सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 के तहत किसी बैंकिंग कंपनी का विलय (अमलगमेशन) किराए के परिसर के कब्जे को दूसरे को सौंपने जैसा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसा ट्रांसफर मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना किया जाता है, तो यह दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 के तहत किराएदार को बेदखल करने का आधार बनता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने मकान मालिक ‘ब्रिटिश मोटर कार कंपनी (1939) लिमिटेड’ द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के खिलाफ बेदखली के आदेश को बहाल कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद साल 1947 से शुरू होता है, जब मकान मालिक ब्रिटिश मोटर कार कंपनी (1939) लिमिटेड ने नई दिल्ली के कनॉट सर्कस स्थित प्रताप बिल्डिंग के एन-ब्लॉक में एक गैर-आवासीय व्यावसायिक जगह हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक (एचसीबी) को 585 रुपये प्रति माह के किराए पर दी थी। इस परिसर में ग्राउंड फ्लोर पर 2,443.75 वर्ग फुट और मेजेनाइन फ्लोर पर 1,150.25 वर्ग फुट की जगह शामिल थी।
18 दिसंबर 1986 को भारत सरकार ने बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 45(7) के तहत एक राजपत्र अधिसूचना जारी की, जिसके अनुसार एचसीबी का विलय पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) में कर दिया गया। यह विलय योजना 19 दिसंबर 1986 से प्रभावी हुई, जिसके तहत एचसीबी की सभी संपत्तियां, अधिकार, देनदारियां और किराएदारी पीएनबी में निहित हो गईं। इसके बाद पीएनबी ने इस परिसर का भौतिक कब्जा ले लिया।
साल 1987 में मकान मालिक ने दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 की धारा 14(1)(b) के तहत बेदखली की याचिका दायर की। मकान मालिक का तर्क था कि एचसीबी ने बिना उनकी पूर्व लिखित सहमति के इस परिसर को पीएनबी को ट्रांसफर कर दिया या कब्जा सौंप दिया है।
एडिशनल रेंट Controller ने 1995 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। उनका मानना था कि यह वैधानिक विलय मकान मालिक पर बाध्यकारी था और यह उप-किराएदारी की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि, साल 2001 में एडिशनल रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल ने अपील पर इस फैसले को पलट दिया और बेदखली का आदेश जारी कर दिया। ट्रिब्यूनल ने माना कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट के विशेष प्रावधान अन्य समझौतों पर प्रभावी होते हैं और इसके लिए लिखित सहमति अनिवार्य है।
पीएनबी ने इस फैसले को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। साल 2012 में हाईकोर्ट ने पीएनबी की याचिका स्वीकार करते हुए बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का निष्कर्ष था कि यह विलय केंद्र सरकार (तीसरे पक्ष) का एक अनैच्छिक और वैधानिक कार्य था, जिस पर किराएदार का कोई नियंत्रण नहीं था। इसके बाद मकान मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता-मकान मालिक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं श्याम दीवान और श्याम मेहता ने तर्क दिया कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 14(1)(b) किराए के परिसर के स्वैच्छिक और अनैच्छिक ट्रांसफर के बीच कोई अंतर नहीं करती है। जैसे ही एचसीबी का अस्तित्व समाप्त हुआ और पीएनबी ने बिना मकान मालिक की लिखित सहमति के कब्जा ले लिया, वैसे ही अनधिकृत रूप से कब्जा सौंपने की कानूनी शर्तें पूरी हो गईं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सिंगर इंडिया लिमिटेड बनाम चंदर मोहन चड्ढा और परसराम हरनंद राव बनाम शांति प्रसाद नरिंदर कुमार जैन के फैसलों पर भरोसा जताया। उन्होंने यह भी कहा कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के तहत बनाई गई विलय योजना प्रशासनिक प्रकृति की होती है, न कि विधायी, जैसा कि के.आई. शेफर्ड बनाम भारत संघ मामले में तय किया गया है, और इसलिए यह रेंट कंट्रोल कानून को दरकिनार नहीं कर सकती।
दूसरी ओर, प्रतिवादी-बैंक के वकील राजेश कुमार गौतम ने तर्क दिया कि किराएदारी के अधिकारों का ट्रांसफर किराएदार के किसी स्वैच्छिक कदम या समझौते का परिणाम नहीं था, बल्कि यह बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के तहत एक वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ था। उन्होंने जी. श्रीधरमूर्ति बनाम हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि वैधानिक प्रक्रिया के तहत होने वाले ट्रांसफर स्वैच्छिक ट्रांसफर के अंतर्गत नहीं आते, इसलिए इन्हें रेंट कंट्रोल कानून के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपना ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि क्या बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत एचसीबी का पीएनबी में विलय दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 14(1)(b) के दायरे में आता है, जो किराएदार को मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना कब्जा किसी अन्य को सौंपने से रोकती है।
