पत्नी के पिता के पैसों से पूरी तरह खरीदी गई संपत्ति, संयुक्त नाम की सेल डीड के बावजूद पत्नी की विशेष संपत्ति घोषित हो सकती है: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी संपत्ति की पूरी खरीद राशि पत्नी के पिता ने उसकी भलाई और लाभ के लिए दी हो, तो केवल इस आधार पर पति उसमें बराबर का हकदार नहीं हो जाता कि सेल डीड पति-पत्नी दोनों के संयुक्त नाम पर है। जस्टिस सतीश निनन और जस्टिस पी. कृष्ण कुमार की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के आदेश में बदलाव करते हुए पत्नी को संबंधित मकान और जमीन की विशेष मालिक घोषित किया और पति को तीन महीने के भीतर संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया।

यह मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें पत्नी ने सोने के आभूषण, रकम, पिछला भरण-पोषण और संयुक्त नाम से खरीदी गई एक आवासीय संपत्ति को लेकर राहत मांगी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों पक्षों की शादी 15 सितंबर 2012 को मुस्लिम रीति के अनुसार हुई थी। पत्नी का कहना था कि शादी के समय उसके पास 85 सोवरेन सोने के आभूषण थे और बाद में उसने इनमें से 80 सोवरेन पति को सुरक्षित रखने के लिए दिए थे।

उसका यह भी कहना था कि उसके पिता ने पति को कुछ रकम दी थी और मंजेरी नगरपालिका क्षेत्र में सात सेंट की आवासीय संपत्ति खरीदने के लिए पूरा पैसा भी उपलब्ध कराया था। पत्नी के अनुसार, पूरी खरीद राशि उसके पिता ने दी थी, लेकिन वैवाहिक रिश्ते के हित में संपत्ति पति और पत्नी दोनों के संयुक्त नाम पर खरीदी गई।

पति ने इन दावों से इनकार किया। उसका कहना था कि सोने के आभूषण पत्नी के पास ही रहे और संपत्ति उसने अपने पैसों से खरीदी थी। उसने यह भी दावा किया कि पारिवारिक हित में संपत्ति दोनों के नाम पर दर्ज कराई गई थी।

पति ने ₹3 लाख की वसूली के लिए प्रतिदावा भी किया। उसका कहना था कि उसने यह राशि पत्नी के पिता के खाते में जमा की थी।

फैमिली कोर्ट ने पत्नी के सोने, रकम और पिछला भरण-पोषण संबंधी दावों को खारिज कर दिया। पति का ₹3 लाख का प्रतिदावा भी खारिज हुआ। हालांकि, कोर्ट ने माना कि संपत्ति पत्नी के पिता द्वारा जुटाए गए पैसों से खरीदी गई थी और पत्नी को पति के आधे हिस्से के बदले ₹15 लाख देने का आदेश दिया।

दोनों पक्षों ने फैसले के अपने-अपने खिलाफ हिस्सों को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सोने के आभूषण का दावा साबित नहीं हुआ

80 सोवरेन सोने के आभूषण वापस दिलाने की मांग पर हाईकोर्ट ने कहा कि पति को आभूषण सौंपे जाने के संबंध में केवल पत्नी की मौखिक गवाही थी, जिसे पति ने स्पष्ट रूप से नकार दिया था।

कोर्ट ने पति के भाई की शादी से जुड़ी तस्वीरों और पत्नी की जिरह में दिए गए जवाबों पर भी गौर किया। बेंच ने फैमिली कोर्ट की इस राय से सहमति जताई कि आभूषण पति को सौंपे जाने की कहानी विश्वसनीय नहीं लगती।

“हमें यह दावा संभावित नहीं लगता कि याचिकाकर्ता ने अपने सोने के आभूषण प्रतिवादी को सौंपे थे।”

इस आधार पर हाईकोर्ट ने सोने के आभूषणों की वापसी की मांग खारिज कर दी।

पत्नी का यह दावा भी स्वीकार नहीं किया गया कि उसके पिता ने पति को ₹5.5 लाख दिए थे। कोर्ट ने कहा कि मौखिक गवाही के अलावा इस दावे के समर्थन में भरोसेमंद सामग्री नहीं थी।

