नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामला: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज की, कहा- बाल यौन हिंसा से पीड़ित का भविष्य तबाह हो जाता है

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति की नियमित जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा उनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास पर गहरा असर डालती है तथा उनका भविष्य पूरी तरह तबाह कर देती है। 21 जुलाई को जारी अपने आदेश में जस्टिस सुमित गोयल की पीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले ऐसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत याचिका पर विचार करते समय अदालतों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।

पीड़ित बच्चे के बयान को बताया महत्वपूर्ण साक्ष्य

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि समाज के व्यापक हितों की रक्षा करना और पीड़ितों को न्याय दिलाना ऐसे मामलों में सर्वोपरि है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि पीड़ित बच्चे ने निचली अदालत के सामने अपनी बात को बिना किसी विरोधाभास के मजबूती से रखा है, जो इस चरण में एक महत्वपूर्ण और विश्वसनीय साक्ष्य है।

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इसके साथ ही अदालत ने बचाव पक्ष की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें मेडिकल रिपोर्ट में पेनिट्रेटिव असॉल्ट का जिक्र न होने की बात कही गई थी। पीठ ने कहा कि मेडिकल साक्ष्यों का परीक्षण और अभियोजन पक्ष के दावे पर इसका प्रभाव पूरे मुकदमे के दौरान विस्तृत जांच का विषय है, जिसे केवल जमानत के स्तर पर आधार बनाकर याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।

झूठे बहाने से बुलाकर किया था उत्पीड़न

यह मामला फरवरी 2025 का है, जब आरोपी ने कथित तौर पर एक नाबालिग बच्चे को झूठे बहाने से बहला-फुसलाकर एक सुनसान जगह पर बुलाया और उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना के बाद आरोपी ने बच्चे को गंभीर अंजाम भुगतने की धमकी दी और किसी से कुछ न कहने के लिए डराया-धमकाया। इस डर के कारण बच्चा कुछ समय तक खामोश रहा।

बाद में बच्चे ने इस घटना की जानकारी शिकायतकर्ता को दी, जिसके बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। जांच के दौरान पीड़ित बच्चे का मेडिकल परीक्षण कराया गया, सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उसके आधिकारिक बयान दर्ज किए गए और अन्य साक्ष्य जुटाए गए। इसके बाद पुलिस ने 16 फरवरी 2025 को आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

अदालत के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता इंदर प्रीत सिंह ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है और उनका इस अपराध से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में पेनिट्रेटिव असॉल्ट की पुष्टि नहीं हुई है, जिससे अभियोजन की कहानी संदेहास्पद हो जाती है। वकील ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी 16 फरवरी 2025 से लगातार हिरासत में है और मामले के कुल 25 में से 14 गवाहों (जिनमें पीड़ित और शिकायतकर्ता भी शामिल हैं) की गवाही पूरी हो चुकी है।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए अपर महाधिवक्ता अधिराज सिंह थिंद ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आरोपी पर लगे आरोप बेहद गंभीर श्रेणी के हैं और एफआईआर में उसका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पूरी जांच के दौरान आरोपी की भूमिका सुसंगत रही है और पीड़ित बच्चे ने अदालत में गवाही के दौरान अभियोजन के पक्ष का पूरी तरह समर्थन किया है।

मामले के गंभीर स्वरूप, कानून के तहत तय कड़ी सजा के प्रावधानों और पीड़ित के गवाही समर्थन को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी नियमित जमानत पाने का हकदार नहीं है और उसकी याचिका निरस्त कर दी।

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