सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेशंस कोर्ट हत्या के मामले में किसी दोषी को ऐसी सजा नहीं दे सकता जिसमें उसे पूरी प्राकृतिक जिंदगी जेल में रहने का निर्देश हो और वैधानिक रिमिशन की संभावना पूरी तरह खत्म कर दी जाए। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि सामान्य उम्रकैद और मौत की सजा के बीच आने वाली ऐसी “विशेष श्रेणी” की सजा, जिसमें रिमिशन पर रोक लगाई जाती है, केवल संवैधानिक अदालतें यानी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ही दे सकते हैं।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की पूर्व नियोजित हत्या के मामले में दो दोषियों की सजा में बदलाव किया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस शर्त को हटाया, जिसमें कहा गया था कि दोषी पूरी जिंदगी जेल में रहेंगे, और उसकी जगह दोनों को 25 साल के कठोर कारावास की सजा दी, जिसमें वैधानिक रिमिशन का लाभ नहीं मिलेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला 27 दिसंबर 2009 का है और पंजाब के लुधियाना से जुड़ा है। मृतका पिंकी उर्फ सिमरन की शादी अशोक कुमार से हुई थी और उनकी दो बेटियां थीं, जिनकी उम्र आठ और पांच साल थी।
27 दिसंबर की शाम पिंकी अपनी दोनों बेटियों के साथ खाने-पीने की चीजें खरीदने घर से निकली, लेकिन वापस नहीं लौटी। अगले दिन तीनों के शव लुधियाना के संधू नगर इलाके में रेलवे ट्रैक के पास मिले। उन पर धारदार हथियार से जानलेवा वार किए गए थे।
शुरुआत में पुलिस स्टेशन हैबोवाल में अज्ञात लोगों के खिलाफ IPC की धारा 302/34 के तहत FIR दर्ज की गई।
जांच के दौरान 30 दिसंबर 2009 को अशोक कुमार को एक स्थानीय मोहल्ला प्रधान ने पुलिस के सामने पेश किया। उसके खुलासे पर पुलिस ने खून से सनी जैकेट और वारदात में इस्तेमाल हथियार बरामद किया।
उसकी जानकारी के आधार पर उसके भाई ज्योति कुमार और दोस्त नवल किशोर को 31 दिसंबर 2009 को लुधियाना रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। बाद में खून से सनी जैकेट और मृतका की सोने की बालियां भी बरामद हुईं।
प्रॉसिक्यूशन का मामला था कि अशोक कुमार को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था और वह दोनों बच्चियों के पितृत्व पर भी संदेह करता था। आरोप था कि उसने बीमा की ₹1 से ₹2 लाख की रकम हासिल करने के लिए पत्नी और बेटियों की हत्या की साजिश रची और मदद के बदले नवल किशोर को ₹50,000 देने की बात कही।
प्रॉसिक्यूशन ने कई तरह के सबूत पेश किए। इनमें रेलवे लाइन के पास आरोपियों को देखने वाले गवाह, extra-judicial confession, बरामद गिलासों पर मिले fingerprints और DNA evidence शामिल थे। DNA जांच में पिंकी की बंद मुट्ठी में मिला बाल ज्योति कुमार का पाया गया।
ट्रायल कोर्ट ने कहा था, बाकी जिंदगी जेल में रहेंगे
ट्रायल कोर्ट ने 26 अप्रैल 2014 को तीनों आरोपियों को IPC की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया।
28 अप्रैल 2014 को सजा सुनाते हुए अदालत ने उन्हें उम्रकैद दी और साथ ही निर्देश दिया कि वे “अपनी बाकी पूरी जिंदगी जेल में रहेंगे”। प्रत्येक पर ₹2,500 का जुर्माना भी लगाया गया।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2022 को दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस खास निर्देश पर अलग से विचार नहीं किया कि दोषियों को उनकी प्राकृतिक जिंदगी के अंत तक जेल में ही रहना होगा।
इसके बाद नवल किशोर और ज्योति कुमार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट में दोषसिद्धि नहीं, सिर्फ सजा पर विवाद
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस चरण में दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी गई, क्योंकि 10 नवंबर 2025 को कोर्ट पहले ही conviction में दखल देने से इनकार कर चुका था।
दोषियों की ओर से अधिवक्ता सम्पा सेनगुप्ता रे ने दलील दी कि IPC की धारा 302 के तहत केवल दो सजाएं दी जा सकती हैं, मौत की सजा या उम्रकैद।
उनका कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने अपनी कानूनी सीमा से बाहर जाकर यह निर्देश दे दिया कि दोषी पूरी जिंदगी जेल में रहेंगे और इस तरह सरकार की statutory remission powers को खत्म कर दिया।
दूसरी ओर, पंजाब सरकार की ओर से Additional Advocate General विवेक जैन और अधिवक्ता सिद्धांत शर्मा ने अपराध की गंभीरता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह तीन लोगों की पहले से योजना बनाकर की गई हत्या थी और मृतकों में दो नाबालिग बच्चियां भी थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने तय किए दो मुख्य सवाल
कोर्ट ने दो सवालों पर विचार किया:
पहला, क्या ट्रायल कोर्ट IPC की धारा 302 के तहत यह आदेश दे सकता है कि दोषी पूरी जिंदगी जेल में रहेगा?
