मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक संपत्ति विवाद में अपीलीय अदालत की उस टिप्पणी की कड़ी आलोचना की है, जिसमें कहा गया था कि परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य मुकदमे से जुड़े जरूरी कदम उठाने के लिए किसी कम उम्र की महिला सदस्य पर निर्भर नहीं हो सकते। हाईकोर्ट ने इस सोच को लैंगिक पक्षपातपूर्ण और महिला की क्षमता को कमतर आंकने वाला बताया।
जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने 1 अक्टूबर को दूसरी अपील स्वीकार करते हुए 18 दिन की देरी के आधार पर पहली अपील खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया।
मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा था। अपीलकर्ता महिला वंशजों के कानूनी वारिस हैं और उन्होंने विवादित संपत्ति में हिस्सा मांगते हुए दावा किया था कि वह पैतृक संपत्ति है।
ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था कि अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि संपत्ति पैतृक थी।
इसके बाद पहली अपील दायर की गई, लेकिन वह तय समय सीमा से 18 दिन देरी से दाखिल हुई। अतिरिक्त जिला जज ने मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना ही अपील खारिज कर दी।
महिला की बीमारी के कारण हुई थी देरी
देरी माफ करने के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत दायर आवेदन में कहा गया था कि परिवार की जो महिला मुकदमे का काम देख रही थी, वह गंभीर रूप से बीमार हो गई थी। इसी वजह से अपील समय पर दाखिल नहीं हो सकी।
हालांकि फैसले की प्रमाणित प्रति पहले ही प्राप्त कर ली गई थी, लेकिन महिला की बीमारी के कारण आगे की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाई।
पहली अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया कि बीमारी की प्रकृति साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं को बीमारी से संबंधित सबूत पेश करने का अवसर दिए बिना उनकी दलील खारिज नहीं की जा सकती थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष निकालने से पहले कि अपीलकर्ता देरी का कारण साबित नहीं कर पाए, उन्हें साक्ष्य पेश करने का अवसर देना जरूरी था।
महिला सदस्य की क्षमता पर संदेह को कोर्ट ने बताया अनुचित
हाईकोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत की उस सोच पर भी आपत्ति जताई कि परिवार के अन्य सदस्य मुकदमे की कार्रवाई के लिए महिला सदस्य पर निर्भर नहीं हो सकते थे।
जस्टिस शुक्ला ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आधार नहीं था, जिससे इस निष्कर्ष को सही ठहराया जा सके।
कोर्ट ने कहा कि यह टिप्पणी केवल अनुमान और धारणाओं पर आधारित थी और कानून में ऐसी सोच को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि यह तर्क स्वभाव से ही लैंगिक पक्षपातपूर्ण था और इससे परिवार की महिला सदस्य की क्षमता को कमतर आंका गया।
मामला फिर पहली अपीलीय अदालत को भेजा गया
हाईकोर्ट ने दूसरी अपील स्वीकार करते हुए मामले को पहली अपीलीय अदालत के पास वापस भेज दिया।
अदालत को निर्देश दिया गया कि वह देरी माफ करने के आवेदन पर पक्षकारों को, यदि वे चाहें, साक्ष्य पेश करने का अवसर दे और उसके बाद कानून के अनुसार फैसला करे।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि 18 दिन की देरी माफ कर दी जाती है, तो पहली अपीलीय अदालत पक्षकारों को सुनकर अपील का फैसला उसके गुण-दोष के आधार पर करे।

