SARFAESI नीलामी में अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन हो तो बिक्री को अंतिमता का संरक्षण नहीं मिल सकता: सुप्रीम कोर्ट ने ऊटी रिजॉर्ट की बिक्री रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी नीलामी बिक्री को अंतिमता और कानूनी संरक्षण तभी मिल सकता है, जब पूरी नीलामी प्रक्रिया कानून के अनुसार की गई हो। जस्टिस पमिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने ऊटी स्थित एक रिजॉर्ट की नीलामी बिक्री को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि SARFAESI Act और Security Interest (Enforcement) Rules, 2002 के तहत तय अनिवार्य प्रक्रिया का कई स्तर पर उल्लंघन हुआ था। कोर्ट ने Sterling Holiday Resorts Limited की अपीलें मंजूर कर लीं और खरीदार M/s P.M. Associates की अपीलें खारिज कर दीं।

मामला तमिलनाडु के ऊटी स्थित ‘The Fernhill’ रिजॉर्ट से जुड़ा था। Sterling Holiday Resorts ने ऋण के लिए इस संपत्ति को IFCI और Tourism Finance Corporation of India Limited के पक्ष में गिरवी रखा था। भुगतान में चूक के बाद IFCI ने SARFAESI Act के तहत कार्रवाई शुरू की।

नीलामी प्रक्रिया और विवाद

मार्च 2010 में IFCI ने रिजॉर्ट की नीलामी के लिए नोटिस जारी किया। रिजर्व प्राइस 20 करोड़ रुपये तय की गई और नीलामी की तारीख 28 अप्रैल 2010 रखी गई।

हालांकि, 7 अप्रैल 2010 को Debts Recovery Appellate Tribunal ने Sterling को 1 करोड़ रुपये जमा करने की शर्त पर IFCI को SARFAESI Act के तहत आगे की कार्रवाई करने से रोक दिया। Sterling ने 8 अप्रैल को रकम जमा कर दी, जिसके बाद रोक प्रभावी हो गई।

इसके बावजूद IFCI ने नीलामी नोटिस के तहत बोलियां स्वीकार कीं, हालांकि उन्हें उस समय खोला नहीं गया।

बाद में 6 सितंबर 2011 को मद्रास हाईकोर्ट ने DRAT का आदेश रद्द कर दिया। इसके छह दिन बाद 12 सितंबर 2011 को IFCI ने बोलियां खोलीं और रुक्मणी खेमचंद को सफल बोलीदाता घोषित किया।

उसी दिन 20,00,10,000 रुपये की पूरी बिक्री राशि M/s P.M. Associates ने जमा की और बाद में बिक्री प्रमाणपत्र भी इसी फर्म के नाम जारी कर दिया गया।

Sterling ने बाद में IFCI का पूरा बकाया चुका दिया। फरवरी 2012 में IFCI ने बिक्री प्रमाणपत्र रद्द कर दिया और P.M. Associates को बिक्री राशि ब्याज सहित वापस कर दी।

P.M. Associates ने इस कार्रवाई को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 2013 में माना कि बिक्री प्रमाणपत्र वैध रूप से जारी किया गया था और Authorised Officer के पास उसे एकतरफा रद्द करने की शक्ति नहीं थी।

इसके बाद Sterling और खरीदार दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

Sterling ने नीलामी की वैधता पर उठाए सवाल

Sterling की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि P.M. Associates नीलामी प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं थी क्योंकि बोली रुक्मणी खेमचंद ने व्यक्तिगत हैसियत से दी थी।

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यह भी कहा गया कि P.M. Associates नाम की साझेदारी फर्म 12 सितंबर 2011 को ही अस्तित्व में आई, यानी उसी दिन जब बोलियां खोली गईं।

Sterling ने यह भी तर्क दिया कि IFCI ने DRAT की रोक के बावजूद नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाई और सितंबर 2011 में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद नया बिक्री नोटिस जारी किया जाना चाहिए था।

दूसरी ओर, P.M. Associates की ओर से सीनियर एडवोकेट आर. गुरु कृष्ण कुमार ने कहा कि Authorised Officer को बिक्री प्रमाणपत्र रद्द करने का अधिकार नहीं था।

