बिना प्रथा के सबूत के, चाचा ससुर अपनी भतीजी के पति को ‘घरदामाद’ बनाकर पैतृक संपत्ति नहीं सौंप सकते: सुप्रीम कोर्ट

आदिवासी प्रथागत उत्तराधिकार (customary tribal succession) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि उरांव समुदाय की स्थानीय प्रथाओं के तहत, कोई चाचा ससुर पैतृक संपत्ति हस्तांतरित करने के लिए अपनी भतीजी के पति को निवासी दामाद यानी ‘घरदामाद’ के रूप में गोद नहीं ले सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट और निचली अदालतों के फैसलों को खारिज करते हुए इस सिविल अपील को स्वीकार कर लिया। सुप्रीम कोर्ट ने मूल वादी के पक्ष में डिक्री जारी करते हुए स्पष्ट किया कि वैध घरदामाद या सीधे पुरुष उत्तराधिकारी की अनुपस्थिति में, बिना संतान वाले उरांव भूमि मालिक की संपत्ति करीबी पुरुष रिश्तेदारों (पुरुष गोत्रज) को हस्तांतरित होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक साझा पूर्वज सुक्खू उरांव (दादा) की पैतृक भूमि को लेकर है, जिनके तीन बेटे थे: धुंगरू बुधू उरांव, लेदुरा उरांव और भौला उरांव। मूल वादी सुक्खू (अपने दादा के नाम पर), धुंगरू का दूसरा बेटा था और उसने अपने दादा की पूरी जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया था। इस दावे का विरोध भौला की बेटी बुधैन (प्रतिवादी नंबर 1) और उसके पति पुनाई (प्रतिवादी नंबर 2, जिनकी अब मृत्यु हो चुकी है) ने किया था।

प्रतिवादियों का तर्क था कि चूंकि लेदुरा की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने पुनाई को अपना घरदामाद बना लिया था। स्थानीय उरांव प्रथाओं के तहत बेटियों को विरासत का अधिकार नहीं होता है, इसलिए प्रतिवादियों का दावा था कि लेदुरा की संपत्ति वैध रूप से पुनाई को मिल गई थी। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि भौला की मृत्यु के बाद, बुधैन और लेदुरा ने 27 फरवरी 1975 के एक दस्तावेज (विलेख) के माध्यम से संपत्तियों का आपस में बंटवारा कर लिया था। दूसरी ओर, वादी का तर्क था कि प्रतिवादियों के पास कोई वैध अधिकार नहीं था, इसलिए वह बंटवारा विलेख कानूनी रूप से अस्तित्वहीन था।

गुमला की मुंसिफ अदालत, प्रथम अपीलीय अदालत (प्रथम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, गुमला) और झारखंड हाईकोर्ट ने पुनाई को लेदुरा का घरदामाद स्वीकार करते हुए वादी के मुकदमे को खारिज कर दिया था। इसके बाद वादी के कानूनी वारिसों, जिनका प्रतिनिधित्व अपीलकर्ता बेजला उरांव कर रहे हैं, ने इन निर्णयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि परिवार संयुक्त था और सुक्खू की शाखा तथा उनके चाचाओं, लेदुरा और भौला के बीच कभी कोई बंटवारा नहीं हुआ था। आदिवासी प्रथाओं का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि उरांव जाति में बेटियों को पैतृक संपत्ति से पूरी तरह वंचित रखा जाता है और बिना संतान वाली विधवाओं को केवल भरण-पोषण का अधिकार होता है। उन्होंने दावा किया कि भौला, लेदुरा और परिवार के एक अन्य सदस्य बुरंगा की मृत्यु के बाद, वादी निकटतम जीवित पुरुष उत्तराधिकारी के रूप में पैतृक संपत्तियों का एकमात्र मालिक बन गया।

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इसके विपरीत, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि घरदामाद को प्रथा के अनुसार बेटे की तरह माना जाता है और उसे अपने ससुर की संपत्ति पर पूरा अधिकार मिल जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि वादी के पिता खुद दूसरे गांव में घरदामाद के रूप में चले गए थे और वहां संपत्ति अर्जित की थी। उन्होंने आगे तर्क दिया कि लेदुरा ने बुधैन के पक्ष में एक वैध दस्तावेज निष्पादित किया था, जिससे जमीन कानूनी रूप से हस्तांतरित हो गई थी।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों (concurrent findings) में हस्तक्षेप के अपने दायरे पर विचार किया। ‘श्रीनिवास राम कुमार बनाम महावीर प्रसाद’ मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब निचली अदालतों ने विशुद्ध रूप से तथ्यों के प्रश्नों पर समवर्ती निष्कर्ष दिए हों, तो यह अदालत आमतौर पर इन निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और तीसरी बार सबूतों की समीक्षा नहीं करेगी, जब तक कि इस सामान्य प्रक्रिया से हटने के लिए असाधारण परिस्थितियां न हों।”