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इसी तरह, पति का ₹3 लाख का प्रतिदावा भी खारिज रहा क्योंकि वह यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी के पिता के खाते में जमा की गई रकम पत्नी की ओर से या उसके लिए दी गई थी।

पत्नी की 13 महीने के पिछले भरण-पोषण की मांग में भी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

बैंक रिकॉर्ड से पत्नी के पिता द्वारा भुगतान की पुष्टि

हाईकोर्ट के सामने मुख्य विवाद उस आवासीय संपत्ति को लेकर था जो पति और पत्नी दोनों के नाम पर खरीदी गई थी।

पत्नी के पिता ने गवाही दी कि उन्होंने नीलांबुर को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक से रकम जुटाकर संपत्ति खरीदी थी। बैंक खाते के रिकॉर्ड से पता चला कि 9 नवंबर 2015 को, जिस दिन सेल डीड हुई, उनके खाते से ₹25 लाख डेबिट हुए थे। रिकॉर्ड में यह भी था कि 2 नवंबर 2015 को उनके खाते में ₹25 लाख जमा हुए थे, जो संभवतः ऋण के रूप में आए थे।

इसके विपरीत, पति अपनी ओर से कथित रूप से दी गई खरीद राशि का स्रोत साबित नहीं कर सका।

जिरह के दौरान उसने कहा कि पैसा उसका था, लेकिन उसके साले के पास रखा था, जो उसके साथ विदेश में काम करता था। हाईकोर्ट ने कहा कि उस व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया और यह दिखाने के लिए कोई दस्तावेज भी नहीं दिए गए कि पैसा भारत कैसे लाया गया।

कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि मूल टाइटल डीड पत्नी के पास थी और वही उसे सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से लेकर आई थी।

इन तथ्यों के आधार पर बेंच ने माना कि संपत्ति पत्नी के लिए और उसके पिता द्वारा उपलब्ध कराए गए पैसों से खरीदी गई थी।

फैमिली कोर्ट साक्ष्य अधिनियम के कड़े नियमों से परे भी सामग्री देख सकता है

पति की ओर से तर्क दिया गया कि संपत्ति की वास्तविक खरीद राशि को लेकर पत्नी का दावा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 92 के कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता।

उसकी ओर से कहा गया कि सेल डीड में संपत्ति की कीमत ₹7.58 लाख दर्ज थी और कोर्ट इसके विपरीत किसी अन्य रकम को स्वीकार नहीं कर सकता।

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हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 92 सामान्य तौर पर किसी लिखित दस्तावेज की शर्तों को बदलने, घटाने या बढ़ाने के लिए मौखिक या अन्य साक्ष्य पेश करने पर रोक लगाती है।

हालांकि, बेंच ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 14 का उल्लेख किया। इसके तहत फैमिली कोर्ट ऐसी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज, जानकारी या अन्य सामग्री को भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, जो विवाद को प्रभावी रूप से तय करने में मदद करे, भले ही वह सामान्य तौर पर साक्ष्य अधिनियम के तहत स्वीकार्य न हो।

हाईकोर्ट ने कहा:

“एक बार फैमिली कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंच जाए कि ऐसी सामग्री विवाद को प्रभावी रूप से तय करने के लिए जरूरी है, तो वह फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 के तहत धारा 92 से परे जाकर उस सामग्री पर भरोसा कर सकता है।”

हालांकि, कोर्ट ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह शक्ति असीमित नहीं है।

“फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 भले ही फैमिली कोर्ट को ऐसी सामग्री स्वीकार करने की विवेकाधीन शक्ति देती है जो धारा 92 के तहत अन्यथा अस्वीकार्य हो सकती है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग उचित सावधानी और सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने Pramod E.K. v. Louna V.C. के फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि फैमिली कोर्ट को तर्क, निष्पक्षता, व्यवहारिकता और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करना ही होगा।

