बहू का साझा घर में रहने का अधिकार असीमित नहीं, इसे वरिष्ठ नागरिक के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के साथ संतुलित करना होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि बहू का साझा घर में रहने का अधिकार असीमित नहीं है और इसे वरिष्ठ नागरिक के सामान्य एवं शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार के साथ संतुलित करके देखा जाना चाहिए। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने एक बहू को उसकी सास की संपत्ति से बेदखल करने के आदेश को बरकरार रखते हुए दिल्ली में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े बेदखली प्रावधानों की वैधता को भी कायम रखा।

हाईकोर्ट ने पुनम की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 7 जुलाई 2022 के डिविजनल कमिश्नर के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में उन्हें अपनी सास की संपत्ति खाली कर शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता ने दिल्ली मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन्स रूल्स, 2009 के नियम 22(3)(1)(i) और (iv) की वैधता को भी चुनौती दी थी।

क्या था मामला

याचिकाकर्ता की शादी अप्रैल 1996 में प्रतिवादी नंबर 2 के बेटे से हुई थी। बाद में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद उत्पन्न हुआ। इसके बाद वर्ष 2018 में याचिकाकर्ता ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत कार्यवाही शुरू की और अन्य राहतों के साथ साझा घर में रहने के अधिकार की मांग की।

उन्होंने साकेत कोर्ट स्थित महिला कोर्ट में धारा 19 के तहत निवास आदेश की मांग करते हुए अपनी सास को उन्हें गौतम नगर, नई दिल्ली स्थित साझा घर से बेदखल करने से रोकने का अनुरोध किया था।

इसके बाद सास ने 2009 के नियमों के नियम 22(3)(1) के तहत बहू को घर से बेदखल करने की कार्यवाही शुरू की। जिला मजिस्ट्रेट ने फरवरी 2021 में यह आवेदन खारिज कर दिया था।

हालांकि, डिविजनल कमिश्नर ने जुलाई 2022 में वरिष्ठ नागरिक की अपील स्वीकार करते हुए बहू को संपत्ति खाली करने का आदेश दिया। इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी।

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बहू ने साझा घर में रहने के अधिकार का दिया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 17 किसी महिला को साझा घर में रहने का अधिकार देती है, चाहे उस संपत्ति में उसका कोई स्वामित्व, हक या लाभकारी हित हो या नहीं।

यह भी कहा गया कि धारा 19 के तहत उनका निवास संबंधी आवेदन अभी लंबित है, इसलिए उस पर फैसला हुए बिना उन्हें घर से बेदखल नहीं किया जा सकता था।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम में स्पष्ट रूप से बेदखली का प्रावधान नहीं है, इसलिए राज्य सरकार ने नियम बनाकर ऐसी शक्ति प्रदान कर अपनी सीमा से बाहर जाकर काम किया है।

वरिष्ठ नागरिक को भी शांतिपूर्ण जीवन का अधिकार

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कहा कि डिविजनल कमिश्नर ने यह निष्कर्ष दर्ज किया था कि याचिकाकर्ता के पास बहादुरगढ़ में अलग मकान है और वह पोस्ट ग्रेजुएट टीचर के रूप में कार्यरत हैं तथा पर्याप्त आय अर्जित करती हैं।

डिविजनल कमिश्नर ने यह भी दर्ज किया था कि वरिष्ठ नागरिक अपनी शेष जिंदगी शांति से बिताना चाहती हैं और बेटे तथा बहू के वैवाहिक विवाद के कारण उन्हें मुकदमों और शिकायतों में नहीं घसीटा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा:

“यदि याचिकाकर्ता और उनके पति के बीच वैवाहिक विवाद के कारण प्रतिवादी नंबर 2 अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी पा रही हैं, जबकि उन्हें शांति से रहने का अधिकार है और उन्हें अपने बेटे तथा बहू के वैवाहिक विवाद से परेशान नहीं किया जाना चाहिए, तो हमारी राय में याचिकाकर्ता की बेदखली का आदेश सही तरीके से पारित किया गया है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि साझा घर में रहने का याचिकाकर्ता का दावा ऐसा अधिकार नहीं है जिसे किसी भी परिस्थिति में समाप्त न किया जा सके।