कोर्ट ने इसके अलावा ‘भरवाड़ा भोगिनभाई हिरजीभाई बनाम गुजरात राज्य’, ‘सुषमा बनाम नितिन गणपति रंगोले’, ‘मिथिलेश कुमारी बनाम प्रेम बिहारी खरे’ और ‘रामचंद्रन बनाम विजयन’ के फैसलों का भी उल्लेख किया ताकि उन मापदंडों को स्पष्ट किया जा सके जिनके तहत समवर्ती निष्कर्षों को पलटा जा सकता है, खासकर जहां निष्कर्ष कानून के विपरीत हों या महत्वपूर्ण सबूतों की अनदेखी करते हों।

सबूतों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने प्रथागत मुद्दों का व्यवस्थित रूप से समाधान किया:

  1. बेटियों के विरासत अधिकार: कोर्ट ने पाया कि वादी के गवाहों ने लगातार यह माना कि बेटियों को संपत्ति का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रतिवादियों के गवाहों के बयानों में अंतर्विरोध था। इसलिए कोर्ट ने स्वीकार किया कि उरांव बेटियों को पैतृक भूमि विरासत में नहीं मिलती।
  2. घरदामाद की प्रथा: हालांकि ससुर की संपत्ति में अधिकार पाने वाले घरदामाद की प्रथा साबित हो गई थी, लेकिन मुख्य सवाल यह था कि क्या कोई चाचा ससुर अपनी भतीजी के पति को घरदामाद के रूप में गोद ले सकता है।
  3. गोद लेने का अधिकार: निचली अदालत ने विद्वान शरत चंद्र रॉय की प्रामाणिक पुस्तक ‘द उरांव ऑफ छोटानागपुर’ पर बहुत भरोसा किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने खुद को गलत दिशा में निर्देशित कर लिया था। रॉय की पुस्तक के अनुसार, घरदामाद को “अंतिम पुरुष मालिक” या उसकी विधवा द्वारा गोद लिया जाना चाहिए। बुधैन भौला की बेटी थी, जिससे पुनाई भौला का दामाद बना, न कि लेदुरा का। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो कि भौला ने पुनाई को गोद लिया था, और प्रथागत कानून के तहत यह कभी स्थापित नहीं हुआ कि कोई चाचा ससुर (लेदुरा) अपनी भतीजी के पति को घरदामाद के रूप में अपना सकता है।
  4. दस्तावेज की वैधता: कोर्ट ने माना कि 1975 का दस्तावेज चाहे पट्टा हो या बंटवारा विलेख, यह मालिकाना हक नहीं दे सकता। पट्टा विलेख से मालिकाना हक नहीं मिलता और बंटवारा केवल सह-साझेदारों (co-sharers) के बीच ही हो सकता है। चूंकि बुधैन का संपत्ति में कोई पहले से हिस्सा नहीं था, इसलिए उनके और लेदुरा के बीच कोई वैध बंटवारा नहीं हो सकता था।
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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण की आलोचना की जिसमें कहा गया था कि चूंकि चाचा ससुर द्वारा भतीजी के पति को गोद लेने पर कोई स्पष्ट प्रथागत रोक नहीं है, इसलिए कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। प्रथागत कानून में सबूत के बुनियादी नियम पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जो कोई भी किसी प्रथा का दावा करता है, उसे ही इसे साबित करना होगा। केवल यह कहना कि जो दावा किया गया है उसका विपरीत स्पष्ट रूप से नहीं लिखा है, इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे कि कोई ऐसी प्रथा है जो चाचा ससुर को अपनी भतीजी के पति को घरदामाद के रूप में गोद लेने की अनुमति देती है। एस.सी. रॉय द्वारा संकलित स्थापित आदिवासी प्रथाओं का हवाला देते हुए कोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया कि वैध घरदामाद या सीधे पुरुष वंशज की अनुपस्थिति में, निकटतम पुरुष गोत्रज ही संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है।

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परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और सिविल कोर्ट के फैसलों को खारिज कर दिया। अपील स्वीकार की गई और वादी के पक्ष में मुकदमा डिक्री कर दिया गया। दोनों पक्षों को अपना-अपना मुकदमा खर्च खुद वहन करने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: बेजला उरांव बनाम काली दास उरांव और अन्य
वाद संख्या: एसएलपी (सी) संख्या 23458/2024
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 9 जुलाई, 2026

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