कलकत्ता हाईकोर्ट ने आईटीसी लिमिटेड के लोकप्रिय ब्रांड ‘गोल्ड फ्लेक’ से मिलते-जुलते नाम और बनावट वाले ‘आईजेएम गोल्ड स्टैग’ सिगरेट की बिक्री पर लगी अंतरिम रोक को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सिगरेट निर्माता की अपील खारिज करते हुए कहा कि दोनों उत्पादों के ट्रेडमार्क और पैकेजिंग में आम उपभोक्ता को भ्रमित करने वाली पर्याप्त समानता मौजूद है।
जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने 18 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए एकल पीठ के पूर्व आदेश को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि ट्रेडमार्क उल्लंघन या पासिंग-ऑफ के मामलों में कसौटी एक सामान्य उपभोक्ता का नजरिया होता है, जो बाजार जाते समय उत्पाद के मूल ट्रेडमार्क की कोई तस्वीर जैसी स्पष्ट याददाश्त (फोटोग्राफिक मेमोरी) लेकर नहीं चलता।
पैकेट पर सीमित जगह और भ्रम की आशंका
उपभोक्ता व्यवहार का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने कहा कि सिगरेट खरीदते समय खरीदार पैकेट को समग्रता में देखता है, जिसमें उस पर छपी वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनी भी शामिल होती है। कोई भी सामान्य ग्राहक पैकेट पर मौजूद वास्तविक ट्रेडमार्क की अलग से सूक्ष्म जांच नहीं करता।
अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारत में सिगरेट के पैकेटों के 85 प्रतिशत हिस्से पर वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनी छापना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके चलते निर्माता के अपने ब्रांड और पहचान के लिए पैकेट का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा ही बचता है। अदालत ने रेखांकित किया कि जब ट्रेडमार्क इतने छोटे हिस्से तक सिमट जाता है, तो भ्रामक रूप से समान दिखने वाले दो उत्पादों के बीच अंतर पहचान पाना ग्राहक के लिए और भी कठिन हो जाता है।
इसके अलावा पीठ ने आम आबादी में वर्णांधता (कलर ब्लाइंडनेस) के अलग-अलग स्तरों का भी उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति रंगों में आसानी से भेद कर सकते हैं, वे भी दोनों उत्पादों के पीले और सुनहरे रंगों के बीच भ्रमित हो सकते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि भारत में सिगरेट का उपयोग समाज के सभी वर्गों में बड़े पैमाने पर होता है, जिससे इसका खरीदार वर्ग पूरी तरह सार्वभौमिक है। ऐसे में विजुअल समानता के कारण आम ग्राहकों में भ्रम पैदा होने की पूरी आशंका बनी रहती है।
‘गोल्ड’ शब्द और रंग संयोजन पर दोनों पक्षों के तर्क
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब आईटीसी ने ट्रेडमार्क और ट्रेड ड्रेस के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया था। आईटीसी का कहना था कि उसके स्थापित ब्रांड ‘गोल्ड फ्लेक’ के नाम और लुक की नकल करके ‘आईजेएम गोल्ड स्टैग’ को बाजार में उतारा गया है।
आईटीसी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एसएन मुखर्जी और अधिवक्ता परितोष सिन्हा ने दलील दी कि ‘गोल्ड’ शब्द कंपनी की ब्रांड पहचान का एक व्यावहारिक और अहम हिस्सा है। उन्होंने बताया कि आईटीसी वर्ष 1905 से ही अपने तंबाकू उत्पादों के साथ ‘गोल्ड’ शब्द का निरंतर और व्यापक उपयोग कर रही है, जिससे इस शब्द ने बाजार में कंपनी के संदर्भ में एक विशिष्ट द्वितीयक अर्थ (सेकेंडरी मीनिंग) हासिल कर लिया है। वकीलों ने तर्क दिया कि पैकेट के लेआउट, रंग संयोजन और डिजाइन में स्पष्ट समानता है, और सीमित 15 प्रतिशत जगह में ऐसे मिलते-जुलते निशान से भ्रम होना तय है।
वहीं अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता तिलक कुमार बोस और अधिवक्ता सौम्य राय चौधरी ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ‘गोल्ड’ एक सामान्य शब्द है और इस पर आईटीसी का कोई अलग पंजीकरण या एकाधिकार नहीं है। उन्होंने दलील दी कि आईटीसी का उत्पाद गोल्ड-ब्राउन रंग में है, जबकि अपीलकर्ता का पैकेट वर्टिकल लाल रिबन के साथ येलो-गोल्ड रंग में आता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आईटीसी के पास लाल और सुनहरे रंग के संयोजन का कोई विशेष ट्रेडमार्क पंजीकरण नहीं है।
अधिकार क्षेत्र की आपत्ति खारिज
अपीलकर्ता ने क्षेत्राधिकार को लेकर भी कानूनी चुनौती दी थी और तर्क रखा था कि उसका कारोबार पूरी तरह पंजाब तक सीमित है, इसलिए कलकत्ता हाईकोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है।
खंडपीठ ने इस आपत्ति को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि आईटीसी का मुख्य कॉर्पोरेट कार्यालय कलकत्ता हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में स्थित है और ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे साबित हो कि पंजाब में कंपनी का कोई अधीनस्थ कार्यालय मौजूद है।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ‘गोल्ड’ शब्द आईटीसी के उत्पादों के साथ जुड़कर एक द्वितीयक अर्थ पा चुका है और यह उसके ट्रेडमार्क का अभिन्न अंग बन चुका है। दोनों उत्पादों के दृश्य मिलान के आधार पर अदालत ने माना कि उनमें पर्याप्त समानता है, जिसके चलते बिक्री पर लगी अंतरिम रोक को जारी रखना आवश्यक है।

