मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि अधिवक्ता एकजुटता व्यक्त करने के लिए लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन वे पुलिस अधिकारियों को आरोपियों को अदालत के समक्ष पेश करने के अपने कानूनी कर्तव्य का पालन करने से नहीं रोक सकते। जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की पीठ ने पुलिस अधिकारियों का रास्ता रोकने के आरोप में 10 वकीलों के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 225 के तहत दर्ज मामले को इस शर्त पर रद्द करने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता 10 कार्य दिवसों के भीतर अपने अत्यधिक व्यवहार पर खेद व्यक्त करते हुए एक हलफनामा दाखिल करें। कोर्ट ने यह भी माना कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195 के तहत अदालत की औपचारिक शिकायत के बिना आईपीसी की धारा 186 के तहत आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं थे, और आईपीसी की धारा 152 इस मामले में लागू ही नहीं होती थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2 नवंबर 2023 को हुई एक घटना से जुड़ा है। साथानकाडु पुलिस ने एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम से संबंधित अपराध संख्या 396/2023 के सिलसिले में दिनेश और नीरज नाम के दो वकीलों को पकड़ा था। पुलिस उन्हें रिमांड के लिए एनडीपीएस कानून की विशेष अदालत के समक्ष पेश करने के उद्देश्य से हाईकोर्ट परिसर के अंदर स्थित पुलिस कंट्रोल रूम बूथ में लाई थी।
अजीत कुमार एस, सुब्बुराज के, बालाजी पी, गिरिधरन आर, विग्नेश वी, एस. कासीराजन, सुधाकर वी, विजया कुमार वी, इसाकीपांडी ए और कामेश आर नाम के 10 वकीलों ने अदालती सुरक्षाकर्मियों की चेतावनियों के बावजूद विरोध प्रदर्शन किया और पुलिस को हिरासत में लिए गए दोनों वकीलों को पेश करने से रोक दिया।
घटना के वीडियो फुटेज को देखने के बाद हाईकोर्ट की सुरक्षा समिति ने निष्कर्ष निकाला कि यह कृत्य लोक सेवकों के काम में बाधा डालने और आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता है। समिति के निर्देश पर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (प्रशासन) हरि बी. ने शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर फ्लावर बाज़ार पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 186, 152 और 225 के तहत एफआईआर (अपराध संख्या 11/2025) दर्ज की गई। याचिकाकर्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर इस एफआईआर को रद्द करने की मांग की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील आर.सी. पॉल कनगराज ने तर्क दिया कि वकील एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपने सहयोगियों की कथित गलत गिरफ्तारी के खिलाफ केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे और वे बार के साथी सदस्यों के समर्थन में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने सी. राजा बनाम राज्य और अन्य मामले में हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें टिप्पणी की गई थी:
“एक वकील का व्यवहार एक आम नागरिक के व्यवहार से हमेशा अलग होगा। जिस पद पर वह रहता है और जो काम वह करता है, उसे देखते हुए वकील ज्यादातर स्थितियों में उग्र प्रतिक्रिया देता है। यह एक ऐसा चरित्र है जो एक वकील अपने ग्राहकों के लिए किए जाने वाले कर्तव्यों के कारण विकसित करता है। कानूनी पेशे में मुवक्किलों के अधिकारों के लिए लड़ना शामिल है और वकील अदालतों के बाहर भी अधिक आक्रामक प्रतिक्रिया देते हैं। यह सच हो सकता है कि याचिकाकर्ता ने अपने मुवक्किल के अधिकारों की रक्षा के लिए खुद को अधिक मजबूती से व्यक्त किया था और केवल इसी वजह से किसी वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता की मुख्य मंशा सरकारी अधिकारियों को उनके काम से रोकना नहीं थी, बल्कि वह अपने मुवक्किल (A1) के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास कर रहा था।”