पूरी खरीद राशि पत्नी के पिता ने दी थी

साक्ष्यों का आकलन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी और उसके पिता की गवाही, जिसे बैंक रिकॉर्ड से पर्याप्त समर्थन मिला, यह साबित करती है कि संपत्ति की पूरी खरीद राशि पत्नी के पिता ने दी थी।

कोर्ट ने यह भी माना कि यह संपत्ति पत्नी के हित और उसकी भलाई के लिए खरीदी गई थी।

बेंच ने Shereefa Shanavaz v. Shanavaz के पुराने फैसले पर भी विचार किया, जिसमें संयुक्त नाम वाली संपत्ति में दोनों पक्षों को बराबर का सह-मालिक माना गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि वह निष्कर्ष उस मामले की खास परिस्थितियों में दिया गया था।

कोर्ट ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 45 और Vasanthakumary v. Omanakuttan Nair के फैसले का भी उल्लेख किया।

बेंच ने कहा:

“वर्तमान मामले में यह साबित हो गया है कि पूरी खरीद राशि याचिकाकर्ता के पिता ने अपनी बेटी के हित और उसके लाभ के लिए दी थी और वह संपत्ति उसी की है।”

हाईकोर्ट ने पत्नी को विशेष मालिक घोषित किया

फैमिली कोर्ट ने पहले यह माना था कि पत्नी संपत्ति पर विशेष स्वामित्व की घोषणा मांग सकती थी, लेकिन उसने इसके बजाय पति के आधे हिस्से के मूल्य के रूप में ₹15 लाख की मांग की थी।

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हाईकोर्ट में पत्नी ने अपनी याचिका में संशोधन कर विशेष स्वामित्व की घोषणा और पति को संपत्ति खाली करने का निर्देश देने की मांग की।

पति ने इसका विरोध किया और कहा कि संशोधन बहुत देर से मांगा गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक विवादों में कोर्ट की भूमिका सामान्य दीवानी मुकदमों से कुछ अलग होती है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 10(3) का भी उल्लेख किया, जिसके तहत फैमिली कोर्ट विवादित तथ्यों की सच्चाई तक पहुंचने के लिए अपनी प्रक्रिया तय कर सकता है।

बेंच ने पाया कि पत्नी की मूल याचिका में ही यह साफ कहा गया था कि उसके पिता ने पूरी खरीद राशि दी और पति ने कोई पैसा नहीं लगाया। इसलिए मूल दलीलों में विशेष स्वामित्व का दावा पहले से मौजूद था।

कोर्ट ने कहा कि इस स्थिति में औपचारिक संशोधन स्वीकार किए बिना भी पत्नी को विशेष मालिक घोषित करने में कोई बाधा नहीं है।

Order VII Rule 7 CPC और Syamini S. Nair v. Sreekanth R. का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा कि न्याय के हित में उचित राहत दी जा सकती है।

“न्याय के हित में हमें यह निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि वर्तमान मामले में राहत को इस तरह ढाला जाना चाहिए कि याचिकाकर्ता को संपत्ति का विशेष मालिक घोषित किया जाए और उसे उसका खाली कब्जा प्राप्त करने की अनुमति दी जाए।”

इसके बाद हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और पत्नी की अपील आंशिक रूप से मंजूर कर ली।

कोर्ट ने पत्नी को 2.8 एर जमीन और उस पर बने मकान की विशेष मालिक घोषित किया और पति को तीन महीने के भीतर संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया। फैमिली कोर्ट द्वारा पति के हिस्से के बदले पत्नी को ₹15 लाख देने वाले आदेश में इसी के अनुसार बदलाव किया गया, जबकि फैसले के बाकी हिस्से बरकरार रखे गए।

केस टाइटल: Kurudankandi Shamseer v. Raslin / Raslin v. Kurudankandi Shameer

केस नंबर: Mat. Appeal Nos. 84 & 581 of 2022

बेंच: जस्टिस सतीश निनन और जस्टिस पी. कृष्ण कुमार

तारीख: 26 सितंबर 2026

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