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बेंच ने कहा:

“साझा घर में रहने का उनका दावा असीमित नहीं है और इसे प्रतिवादी नंबर 2, जो एक वरिष्ठ नागरिक हैं, के सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।”

सीनियर सिटिजन्स रूल्स के बेदखली प्रावधान वैध

हाईकोर्ट ने 2009 के नियमों के नियम 22(3)(1)(i) और (iv) को असंवैधानिक या मूल कानून से परे मानने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 22 और 32 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था बनाने का अधिकार है।

बेंच ने कहा कि नियमों के तहत जिला मजिस्ट्रेट को ऐसी परिस्थितियों में बेटे, बेटी या कानूनी वारिस को संपत्ति से बेदखल करने की शक्ति देना वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के उद्देश्य से जुड़ा है।

कोर्ट ने कहा:

“यदि नियम 22(3)(1) यह प्रावधान करता है कि कुछ परिस्थितियों में वरिष्ठ नागरिक के आवेदन पर जिला मजिस्ट्रेट बेदखली का आदेश पारित कर सकता है, तो हमारी राय में इस नियम को वरिष्ठ नागरिक अधिनियम से परे नहीं कहा जा सकता।”

घरेलू हिंसा कानून और वरिष्ठ नागरिक कानून में संतुलन जरूरी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के S. Vanitha मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया था कि घरेलू हिंसा अधिनियम और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत मिलने वाले अधिकारों को एक-दूसरे के विरोध में नहीं बल्कि सामंजस्यपूर्ण तरीके से पढ़ा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि किसी महिला का साझा घर में निवास का दावा केवल वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत संक्षिप्त बेदखली कार्यवाही के जरिए स्वतः समाप्त नहीं किया जा सकता और दोनों पक्षों के प्रतिस्पर्धी अधिकारों पर विचार किया जाना आवश्यक है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने Ravi Kant Gupta, Samtola Devi, Rajeswar Prasad Roy और Kamalakant Mishra मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए बेदखली की शक्ति पर विचार किया गया था।

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बहू भी नियम के दायरे से बाहर नहीं

याचिकाकर्ता ने यह दलील भी दी कि नियम 22(3)(1) में केवल बेटे, बेटी और कानूनी वारिस का उल्लेख है, इसलिए बहू को इसके तहत बेदखल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने Shadab Khairi और Darshna मामलों में अपने पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन नियमों की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती। इसमें इस्तेमाल किए गए शब्दों को वरिष्ठ नागरिक के बेटे या बेटी के परिवार तक विस्तृत रूप में समझा जाना चाहिए।

मेंटेनेंस मांगे बिना भी हो सकती है बेदखली की कार्यवाही

हाईकोर्ट ने यह दलील भी स्वीकार नहीं की कि जब तक वरिष्ठ नागरिक मेंटेनेंस की मांग न करे, तब तक बेदखली का आदेश नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत मेंटेनेंस की कार्यवाही और नियम 22(3)(1) के तहत बेदखली की कार्यवाही अलग-अलग हैं।

बेंच ने कहा:

“चूंकि दोनों कार्यवाहियां एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं, इसलिए भले ही वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत मेंटेनेंस की मांग न की गई हो, फिर भी 2009 के नियमों के नियम 22(3)(1) के तहत आवेदन बनाए रखने योग्य है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि डिविजनल कमिश्नर का आदेश सही तरीके से पारित किया गया था और उसमें हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। इसके साथ ही याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।

Case Title: Punam v. Divisional Commissioner, GNCT of Delhi & Ors.

Case No.: W.P.(C) 11683/2022

Bench: चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया

Date: 30 सितंबर 2026

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