केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि नौसेना कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही में किसी मामले की जांच करने वाला अधिकारी ही अभियोजक (प्रॉसिक्यूटर) की भूमिका भी निभा सकता है। हाईकोर्ट के अनुसार, किसी अधिकारी को यह दोहरा दायित्व सौंपना अपने आप में आरोपी सैनिक के निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने नौसेना के एक पूर्व कर्मी की अपील को खारिज करते हुए 18 सितंबर को यह आदेश सुनाया। इसके साथ ही दो जजों की पीठ ने सिंगल जज के उस पुराने निष्कर्ष को भी निरस्त कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एक ही व्यक्ति को जांच और अभियोजन दोनों का काम देने से मुकदमे की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नौसेना से जुड़े सेवा नियमों में जांच अधिकारी को अभियोजक नियुक्त करने पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है।
अदालत ने कहा कि कोर्ट-मार्शल में अभियोजक की जिम्मेदारी मुख्य रूप से आरोपी को पीठ के समक्ष पेश करने और रिकॉर्ड पर साक्ष्य प्रस्तुत करने तक ही सीमित रहती है। इस सीमित कार्यप्रणाली के कारण इस पद पर किसी स्वतंत्र प्राधिकारी की जरूरत नहीं होती, बल्कि कार्यवाही संचालित करने के लिए केवल एक उपयुक्त व्यक्ति का होना पर्याप्त है।
सैनिकों के मौलिक अधिकारों पर संसद का अधिकार
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर विचार करते हुए जजों ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला कानून असंवैधानिक होता है, लेकिन संविधान के भाग III में दिए गए अधिकार अनुच्छेद 33 के प्रतिबंधों के अधीन हैं। अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति देता है कि वह सैन्य अनुशासन और लोक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से सशस्त्र बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को आवश्यकतानुसार सीमित या संशोधित कर सकती है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पी. श्रीकुमार ने दलील दी कि नौसेना कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही पर सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के नियम लागू नहीं होते। इसका संचालन नेवी एक्ट, 1957 और उसके तहत बने विशेष नियमों के अनुसार ही किया जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि नेवी एक्ट की धारा 4 के तहत नौसेना कर्मियों पर मौलिक अधिकार संशोधित रूप में ही लागू होते हैं और केंद्र सरकार के पास सैन्य जरूरतों के लिए विशेष कानून लागू करने का संवैधानिक अधिकार है।
1.10 लाख रुपये की धोखाधड़ी से जुड़ा विवाद
यह मामला भारतीय नौसेना में 31 वर्षों तक सेवा दे चुके संतोष कारवाड़े की याचिका पर सामने आया। कारवाड़े पर नेवी एक्ट, 1957 के तहत कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही चल रही थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने बालाचंद्रन नाम के एक अधिकारी को झांसा देकर 1.10 लाख रुपये अपने खाते में ट्रांसफर करवा लिए थे।
उन पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत धोखाधड़ी का आरोप दर्ज किया गया, जिसे नेवी एक्ट की धारा 77(2) के साथ जोड़ा गया था। यह धारा नौसैनिकों द्वारा किए जाने वाले दीवानी या नागरिक अपराधों पर भी सैन्य कानून का क्षेत्राधिकार लागू करती है। जब कारवाड़े ने इस मामले को कानूनी रूप से चुनौती दी, तब तक कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही में आठ गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके थे।
सिंगल जज का पूर्व आदेश और खंडपीठ का अंतिम निर्णय
कारवाड़े ने दलील दी थी कि उनके मामले की जांच करने वाले अधिकारी को ही अभियोजक नियुक्त किए जाने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का उनका अधिकार प्रभावित हुआ है। इससे पहले सिंगल जज की बेंच ने माना था कि जांच अधिकारी उसी मुकदमे में अभियोजन चलाने के लिए ‘उपयुक्त व्यक्ति’ नहीं माना जा सकता। हालांकि, सिंगल जज ने ट्रायल पर रोक नहीं लगाई थी और कारवाड़े को निर्देश दिया था कि फैसला आने के बाद यदि उन्हें किसी पूर्वाग्रह या नुकसान का अंदेशा हो, तो वे आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का रुख करें।
खंडपीठ के समक्ष कारवाड़े की वकील आयशा अब्राहम ने तर्क रखा कि सिंगल जज ने दोहरी भूमिका पर आपत्ति तो जताई, लेकिन रेगुलेशन 178(3) को असंवैधानिक घोषित नहीं किया—जो अभियोजक को गवाह के तौर पर भी पेश होने की अनुमति देता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में उनके मुवक्किल के पास सजा के बाद ट्रिब्यूनल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
तमाम दलीलों और कानूनी प्रावधानों की पड़ताल के बाद खंडपीठ ने प्रक्रिया को पूरी तरह वैध करार दिया। हाईकोर्ट ने कारवाड़े की अपील को खारिज करते हुए सिंगल जज की उस टिप्पणी को भी आधिकारिक तौर पर हटा दिया, जिसमें जांच अधिकारी के अभियोजक बनने पर मुकदमे में पक्षपात की आशंका जताई गई थी।

