हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेना और रेलवे में नौकरी दिलाने का झांसा देकर पैसे लेने और कथित तौर पर फर्जी नियुक्ति दस्तावेज देने के मामले में दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोप केवल निजी विवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर समाज पर पड़ सकता है।
जस्टिस राकेश कैंथला ने राम चंद और अन्य की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने पीड़ितों के साथ हुए समझौते के आधार पर FIR और उससे जुड़ी आगे की कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरी दिलाने का भरोसा देकर पैसे लेना और उस भरोसे को मजबूत करने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करना ऐसा मामला है, जो बड़ी संख्या में बेरोजगार लोगों को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR में आरोप है कि सरकारी नौकरी का लालच दिया गया और पैसे हासिल करने के लिए फर्जी दस्तावेज भी जारी किए गए। ऐसे में विवाद को केवल निजी या व्यावसायिक प्रकृति का नहीं माना जा सकता।
सेना और रेलवे में नौकरी दिलाने का था आरोप
कांगड़ा में दर्ज FIR में धोखाधड़ी, जालसाजी, साक्ष्य नष्ट करने या छिपाने और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए थे।
FIR के मुताबिक, राम चंद और नरेश कुमार ने शिकायतकर्ता और दो अन्य लोगों को भारतीय रेलवे और सेना में नौकरी दिलाने का भरोसा दिया था।
आरोप है कि राम चंद ने एक पीड़ित से भर्ती प्रक्रिया को लेकर बातचीत की और सिक्योरिटी डिपॉजिट के नाम पर पैसे मांगे। इसके बाद शिकायतकर्ता और पीड़ितों ने अलग-अलग रकम उसके खाते में जमा की।
बाद में उन्हें जालंधर बुलाया गया, जहां बताया गया कि कोविड-19 के कारण भर्ती प्रक्रिया में देरी हो गई है। नौकरी पक्की कराने के नाम पर आगे भी पैसे मांगे गए।
पीड़ितों को बाद में सेना और रेलवे में नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज भेजे गए।
पुलिस जांच में ये दस्तावेज फर्जी पाए गए और यह सामने आया कि उन्हें सक्षम अधिकारियों ने जारी नहीं किया था। इसके बाद पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।
समझौते के बाद पीड़ितों ने जताई थी FIR रद्द करने पर सहमति
बाद में पीड़ितों ने कोर्ट के सामने कहा कि उन्होंने आरोपियों के साथ अपनी इच्छा से और बिना किसी दबाव के समझौता किया है। उन्होंने समझौते के आधार पर FIR रद्द किए जाने पर भी आपत्ति नहीं जताई।
राम चंद की ओर से पेश एडवोकेट दीक्षित सहोत्रा ने दलील दी कि पक्षकारों के बीच समझौता हो चुका है, इसलिए FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियां रद्द कर दी जानी चाहिए।
राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल तरुण पाठक ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह अपराध निजी प्रकृति का नहीं है। आरोपियों द्वारा सेना से संबंध दर्शाने वाले कथित फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और मामले का व्यापक सार्वजनिक असर है।
हाईकोर्ट ने माना मामला केवल निजी विवाद नहीं
हाईकोर्ट ने राज्य की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि आरोपों की प्रकृति दो निजी पक्षों के बीच विवाद से कहीं आगे जाती है।
कोर्ट ने कहा कि नौकरी दिलाने का भरोसा देना, उस भरोसे को समर्थन देने के लिए कथित तौर पर दस्तावेजों की जालसाजी करना और इसके आधार पर पैसे लेना ऐसा कृत्य है, जो समाज में बड़ी संख्या में बेरोजगार लोगों को प्रभावित कर सकता है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आरोपियों और पीड़ितों के बीच बाद में हुए समझौते के आधार पर FIR रद्द नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