दूसरा, अगर ऐसा निर्देश कानूनी रूप से सही नहीं है, तो उपयुक्त सजा क्या होनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 53 और धारा 45 पढ़ने पर उम्रकैद का अर्थ प्राकृतिक जीवन तक कारावास माना जाता है। लेकिन सामान्य उम्रकैद CrPC की धाराओं 432 से 435 के तहत रिमिशन और कम्यूटेशन की कार्यपालिका की शक्तियों के अधीन रहती है। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत भी दया और सजा में राहत की संवैधानिक शक्तियां मौजूद हैं।
‘विशेष श्रेणी’ की सजा सिर्फ संवैधानिक अदालत दे सकती है
कोर्ट ने Swamy Shraddananda (2) v. State of Karnataka (2008) के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 14 साल की वास्तविक कैद और मौत की सजा के बीच के बड़े अंतर को भरने के लिए एक विशेष sentencing category विकसित की थी।
उस फैसले में कहा गया था कि कुछ मामलों में 14 साल की सजा अपराध की गंभीरता के मुकाबले बहुत कम हो सकती है, लेकिन मौत की सजा देना भी उचित न हो। ऐसे मामलों में अदालत निश्चित अवधि तक बिना remission के कारावास या प्राकृतिक जीवन तक जेल की विशेष सजा दे सकती है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने Constitution Bench के Union of India v. V. Sriharan alias Murugan (2016) फैसले का उल्लेख किया।
कोर्ट ने उस फैसले के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि ऐसी modified punishment देने की शक्ति केवल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास है, किसी निचली अदालत के पास नहीं।
पीठ ने कहा:
“किसी निश्चित अवधि की कैद या दोषी के जीवन के अंत तक कारावास की modified punishment, death penalty के विकल्प के रूप में, केवल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ही दे सकते हैं, देश की कोई अन्य निचली अदालत नहीं।”
सेशंस कोर्ट सरकार की remission power नहीं छीन सकता
सुप्रीम कोर्ट ने Kiran v. State of Karnataka (2025) और Ravinder Singh v. State (NCT of Delhi) (2024) के फैसलों का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि सेशंस कोर्ट राज्य सरकार की CrPC की धाराओं 432 से 435 के तहत remission या commutation की शक्ति को समाप्त नहीं कर सकता।
Kiran मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“सेशंस कोर्ट उम्रकैद की सजा को दोषी के प्राकृतिक जीवन के अंत तक चलने वाली सजा के रूप में निर्देशित नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा निर्देश CrPC के प्रावधानों से टकराएगा। राज्य को दी गई remission या commutation की शक्ति छीनी नहीं जा सकती।”
धारा 302 में संसद ने ‘पूरी प्राकृतिक जिंदगी’ वाले शब्द नहीं जोड़े
सुप्रीम कोर्ट ने Criminal Law (Amendment) Act, 2018 का भी उल्लेख किया।
पीठ ने कहा कि संसद ने IPC की धाराओं 376AB, 376DA और 376DB में स्पष्ट रूप से यह भाषा जोड़ी थी कि उम्रकैद का अर्थ “उस व्यक्ति की शेष प्राकृतिक जिंदगी तक कारावास” होगा।
लेकिन IPC की धारा 302 में ऐसी भाषा नहीं जोड़ी गई।
कोर्ट ने कहा कि जब संसद ने हत्या की धारा 302 में इस तरह की स्पष्ट व्यवस्था नहीं की, तो ट्रायल कोर्ट अपने स्तर पर ऐसी सजा नहीं जोड़ सकता।
14 साल के बाद remission बहुत कम, पूरी जिंदगी की सजा ज्यादा कठोर: कोर्ट
सजा तय करते समय सुप्रीम कोर्ट ने Navas alias Mulanavas v. State of Kerala (2024) में बताए गए sentencing principles पर भरोसा किया।
कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को प्रमुख aggravating factor माना। तीन लोगों की पहले से योजना बनाकर हत्या की गई थी, जिनमें दो नाबालिग बच्चियां थीं और धारदार हथियार का इस्तेमाल हुआ था।
वहीं mitigating factors में कोर्ट ने यह देखा कि दोनों अपीलकर्ता 11 और 12 साल से ज्यादा की वास्तविक हिरासत काट चुके थे और जेल में उनका आचरण संतोषजनक था।
इन पहलुओं को संतुलित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य उम्रकैद, जिसमें 14 साल के बाद statutory remission संभव हो, इस अपराध के लिए बेहद अपर्याप्त होगी।
दूसरी ओर, पूरी प्राकृतिक जिंदगी तक जेल में रखने की सजा अनुपातहीन होगी।
25 साल की कठोर कैद, statutory remission नहीं
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की वह शर्त रद्द कर दी जिसमें दोषियों को उनकी बाकी पूरी जिंदगी जेल में रखने का निर्देश दिया गया था।
संवैधानिक अदालत के रूप में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नवल किशोर और ज्योति कुमार को 25 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
इस 25 साल की अवधि के दौरान उन्हें statutory remission का लाभ नहीं मिलेगा।
IPC की धारा 302/34 के तहत उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: नवल किशोर एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य
केस नंबर: Diary No. 56431 of 2025
बेंच: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
तारीख: 24 सितंबर 2026

