रिव्यू पिटीशन अपील का मुखौटा नहीं, तय मुद्दों पर दोबारा बहस करने की अनुमति नहीं दी जा सकती: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस एस. एम. सुब्रमण्यम और जस्टिस शमीम अहमद शामिल हैं, ने स्पष्ट किया है कि रिव्यू याचिका का उपयोग किसी मामले के गुणों-दोषों पर फिर से बहस करने या किसी गलती को सुधारने के बहाने दोबारा सुनवाई की मांग करने के लिए नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के वेतनमान लाभों से संबंधित तमिलनाडु सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। कोर्ट ने दोहराया कि नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 47 नियम 1 के तहत समीक्षा क्षेत्राधिकार केवल रिकॉर्ड के चेहरे पर स्पष्ट या प्रत्यक्ष त्रुटियों को सुधारने तक सीमित है, न कि अपने दृष्टिकोण को बदलने या अंतिम रूप से तय हो चुके फैसलों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला लोक निर्माण विभाग (PWD) के तहत तंजावुर जिले (कुंभकोणम जल संसाधन विभाग) में विभिन्न योजनाओं के तहत काम कर रहे 12 दैनिक वेतनभोगी ‘नॉमिनल मस्टर रोल’ (NMR) कर्मचारियों से जुड़ा है। बाद में PWD को लोक निर्माण विभाग और जल संसाधन विभाग (WRD) में विभाजित कर दिया गया था। राज्य सरकार ने लंबे समय से सेवा दे रहे एनएमआर कर्मचारियों के प्रमाणन विवरण की जांच के लिए विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से राज्यव्यापी अभियान चलाया था। इसके बाद सरकार ने 6 दिसंबर 2019 को सरकारी आदेश (G.O. Ms. No. 233) जारी किया, जिसके तहत 3,407 सत्यापित एनएमआर कर्मचारियों को स्वीपर और अन्य निचले स्तर के कर्मचारियों के समान नियमितीकरण और 18,500 रुपये प्रति माह का न्यूनतम समय वेतनमान प्रदान किया गया।

निजी प्रतिवादी—के. कलामनी और 11 अन्य—2011, 2012, 2013 या 2014 से एनएमआर कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे और इनमें से कई 10 वर्षों से अधिक समय से लगातार काम कर रहे थे। हालांकि, उनका नाम जी.ओ. एमएस नंबर 233 से बाहर छूट गया था। जब कर्मचारियों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(d) के तहत समान काम के लिए समान वेतन की मांग को लेकर विभाग से संपर्क किया, तो सक्षम प्राधिकारी ने 10 अप्रैल 2023 के आदेश द्वारा उनके अनुरोध को खारिज कर दिया।

इस फैसले से व्यथित होकर कर्मचारियों ने रिट याचिका संख्या 27781/2022 दायर की। 31 जनवरी 2025 के आदेश के तहत रिट कोर्ट ने अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया और विभाग को निर्देश दिया कि वह जी.ओ. एमएस नंबर 233 के लाभ याचिकाकर्ताओं को प्रदान करे। राज्य सरकार ने इस फैसले को रिट अपील संख्या 65/2026 में चुनौती दी। 20 जनवरी 2026 को डिवीजन बेंच ने अपील खारिज करते हुए कहा कि एक बार जब एनएमआर कर्मचारियों को विभाग की योजनाओं के तहत लगाया जाता है, तो उन्हें PWD/WRD का सीधा कर्मचारी माना जाएगा। कोर्ट ने दो महीने के भीतर आदेश का पालन करने का निर्देश दिया था। इसी 20 जनवरी 2026 के फैसले की समीक्षा के लिए राज्य सरकार ने समीक्षा आवेदन संख्या 175/2026 दायर किया था।

पक्षों की दलीलें

राज्य सरकार की ओर से पेश विशेष सरकारी वकील ए. आर. सुरेश ने तर्क दिया कि हालांकि प्रतिवादी कई वर्षों से लगातार कार्यरत थे, लेकिन उनकी नियुक्ति सीधे PWD/WRD द्वारा नहीं बल्कि ठेकेदारों के माध्यम से की गई थी, जो उन्हें वेतन का भुगतान करते थे। इसलिए राज्य का तर्क था कि वे जी.ओ. एमएस नंबर 233 के तहत लाभ के हकदार नहीं हैं। राज्य ने रिट याचिका संख्या (MD) 8092/2020 में 1 अक्टूबर 2020 के एकल पीठ के आदेश का हवाला दिया, जहां प्रत्यक्ष सेवा प्रमाणन के अभाव में एनएमआर कर्मचारियों के दावों को खारिज कर दिया गया था।

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कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता एल. चंद्रकुमार पेश हुए।

कोर्ट का विश्लेषण और नजीरें

खंडपीठ ने नोट किया कि रिट कार्यवाही के दौरान विभाग ने स्वीकार किया था कि संबंधित अवधि के दौरान प्रतिवादियों को एनएमआर के रूप में नियुक्त किया गया था और उनकी निरंतर सेवा को विभागीय इंजीनियरों द्वारा प्रमाणित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादियों ने विभागीय देखरेख के बिना विशुद्ध रूप से संविदात्मक आधार पर काम किया था। एकल पीठ के 2020 के आदेश का अंतर स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने बताया कि उस मामले में याचिकाकर्ता 10 साल की सेवा का प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहे थे, जबकि वर्तमान मामले में सभी प्रतिवादियों की सेवा की निरंतरता विभाग द्वारा प्रमाणित एक अविवादित तथ्य है।

