पारिवारिक विवादों में सिर्फ अदालती फैसले काफी नहीं, मध्यस्थता की भूमिका अहम: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि न्याय प्रणाली में पारिवारिक विवादों का स्वरूप अन्य मुकदमों से काफी अलग होता है। ऐसे विवाद अदालती फैसले (डिक्री) के साथ शायद ही कभी पूरी तरह समाप्त होते हैं, और खासकर बच्चों से जुड़े मामलों में दोनों पक्षों को बार-बार अदालतों का रुख करना पड़ता है।

जस्टिस भुइयां रविवार को ‘पारिवारिक विवादों में एडीआर बनाम न्यायिक निर्णय: चुनौतियां और आगे की राह’ विषय पर आयोजित पूर्वी क्षेत्र क्षेत्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे।

व्यावसायिक और पारिवारिक मुकदमों में अंतर

जस्टिस भुइयां ने रेखांकित किया कि कानूनी व्यवस्था में पारिवारिक मामलों की स्थिति काफी भिन्न है। दो व्यावसायिक इकाइयों के बीच होने वाले विवाद आम तौर पर अदालती डिक्री या पंचाट (अवार्ड) आने के बाद खत्म हो जाते हैं और दोनों पक्ष अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। इसके विपरीत, पारिवारिक मामले इतने सीधे नहीं होते, विशेषकर तब जब उनमें बच्चे शामिल हों।

उन्होंने कहा कि बच्चे की कस्टडी, मिलने का अधिकार (विजिटेशन राइट्स), भरण-पोषण और शिक्षा से जुड़े सवाल दोनों पक्षों को बार-बार अदालत के सामने लाते हैं।

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सालों के मनमुटाव की परिणति हैं अदालत पहुंची अर्जियां

सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि अदालत के रिकॉर्ड में दिखने वाली तलाक या कस्टडी की अर्जी अक्सर किसी लंबे व्यक्तिगत संघर्ष का अंतिम चरण होती है। मामला जब तक अदालत की चौखट तक पहुंचता है, तब तक दोनों पक्षों के बीच वर्षों की असहमतियां, निराशा और अविश्वास पनप चुका होता है।

व्यावहारिक अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हर पारिवारिक विवाद का सबसे बेहतर समाधान सिर्फ अदालती फैसले से नहीं हो सकता।

आदेशों की सीमा और मध्यस्थता की अहमियत

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जस्टिस भुइयां ने समझाया कि अदालत यह तो तय कर सकती है कि बच्चा किसके साथ रहेगा, लेकिन माता-पिता को बच्चे के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य के फैसलों पर आने वाले कई सालों तक आपस में संवाद करना ही पड़ता है। इसी तरह अदालत भरण-पोषण की राशि तय कर सकती है, मगर दोनों पक्षों का संबंध कई वर्षों तक बना रहता है। यह निरंतर चलने वाला रिश्ता ही पारिवारिक विवादों को अन्य प्रकार के मुकदमों से अलग बनाता है और यहीं मध्यस्थता (मीडिएशन) का महत्व सबसे अधिक बढ़ जाता है।

हिंसा और गंभीर मामलों में अदालती निर्णय अपरिहार्य

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इसके साथ ही जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली में औपचारिक न्यायिक निर्णय (अड्जुडिकेशन) का बेहद महत्वपूर्ण और अपूरणीय स्थान है, जिसे नकारा नहीं जा सकता।

उन्होंने जोर देकर कहा कि जहां घरेलू हिंसा, दबाव या गंभीर दुर्व्यवहार के आरोप हों, वहां अदालत का संरक्षण अनिवार्य हो जाता है। ऐसे संवेदनशील मामलों में अदालती निर्णय प्रक्रिया को केवल पक्षों से समझौते की उम्मीद के भरोसे नहीं बदला जा सकता।

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