मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाली एक महिला की तीन साल की जेल की सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दे दी है। महिला पर अपने पति के खिलाफ पूर्व में दर्ज कराए गए दुष्कर्म के मामले में अदालत के समक्ष मुकरने और असत्य साक्ष्य देने के आरोप में सजा सुनाई गई थी। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने फैसले में माना कि महिला और उसका पति सामाजिक अलगाव के बावजूद दो छोटे बच्चों के साथ रह रहे हैं, ऐसे में अपील पर अंतिम सुनवाई होने तक उसकी सजा को स्थगित रखना उचित होगा।
हाईकोर्ट का रुख और जमानत का आधार
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने 17 अगस्त को महिला की सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से अंतरधार्मिक विवाह किया है और परिवारों का समर्थन न मिलने के बावजूद वे पति-पत्नी के रूप में साथ रहकर अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि मुख्य अपील की अंतिम सुनवाई पूरी होने में काफी समय लगेगा। महिला का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और निचली अदालत ने भी उसकी सजा को 22 अगस्त 2026 तक के लिए निलंबित कर रखा था। इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने अपील के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना महिला को जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया।
पारिवारिक दबाव और एफआईआर की पृष्ठभूमि
यह विवाद एक अंतरधार्मिक प्रेम संबंध से शुरू हुआ था। दोनों पक्षों ने अपनी मर्जी से घर छोड़ दिया था और शादी करना चाहते थे, लेकिन उनके परिवारों और समाज की ओर से तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। इसी सामाजिक दबाव और पारिवारिक खींचतान के बीच, महिला ने 21 मई 2018 को पुरुष के खिलाफ विवाह का झूठा आश्वासन देकर यौन संबंध बनाने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने इसके आधार पर आईपीसी की धारा 376 और 376(2)(एन) के तहत मामला दर्ज किया था।
मुकदमे के दौरान बयान से पलटना और दोषसिद्धि
ट्रायल के दौरान महिला अपने शुरुआती आरोपों से पूरी तरह मुकर गई। उसने अदालत में बयान दिया कि उसने यह शिकायत अपने परिवार के दबाव में दर्ज कराई थी और वह अपनी मर्जी से पुरुष के साथ गई थी तथा उसी के साथ रहना चाहती थी। महिला और अन्य गवाहों के आरोपों का समर्थन न करने के कारण निचली अदालत ने पुरुष को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
हालांकि, पुरुष के बरी होने के पश्चात निचली अदालत ने गलत सूचना देने और अदालत के समक्ष झूठी गवाही देने के लिए महिला के खिलाफ ही कानूनी कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने महिला को आईपीसी की धारा 182 और धारा 193 के तहत दोषी ठहराते हुए क्रमशः एक महीने और तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।
याचिकाकर्ता की दलीलें और वर्तमान स्थिति
हाईकोर्ट में दायर याचिका में महिला की ओर से अधिवक्ता पूजा शर्मा ने तर्क प्रस्तुत किया कि निचली अदालत का दोषसिद्धि का फैसला कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। उन्होंने दलील दी कि अपील के निस्तारण में काफी समय लगने की संभावना है, इसलिए याचिकाकर्ता की सजा को निलंबित किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने पाया कि महिला अपने घर-परिवार और बच्चों की देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी संभाल रही है और परिजनों का सहयोग न होने के बावजूद अपना जीवन सामान्य बनाने का प्रयास कर रही है। अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए महिला की जमानत अर्जी मंजूर कर ली।