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सीपीसी के आदेश 47 नियम 1 के वैधानिक दायरे का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि समीक्षा याचिका को अपील का मुखौटा बनाने या तय हो चुके मुद्दों को फिर से खोलने का अवसर नहीं बनाया जा सकता।

पीठ ने समीक्षा क्षेत्राधिकार से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख किया:

तुंगभद्रा इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (AIR 1964 SC 1372) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:

“पुनरीक्षण किसी भी तरह से अपील का छद्म रूप नहीं है जिसके तहत किसी गलत फैसले पर दोबारा सुनवाई करके उसे सुधारा जाए, बल्कि यह केवल स्पष्ट त्रुटि के लिए ही पोषणीय है।”

अरिबम तुलेश्वर शर्मा बनाम अरिबम पिशक शर्मा (1979 (4) SCC 389) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि हालांकि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को न्याय के गर्भपात को रोकने या गंभीर और स्पष्ट गलतियों को सुधारने के लिए पुनरीक्षण की शक्ति प्राप्त है, लेकिन इस शक्ति की सीमाएं तय हैं। कोर्ट ने कहा था कि समीक्षा केवल नए और महत्वपूर्ण साक्ष्य की खोज पर या रिकॉर्ड पर दिख रही प्रत्यक्ष गलती के आधार पर की जा सकती है, लेकिन इसे इस आधार पर लागू नहीं किया जा सकता कि फैसला गुणों-दोषों के आधार पर गलत था।

इसी सिद्धांत को मीरा भंजा बनाम निर्मला कुमारी चौधरी (AIR 1995 SC 455) में दोहराया गया था।

पर्सियन देवी व अन्य बनाम सुमित्री देवी व अन्य (1997 (8) SCC 715) में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि जिस गलती को पकड़ने के लिए तर्क की लंबी प्रक्रिया की आवश्यकता हो, उसे रिकॉर्ड के चेहरे पर स्पष्ट त्रुटि नहीं माना जा सकता।

राजेंद्र कुमार बनाम रामबाई (AIR 2003 SC 2095) में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब तक आदेश में कोई प्रत्यक्ष त्रुटि न हो और उसे बनाए रखने से न्याय की विफलता न होती हो, तब तक फैसले की अंतिम सत्यता को बाधित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने लिली थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (AIR 2000 SC 1650) और इंदरचंद जैन बनाम मोतीलाल ((2009) 4 SCC 665) का भी हवाला दिया और दोहराया कि समीक्षा शक्ति का उद्देश्य गलतियों को सुधारना है, न कि किसी दृष्टिकोण को बदलना।

कमलेश वर्मा बनाम मायावती व अन्य (2013 (8) SCC 320) में सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा सिद्धांतों का सार प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया था:

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“समीक्षा याचिकाएं अपील के रूप में नहीं होती हैं और उन्हें सीपीसी के आदेश 47 नियम 1 के दायरे तक ही सीमित रहना होगा। समीक्षा क्षेत्राधिकार में फैसले के दृष्टिकोण से महज असहमति ही इसे लागू करने का आधार नहीं हो सकती। जब तक किसी बिंदु पर पहले ही विचार और निर्णय किया जा चुका है, पक्षकार इस बहाने से फैसले को चुनौती देने के हकदार नहीं हैं कि समीक्षा क्षेत्राधिकार के तहत एक वैकल्पिक दृष्टिकोण संभव है।”

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि आदेश 47 नियम 1 CPC के तहत “किसी अन्य पर्याप्त कारण” अभिव्यक्ति का अर्थ छज्जू राम बनाम नेकी (AIR 1922 PC 112), मोरोन मार बेसेलियोस कैथोलिकोस बनाम मोस्ट रेव. मार पॉलोज अथानासियस व अन्य (AIR 1954 SC 526) और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम संदूर मैंगनीज एंड आयरन ओर्स लिमिटेड व अन्य (2013 (8) SCC 337) के अनुसार वही नियम में निर्दिष्ट कारणों के समान ही होना चाहिए।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि समीक्षा याचिका में उठाए गए आधार राज्य द्वारा उन्हीं तर्कों को दोबारा दोहराने का एक प्रयास मात्र थे, जिन्हें रिट याचिका और रिट अपील दोनों में पहले ही खारिज किया जा चुका था। सीपीसी के आदेश 47 नियम 1 के मापदंडों के भीतर रिकॉर्ड पर कोई प्रत्यक्ष त्रुटि या गलती न पाते हुए कोर्ट ने समीक्षा याचिका को गुण-दोष रहित मानते हुए खारिज कर दिया। इससे जुड़े सिविल विविध आवेदन संख्या 22043/2026 को भी बिना किसी लागत के बंद कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: तमिलनाडु राज्य व अन्य बनाम के. कलामनी व अन्य
वाद संख्या: रिव्यू एप्लिकेशन नंबर 175/2026
पीठ: जस्टिस एस. एम. सुब्रमण्यम, जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 12-08-2026

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