इसके अलावा याचिकाकर्ताओं के वकील ने जीवनांधम और अन्य बनाम राज्य मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 195 CrPC संबंधित अदालत के समक्ष औपचारिक शिकायत के बिना धारा 186 IPC के तहत सीधे एफआईआर दर्ज करने पर रोक लगाती है। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस ने बाद में दोनों वकीलों को बिना कोई चार्जशीट दाखिल किए स्टेशन बेल पर छोड़ दिया था, जिससे प्रदर्शन का औचित्य साबित होता है।
राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील (आपराधिक पक्ष) एम. मोहम्मद रियाज ने दलील दी कि आरोपों में ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों के साथ बल प्रयोग और मारपीट शामिल है, इसलिए इस मामले को सामान्य लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन नहीं माना जा सकता।
अदालत का विश्लेषण
कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने स्पष्ट किया कि धारा 195 CrPC के तहत, संबंधित अदालत में शिकायत के बिना आईपीसी की धारा 186 के तहत अपराध का संज्ञान लेने पर रोक है। जीवनांधम मामले के सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि धारा 186 IPC के तहत एफआईआर दर्ज ही नहीं की जा सकती थी।
आईपीसी की धारा 152 के संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह अपराध केवल तब बनता है जब किसी गैर-कानूनी सभा को तितर-बितर करने या दंगे या उपद्रव को दबाने में लगे किसी लोक सेवक को धमकाया, बाधित या उस पर हमला किया जाए। एफआईआर में ऐसे किसी कृत्य का कोई उल्लेख नहीं था।
आईपीसी की धारा 225 पर कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान तब लागू होता है जब किसी व्यक्ति की वैध गिरफ्तारी या हिरासत में रुकावट डाली जाए। कोर्ट ने कहा कि भले ही वकीलों के खिलाफ कोई ज्यादती हुई हो, उसका कानूनी तरीका उस अदालत के समक्ष उपस्थित होना था जहां उन्हें पेश किया गया था, रिमांड का विरोध करना था और कानूनी उपचार मांगना था। यद्यपि एकजुटता व्यक्त करने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति है, लेकिन वीडियो साक्ष्यों से स्पष्ट था कि वकीलों ने पुलिस को आरोपियों को पेश करने से रोका। नतीजतन, धारा 225 IPC के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता था।
अदालत का फैसला
धारा 225 IPC के तहत प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने के बावजूद, हाईकोर्ट ने विशेष परिस्थितियों पर ध्यान दिया: पुलिस ने गिरफ्तार वकीलों को रिमांड के लिए पेश करने का दोबारा कोई प्रयास नहीं किया और उन्हें स्टेशन जमानत पर छोड़ दिया; मामले में कोई अंतिम रिपोर्ट (चार्जशीट) दाखिल नहीं की गई; और घटना 2023 की थी जबकि एफआईआर 2025 में दर्ज हुई, जिससे याचिकाकर्ता तीन साल से कार्यवाही का सामना कर रहे थे।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता 10 कार्य दिवसों के भीतर अपने अत्यधिक व्यवहार पर खेद व्यक्त करते हुए हलफनामा दायर करते हैं, तो धारा 225 IPC के तहत दर्ज एफआईआर भी रद्द कर दी जाएगी।
अदालत ने याचिका का निपटारा निम्नलिखित शर्तों पर किया:
- याचिकाकर्ताओं द्वारा 2 नवंबर 2023 की घटना के लिए खेद व्यक्त करते हुए हलफनामा दाखिल करने पर अपराध संख्या 11/2025 की एफआईआर रद्द मानी जाएगी।
- यदि कोई याचिकाकर्ता हलफनामा दाखिल नहीं करता है, तो उसके खिलाफ धारा 225 IPC के तहत मामला आगे बढ़ाया जा सकता है।
- इससे जुड़ी विविध याचिका को बंद कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अजीत कुमार एस और अन्य बनाम राज्य, पुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल ओरिजिनल पिटीशन नंबर 29355/2025 और क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन नंबर 19964/2025
पीठ: जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती
निर्णय की तिथि: 5 अगस्त 2026

