कलकत्ता हाईकोर्ट ने माना है कि निजी समझौतों या अनुबंधों के तहत बकाया राशि वसूलने के लिए आपराधिक कार्रवाई को दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने 1.60 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में आरोपी व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और एफआईआर को रद्द कर दिया है।
5 अगस्त को दिए गए अपने आदेश में जस्टिस राय चट्टोपाध्याय ने स्पष्ट किया कि किसी दीवानी (सिविल) विवाद में आरोपी को पूरी आपराधिक सुनवाई से गुजारना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून का मूल उद्देश्य समाज को प्रभावित करने वाले सार्वजनिक अपराधों के लिए सजा देना है, न कि निजी अनुबंधों के तहत पैसे वसूलने का जरिया बनना। इस तरह की मुकदमों की अनुमति देने से सिविल देनदारी और आपराधिक अपराध के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा।
1.60 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप और जांच के तथ्य
यह पूरा विवाद 25 जुलाई 2023 को दर्ज कराई गई एक एफआईआर से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने खुद को जमीन का मालिक बताकर 1.60 करोड़ रुपये में जमीन का सौदा किया। शिकायत के मुताबिक, पूरी रकम लेने के बाद भी आरोपी ने जमीन हस्तांतरण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिसके बाद धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का मुकदमा दर्ज किया गया।
हालांकि, पुलिस जांच के दौरान 1.60 करोड़ रुपये के भुगतान का कोई सबूत नहीं मिला। मामले में दाखिल चार्जशीट में दर्ज किया गया कि आरोपी के बैंक खाते में केवल 40 लाख रुपये ही ट्रांसफर किए गए थे। इसके अलावा, जांचकर्ताओं को दोनों पक्षों के बीच हस्ताक्षरित एक लिखित लोन समझौता भी प्राप्त हुआ।
ऋण समझौते से बदला मामले का स्वरूप
हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि लिखित लोन समझौते से दोनों पक्षों के बीच लेनदार और देनदार (लेंडर और बरोअर) का संबंध स्थापित होता है। अदालत ने कहा कि यदि आरोपी लोन की शेष राशि चुकाने में असमर्थ भी रहता है, तो केवल इस कारण से उस पर आपराधिक अपराध का मामला नहीं बनता।
न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि संविदात्मक संबंधों से पैदा हुई सिविल देनदारी को लागू कराने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का सहारा लिया गया। हाईकोर्ट ने दोहराया कि सिविल प्रकृति के विवादों में बकाया रकम की वसूली या दबाव बनाने के लिए आपराधिक कानून का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
आरोपी की ओर से पेश वकील डॉ. अर्जुन चौधरी और प्रत्युषा दत्ता चौधरी ने अदालत में तर्क दिया कि लगाए गए आरोप झूठे हैं और यह मामला पूरी तरह से सिविल प्रकृति का है। काउंसिल ने अदालत को बताया कि 20 नवंबर 2019 को दोनों पक्षों के बीच 40 लाख रुपये का एक फ्रेंडली लोन समझौता हुआ था। वकीलों ने जानकारी दी कि आरोपी 40 लाख रुपये में से 12 लाख रुपये पहले ही चुका चुका है और बाकी बची राशि भी जल्द लौटाने की योजना है।
इस मामले में राज्य सरकार का पक्ष एडवोकेट अव्रोज्योति दास, राज्यश्री घोष और पांचाली देब सिकदार ने रखा।