उन्होंने कहा कि 16 सितंबर 2011 को बिक्री प्रमाणपत्र जारी होने के साथ ही Sterling का संपत्ति छुड़ाने का अधिकार समाप्त हो गया था और इस बात से Sterling को कोई नुकसान नहीं हुआ कि संपत्ति आखिरकार एक व्यक्ति के बजाय साझेदारी फर्म के नाम गई।

SARFAESI के तहत तय प्रक्रिया का सख्ती से पालन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले का निर्णायक सवाल यह था कि 25 मार्च 2010 के नीलामी नोटिस से शुरू होकर 16 सितंबर 2011 को बिक्री प्रमाणपत्र जारी होने तक पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार की गई थी या नहीं।

कोर्ट ने Rules 8 और 9 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि secured asset की बिक्री से जुड़ी प्रक्रिया अनिवार्य है।

“Rules 8 और 9 का पालन अनिवार्य है और इनका पूरी सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने कहा कि SARFAESI Act secured creditor को बिना कोर्ट के हस्तक्षेप के borrower की संपत्ति पर कब्जा लेने और उसे बेचने की असाधारण शक्ति देता है। इसलिए इस शक्ति पर लगाए गए प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपाय केवल औपचारिकता नहीं हैं।

“ये सुरक्षा उपाय ही उस शक्ति के अस्तित्व और उसके इस्तेमाल की बुनियादी शर्त हैं।”

DRAT की रोक के दौरान बोली लेना अवैध

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रुक्मणी खेमचंद की बोली उस समय स्वीकार की गई जब DRAT की रोक प्रभावी थी।

कोर्ट ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया कि IFCI ने केवल बोलियां प्राप्त की थीं और उन्हें खोला नहीं था। कोर्ट के अनुसार बोली और earnest money स्वीकार करना भी बिक्री प्रक्रिया का हिस्सा था।

“प्रभावी रोक आदेश का उल्लंघन करके प्राप्त की गई बोली किसी वैध बिक्री की नींव नहीं बन सकती।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में हाईकोर्ट का IFCI के पक्ष में आया फैसला उस कार्रवाई को पिछली तारीख से वैध नहीं बना सकता था, जो रोक आदेश लागू रहने के दौरान की गई थी।

30 दिन की अनिवार्य अवधि पूरी नहीं हुई

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कोर्ट ने Rule 9(1) का भी उल्लंघन पाया। इस नियम के तहत बिक्री नोटिस के प्रकाशन या borrower को नोटिस दिए जाने के 30 दिन पूरे होने से पहले बिक्री नहीं हो सकती।

25 मार्च 2010 के नीलामी नोटिस और 7 अप्रैल 2010 की DRAT रोक के बीच केवल 13 दिन गुजरे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस अवधि में रोक लागू थी, उसे 30 दिन की गणना में शामिल नहीं किया जा सकता। इसलिए 6 सितंबर 2011 को रोक हटने के बाद Sterling को बाकी 17 दिन मिलने चाहिए थे। यह अवधि 23 सितंबर 2011 को पूरी होती।

लेकिन बोलियां 12 सितंबर को खोल दी गईं और बिक्री प्रमाणपत्र 16 सितंबर को जारी कर दिया गया।

“यह केवल तकनीकी चूक नहीं है। 30 दिन की अवधि वही समय है जिसमें borrower अपनी संपत्ति छुड़ाने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। इस अवधि को कम करना Section 13(8) द्वारा सुरक्षित मूल अधिकार पर चोट करता है।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि 12 सितंबर 2011 को बोलियां खोले जाने की Sterling को कोई सूचना नहीं दी गई, जबकि मूल नीलामी तारीख के लगभग 17 महीने बाद प्रक्रिया फिर शुरू की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी अवधि के बाद borrower को जानकारी दिए बिना बिक्री प्रक्रिया चलाना Rules 8(6) और 9(1) के उद्देश्य के खिलाफ था। इन नियमों का मकसद borrower को बिक्री की जानकारी देना है ताकि वह बकाया चुका सके, प्रक्रिया में हिस्सा ले सके या बेहतर प्रस्ताव सामने ला सके।

