कोई अधिकार नहीं है, तो एफआईआर दर्ज होने से पहले प्रारंभिक जांच को अनिवार्य मानकर ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया जा सकता।

याचिकाकर्ता के मामले में की गई खुली जांच पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि यह जांच सतर्कता विभाग के पास एक “स्रोत रिपोर्ट” (source report) के रूप में उपलब्ध थी। श्री चेन्नाकेशव एच.डी. मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब विभाग के पास पहले से ही विस्तृत जानकारी मौजूद हो, तो प्राथमिकी दर्ज करने से पहले आरोपी का बयान या संस्करण लेना आवश्यक नहीं है।

READ ALSO  एक संज्ञेय अपराध के लिए छापेमारी करने से पहले प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य: हाईकोर्ट

विभिन्न न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णयों के संदर्भ में, हाईकोर्ट ने निम्नलिखित मामलों पर चर्चा की:

  • पी. सिराजुद्दीन मामले में, जस्टिस जी.के. मित्तर ने लोक सेवक के सम्मान को ठेस बढ़ने से बचाने के लिए प्रारंभिक जांच की आवश्यकता व्यक्त की थी।
  • निर्मल सिंह काहलों मामले में, जस्टिस एस.बी. सिन्हा ने कहा था कि सीबीआई नियमावली के अनुसार प्रारंभिक जांच पूरी होने पर ही प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
  • ललिता कुमारी मामले में, चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम ने संज्ञेय अपराध की सूचना पर तत्काल एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य बताया था।
  • यशवंत सिन्हा मामले में, जस्टिस के.एम. जोसेफ ने माना था कि भ्रष्टाचार के आरोपों में सीधे प्राथमिकी दर्ज करने से बचना एक अपवाद हो सकता है।
  • मनागीपेट मामले में, जस्टिस हेमंत गुप्ता ने निर्णय दिया था कि सभी मामलों में प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं है।
  • चरणसिंह मामले में, जस्टिस एम.आर. शाह (जिसमें जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ भी शामिल थे) ने भ्रष्टाचार के मामलों में एफआईआर से पहले जांच को वांछनीय माना था।
  • के. वीरास्वामी मामले में, जस्टिस के. जगन्नाथ शेट्टी (जस्टिस वेंकटचलैया के साथ) ने चार्जशीट से पहले आरोपी को स्पष्टीकरण का अधिकार देने की दलील को खारिज कर दिया था।
  • भारत संघ बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में, जस्टिस अरुण मिश्रा ने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच को गैर-कानूनी बताया था।
  • विनोद दुआ बनाम भारत संघ मामले में, जस्टिस यू.यू. ललित ने पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले एक अतिरिक्त-कानूनी समिति बनाने की मांग को अस्वीकार कर दिया था।

याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत पूर्व के विभिन्न अंतरिम आदेशों के संबंध में पीठ ने स्पष्ट किया कि वे केवल अंतरिम आदेश थे और उनमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा थोममंद्रू हन्ना विजयलक्ष्मी, श्री चेन्नाकेशव एच.डी., और के. वीरास्वामी मामलों में स्थापित कानून पर विचार नहीं किया गया था, इसलिए वे इस मामले में लागू नहीं होते।

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। तदनुसार, रिट याचिका को खारिज कर दिया गया।

केस का विवरण:

  • केस का शीर्षक: दीना नाथ यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 4156/2026
  • पीठ: जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव
  • दिनांक: 21 मई, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles