इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोवध निवारण अधिनियम के तहत एक व्यावसायिक वाहन की जब्ती को अवैध करार देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ा झटका दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह वाहन मालिक को जब्ती की तारीख 19 सितंबर 2024 से वाहन की रिहाई तक 20,000 रुपये प्रति माह का मुआवजा दे। इसके साथ ही, मानसिक उत्पीड़न और वित्तीय संकट के एवज में 25,000 रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का भी आदेश दिया है।
जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने चंदौली के जिलाधिकारी द्वारा 6 मार्च 2025 को पारित जब्ती आदेश और वाराणसी मंडल के आयुक्त द्वारा 27 नवंबर 2025 को अपील खारिज करने के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने 5 अगस्त को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब तक कोई ठोस साक्ष्य न हो, केवल आशंकाओं के आधार पर नागरिक की संपत्ति और आजीविका के साधन को छीनना गैरकानूनी है।
बिना साक्ष्य और केवल अनुमान के आधार पर कार्रवाई
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि जब्ती की पूरी प्रक्रिया में कानून के प्रावधानों की अनदेखी की गई है। कोर्ट ने पाया कि जब्ती के समय वाहन से न तो बीफ बरामद हुआ और न ही किसी कटे हुए गोवंश के अवशेष मिले। ऐसे में गोवध अधिनियम के तहत वैधानिक धारणा लागू करने का कोई आधार ही मौजूद नहीं था।
अभियोजन पक्ष का दावा था कि मवेशियों को उत्तर प्रदेश से बिहार के बूचड़खाने ले जाया जा रहा था। इस पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि चंदौली जिला बिहार की सीमा से सटा हुआ है, यह मान लेना कि पशुओं को कटाई के लिए ही ले जाया जा रहा था, केवल मनगढ़ंत अनुमानों पर आधारित है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी ऐसा कोई दस्तावेजी साक्ष्य, चालक का बयान या स्वतंत्र गवाह पेश करने में विफल रहे जो यह साबित कर सके कि पशुओं को बिहार या किसी बूचड़खाने भेजा जा रहा था। इसके अलावा, जानवरों के घायल या असुरक्षित स्थिति में होने के राज्य सरकार के दावे को खुद पशु चिकित्सा रिपोर्ट ने खारिज कर दिया।
मामले का घटनाक्रम और अपील
यह पूरा मामला 19 सितंबर 2024 का है, जब चंदौली पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर विनोद कुमार सिंह के टाटा एस वाहन को रोका। पुलिस ने आरोप लगाया कि गाड़ी से उत्तर प्रदेश से बिहार गोवंश की अवैध तस्करी की जा रही थी। इस सिलसिले में उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
पुलिस ने वाहन से तीन गोवंश बरामद करने का दावा किया, जबकि वाहन मालिक विनोद कुमार सिंह का कहना था कि राधे श्याम नाम के व्यक्ति द्वारा कल्लूराम को बेची गई केवल एक गाय और एक बछड़े को स्थानीय स्तर पर ले जाया जा रहा था। सिंह का आरोप था कि चालक द्वारा पुलिसकर्मियों को रिश्वत देने से मना करने पर गाड़ी को झूठे मामले में फंसाया गया।
वाहन मालिक के तर्कों को खारिज करते हुए चंदौली के जिलाधिकारी ने 6 मार्च 2025 को वाहन जब्त करने का आदेश दिया। इसके बाद वाराणसी मंडल के आयुक्त ने भी 27 नवंबर 2025 को इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद पीड़ित ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आजीविका पर असर और अधिकारियों की जवाबदेही
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि टाटा एस वाहन विनोद कुमार सिंह की आजीविका का एकमात्र साधन था। गाड़ी जब्त होने के बावजूद वे नवंबर 2025 तक नियमित रूप से बैंक की लोन किस्तें भरते रहे, लेकिन बाद में गंभीर आर्थिक तंगी के कारण किस्त जमा नहीं कर सके।
अदालत ने कहा कि जब राज्य की मशीनरी गैरकानूनी तरीके से किसी नागरिक की आजीविका छीनती है, तो संवैधानिक अदालतों के पास मुआवजा देने का पूर्ण अधिकार है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को आदेश दिया कि यदि वाहन किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने के एक सप्ताह के भीतर इसे रिहा किया जाए। इसके साथ ही, राज्य सरकार को यह छूट भी दी गई है कि वह आंतरिक विभागीय जांच कराकर अवैध जब्ती के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से मुआवजे की यह राशि वसूल कर सकती है।