बोली किसी और ने लगाई, बिक्री प्रमाणपत्र फर्म के नाम जारी हुआ

सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण खामी यह पाई कि नीलामी में रुक्मणी खेमचंद ने व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लिया था, लेकिन बिक्री प्रमाणपत्र P.M. Associates के नाम जारी किया गया।

कोर्ट ने कहा कि न तो Rule 9 और न ही नीलामी नोटिस सफल बोलीदाता को किसी तीसरे पक्ष को nominee बनाकर संपत्ति उसके नाम लेने की अनुमति देता था।

इतना ही नहीं, P.M. Associates मूल नीलामी की तारीख 28 अप्रैल 2010 को अस्तित्व में भी नहीं थी। यह फर्म 12 सितंबर 2011 को बनी थी।

“जो इकाई बोलियां आमंत्रित और प्राप्त किए जाने के समय अस्तित्व में ही नहीं थी, उसकी पात्रता का आकलन नहीं किया जा सकता था और वह नीलामी में हिस्सा भी नहीं ले सकती थी।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मूल नीलामी रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए। अन्य योग्य बोलीदाताओं या उनके बीच होने वाली inter se bidding का भी कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं था, जबकि नीलामी नोटिस में ऐसी प्रक्रिया का प्रावधान था।

अवैध नीलामी को कानूनी संरक्षण नहीं मिल सकता

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सुप्रीम कोर्ट ने सभी खामियों को एक साथ देखते हुए कहा कि यह बिक्री न केवल संबंधित Rules बल्कि नीलामी नोटिस की शर्तों के भी खिलाफ थी।

“ऐसी नीलामी प्रक्रिया को कानून में किसी प्रकार की पवित्रता या संरक्षण नहीं दिया जा सकता।”

कोर्ट ने माना कि उसके पहले के कई फैसलों में confirmed auction sales की अंतिमता को महत्व दिया गया है, ताकि सार्वजनिक नीलामी व्यवस्था में विश्वास बना रहे। लेकिन यह सिद्धांत तभी लागू होता है जब नीलामी कानून के अनुसार हुई हो।

“नीलामी की पवित्रता कानून के पालन से मिलती है, वह कानून का विकल्प नहीं हो सकती।”

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि Sterling ने IFCI का पूरा बकाया चुका दिया था, रिजॉर्ट का कब्जा हमेशा Sterling के पास रहा और P.M. Associates ने बिक्री राशि ब्याज सहित वापस लेकर उसे भुना लिया था।

Borrower और IFCI के बीच मिलीभगत की दलील को भी कोर्ट ने निराधार माना।

Article 300A का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून के अधिकार के तहत ही वंचित किया जा सकता है।

“जो बिक्री कानून द्वारा तय प्रक्रिया की अनदेखी करती है, उसे कानून के अधिकार के तहत संपत्ति से वंचित करना नहीं माना जा सकता।”

नीलामी प्रक्रिया को ही अवैध पाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Authorised Officer द्वारा बिक्री प्रमाणपत्र रद्द करने की शक्ति, बिक्री प्रमाणपत्र के registration और redemption के अधिकार के खत्म होने के सही चरण जैसे अन्य सवालों पर फैसला देना जरूरी नहीं था।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने 23 अगस्त 2013 के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। Sterling Holiday Resorts की अपीलें मंजूर की गईं और P.M. Associates की अपीलें खारिज कर दी गईं।

कोर्ट ने संबंधित contempt petitions पर भी आगे कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। Sterling के Thomas Cook (India) Limited में amalgamation से जुड़ी SLP को भी विवाद समाप्त हो जाने के कारण खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने costs को लेकर कोई आदेश नहीं दिया।

केस टाइटल: Sterling Holiday Resorts Limited v. M/s P.M. Associates & Ors.

केस नंबर: Civil Appeal Nos. 10077-10078 of 2014 with connected matters

बेंच: जस्टिस पमिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

तारीख: 30 सितंबर 2026

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