मद्रास हाईकोर्ट की मंजूरी: 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 28 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति मिली

मद्रास हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 14 साल की यौन उत्पीड़न पीड़िता को 28 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इतनी कम उम्र में पीड़िता को जबरन गर्भ ढोने के लिए मजबूर करना उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि मेडिकल बोर्ड से हरी झंडी मिलते ही तुरंत गर्भपात की प्रक्रिया शुरू की जाए।

यह आदेश जस्टिस मोहम्मद शफ़ीक ने 7 जुलाई को पीड़िता की मां की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया।

संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि 14 साल की बच्ची को उसकी मर्जी के खिलाफ गर्भधारण जारी रखने के लिए विवश करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। वर्तमान में लड़की करीब 28.1 सप्ताह की गर्भवती है।

पीड़िता और उसकी मां दोनों ने ही गर्भपात के लिए अपनी पूरी सहमति दी थी। लड़की काफी समय से अस्पताल में भर्ती थी, लेकिन इसके बावजूद संबंधित अस्पताल प्रशासन ने गर्भपात की पात्रता तय करने के लिए आवश्यक मेडिकल बोर्ड का गठन नहीं किया था। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए अस्पताल को तुरंत बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए।

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चिकित्सीय मंजूरी और कानूनी पक्ष

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के प्रतिनिधि और वकील जेवी शक्ति बालकृष्णन ने कोर्ट को सूचित किया कि डॉक्टरों के एक विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन कर दिया गया है। यह बोर्ड फिलहाल लड़की के स्वास्थ्य की जांच कर रहा है। डॉक्टरों से हरी झंडी मिलते ही पीड़िता का सुरक्षित गर्भपात करा दिया जाएगा।

दूसरी तरफ, पीड़िता की पैरवी कर रहीं वकील दीपिका मुरली ने कोर्ट के समक्ष एक कानूनी उदाहरण भी रखा। उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट पूर्व में भी लगभग इसी तरह की परिस्थितियों में 30 सप्ताह की गर्भवती नाबालिग लड़की को गर्भपात की अनुमति दे चुका है।

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी कार्रवाई

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अदालती दस्तावेजों के अनुसार, पीड़िता के साथ उसके ही एक रिश्तेदार ने दुष्कर्म किया था, जिसके कारण वह गर्भवती हो गई। इस मामले में 2 जुलाई 2026 को एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसके बाद मामला बाल कल्याण समिति के पास भेजा गया। पीड़िता की मानसिक व शारीरिक स्थिति को देखते हुए विशेष पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने बाल यौन शोषण रोकथाम और उपचार केंद्र को उसका ‘सपोर्ट पर्सन’ नियुक्त किया है ताकि उसे जरूरी मदद मिल सके।

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