सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से कहा कि रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुविधाओं के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने वाली समिति की अध्यक्षता किसी पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिस से कराने पर विचार किया जाए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्र सरकार ने अदालत के पहले के निर्देश के अनुसार समिति गठित करने का फैसला कर लिया है।
कानून अधिकारियों ने बताया कि समिति की अध्यक्षता के लिए पूर्व सचिव स्तर के एक अधिकारी को चुना गया है। इस पर चीफ जस्टिस ने सुझाव दिया कि समिति की कमान किसी पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिस को दी जानी चाहिए।
तुषार मेहता ने इस सुझाव पर सहमति जताई और कहा कि सरकार 28 सितंबर को इस संबंध में अदालत को जानकारी देगी।
एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश
मामला रिटायर्ड हाईकोर्ट चीफ जस्टिस और जजों को मिलने वाली सुविधाओं से जुड़ा है। इनमें ड्राइवर, सुरक्षा कर्मी, घरेलू सहायता, टेलीफोन सुविधा, चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति और यात्रा के दौरान सरकारी आवास जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को केंद्र सरकार से कहा था कि दो सप्ताह के भीतर एक समिति बनाई जाए, जो इन सुविधाओं को लेकर देशभर के लिए एक समान नीति तैयार करे। अदालत ने समिति से तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को भी कहा था।
इसके बाद 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को समिति गठित करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया था।
यह मामला जस्टिस वी. एस. दवे की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस दवे एसोसिएशन ऑफ रिटायर्ड जजेज ऑफ द सुप्रीम कोर्ट एंड हाई कोर्ट्स के अध्यक्ष हैं। याचिका में रिटायर्ड जजों की सुरक्षा और अन्य सुविधाओं का मुद्दा उठाया गया है।
अलग-अलग राज्यों में सुविधाओं के स्तर पर सवाल
पहले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने इस बात पर सवाल उठाया था कि कुछ राज्यों में सुरक्षा कर्मी और ड्राइवर रखने के लिए दी जा रही ₹45,000 से ₹50,000 तक की राशि क्या पर्याप्त है।
बेंच ने यह भी कहा था कि अलग-अलग राज्यों में इन सुविधाओं को लेकर कोई एकरूपता नहीं है। अदालत ने सुझाव दिया था कि केंद्र सरकार एक समिति बनाकर इसके लिए समान मानक तय कर सकती है। जरूरत पड़ने पर केंद्र राज्यों के साथ वित्तीय बोझ साझा करने पर भी विचार कर सकता है।
तुषार मेहता ने उस समय कहा था कि सरकार को ऐसी समिति गठित करने में कोई आपत्ति नहीं है और यह ऐसा विषय है जिस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला रिटायर्ड हाईकोर्ट चीफ जस्टिस और जजों को मिलने वाले विभिन्न लाभ और सुविधाओं से जुड़ा है।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि घरेलू सहायता, ड्राइवर, टेलीफोन, चिकित्सा प्रतिपूर्ति और सरकारी आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं में राज्यों के बीच काफी अंतर है। इसी असमानता के कारण रिटायर्ड जजों के संगठन ने पहले संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरे मामले में केंद्र सरकार एक अहम पक्ष है, क्योंकि किसी समान व्यवस्था को लागू करने के लिए राज्यों के साथ वित्तीय जिम्मेदारी साझा करने की जरूरत पड़ सकती है।