वैशाखी राम बनाम संजीव कुमार भटियानी मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 14(1)(b) के लिए दो मुख्य शर्तें पूरी होनी चाहिए: पहली, किराएदार ने परिसर को उप-किराए पर दिया हो या उसका कब्जा किसी और को सौंपा हो; और दूसरी, ऐसा मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना किया गया हो। कोर्ट ने पाया कि विलय के बाद ट्रांसफर करने वाला बैंक (एचसीबी) एक कॉरपोरेट इकाई के रूप में समाप्त हो गया और उसने मकान मालिक से बिना लिखित सहमति लिए परिसर का पूरा नियंत्रण पीएनबी को सौंप दिया।
पीठ ने पीएनबी के इस बचाव को खारिज कर दिया कि यह ट्रांसफर अनैच्छिक और वैधानिक था। परसराम हरनंद राव मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“धारा 14(1)(b) की भाषा इतनी व्यापक है कि इसमें न केवल कोई उप-किराएदारी बल्कि ट्रांसफर या कोई भी अन्य तरीका शामिल है जिसके द्वारा किराए के परिसर का कब्जा सौंपा जाता है। धारा 14(1)(b) के व्यापक दायरे को देखते हुए, हमारा यह स्पष्ट मानना है कि यह किसी अनिच्छुक या जबरन बिक्री को भी बाहर नहीं रखता है।”
इसी सिद्धांत को सिंगर इंडिया लिमिटेड मामले में दिए गए निर्णय से भी बल मिला, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि:
“किराएदार का यह कदम स्वैच्छिक था या नहीं और ऐसा करने के कारण क्या थे, यह पूरी तरह से अप्रासंगिक है और इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।”
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि:
“यह कानून किसी ऐसे किराएदार के पक्ष में कोई अपवाद नहीं बनाता है जिसने कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए ऐसा रास्ता अपनाया हो।”
विलय योजना की प्रकृति के संबंध में पीठ ने के.आई. शेफर्ड मामले पर भरोसा करते हुए माना कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के तहत योजना तैयार करने की प्रक्रिया प्रशासनिक है, विधायी नहीं। इसलिए इस योजना को कोई ऐसा कानून नहीं माना जा सकता जो दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट के प्रावधानों से ऊपर हो।
कोर्ट ने इस मामले को जी. श्रीधरमूर्ति और श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी मामलों से अलग बताया, क्योंकि वे मामले ‘एस्सो एक्ट’ से संबंधित थे जो कि एक सीधा विधायी कानून था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा आशा रोहतगी बनाम न्यू बैंक ऑफ इंडिया मामले पर भरोसा करना गलत था। आशा रोहतगी मामला बैंकिंग कंपनीज (एक्विजिशन एंड ट्रांसफर ऑफ अंडरटेकिंग्स) एक्ट, 1980 के तहत हुए विलय से जुड़ा था, जो विधायी प्रकृति का है, जबकि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के तहत तैयार की गई योजनाएं वैसी नहीं हैं।
कब्जा सौंपने की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने भैरों सहाय बनाम बिशंबर दयाल मामले का हवाला दिया और कहा कि:
“मकान मालिक की सहमति के बिना परिसर का कब्जा सौंपना किराएदार को बेदखल करने के लिए पर्याप्त है, इसके लिए उप-किराएदारी या ट्रांसफर के सवाल में जाने की आवश्यकता नहीं है।”
निर्णय
दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 14(1)(b) की दोनों शर्तें पूरी होने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने 21 मई 2001 को एडिशनल रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल द्वारा पारित बेदखली के आदेश को बहाल कर दिया।
बैंक के लंबे समय से इस परिसर में होने की बात को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पीएनबी को शांतिपूर्ण ढंग से खाली परिसर सौंपने के लिए 31 जनवरी 2027 तक का समय दिया है। इसके लिए बैंक को चार सप्ताह के भीतर एक लिखित हलफनामा देना होगा और नियमित रूप से तय किराए का भुगतान करना होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: ब्रिटिश मोटर कार कंपनी (1939) लिमिटेड बनाम मैसर्स हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक लिमिटेड (जिसका अब पंजाब नेशनल बैंक में विलय हो चुका है) व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 5714/2012
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 9 जुलाई, 2026

