सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक पूर्व न्यायिक अधिकारी की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित अपने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि न्याय तक पहुंच का अधिकार समाज के हर वर्ग के लिए एक समान है, चाहे वह कोई बस कंडक्टर हो या फिर राज्य का मुख्य सचिव।
संवैधानिक समानता के दायरे में तरजीह नहीं
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि संवैधानिक समानता के दायरे में अदालत किसी व्यक्ति विशेष के लिए अलग से हस्तक्षेप नहीं करेगी। पीठ ने कहा कि यदि किसी एक याचिकाकर्ता के मामले को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया जाता है, तो यह उन अन्य वादकारियों के साथ अन्याय होगा जो अदालतों में अपनी बारी आने का धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहे हैं।
हाईकोर्ट में मुकदमों के भारी बोझ का दिया गया था हवाला
यह मामला पूर्व न्यायिक अधिकारी की सेवा समाप्ति (बर्खास्तगी) की चुनौती से जुड़ा है, जो वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट में मुकदमों का अत्यधिक बोझ होने के कारण इस मामले पर अब तक अंतिम निर्णय नहीं हो सका है, इसलिए सर्वोच्च अदालत को इसमें शीघ्र सुनवाई का निर्देश देना चाहिए।
उचित मंच पर गुहार लगाने की स्वतंत्रता
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को सीधे हाईकोर्ट के समक्ष ही अपनी बात रखनी चाहिए और वहीं शीघ्र सुनवाई का अनुरोध करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सक्षम न्यायिक मंच के समक्ष अपने मामले को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

