सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई शामिल हैं, ने छह वर्षीय सौतेली बेटी के साथ जघन्य दुष्कर्म और उसकी गला घोंटकर हत्या करने के मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उसकी मौत की सजा को बिना किसी छूट (रिमिशन) के ताउम्र कारावास (शेष प्राकृतिक जीवन तक जेल) में बदल दिया। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 354(3) के तहत मौत की सजा के सिद्धांतों पर विचार करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही अपराध में दुष्कर्म के साक्ष्य छिपाने के लिए की गई हत्या यानी ‘इंस्ट्रुमेंटल साइलेंसिंग’ जैसी अत्यंत गंभीर परिस्थिति मौजूद हो, लेकिन यदि राज्य यह सिद्ध करने में विफल रहता है कि दोषी के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं बची है, तो मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता; विशेषकर तब, जब बिना छूट के ताउम्र कैद का मध्यवर्ती विकल्प मौजूद हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के कुशलगढ़ गांव की है। पहले पति की मृत्यु के बाद, पीड़िता की मां ने 4 अगस्त 2017 को अपीलकर्ता से दूसरा निकाह किया और अपनी छह साल की बच्ची के साथ उसके घर रहने लगी। अभियोजन के अनुसार, निकाह के कुछ समय बाद ही अपीलकर्ता ने बच्ची के साथ दुर्व्यवहार और घरेलू दायरे में यौन उत्पीड़न शुरू कर दिया। जब मां ने इसका विरोध किया, तो उसे जान से मारने और बदनामी की धमकियां देकर चुप करा दिया गया।
घटनाक्रम 21 अप्रैल 2018 की रात का है, जब अपीलकर्ता ने मां को दूसरे कमरे में बंद कर बच्ची के साथ दरिंदगी की। इसके बाद के दो दिनों तक बच्ची की तबीयत बिगड़ती रही, उसे उल्टियां हुईं और असहनीय दर्द हुआ। मां द्वारा इलाज कराने की लगातार मिन्नतों के बावजूद अपीलकर्ता ने यह कहते हुए अस्पताल ले जाने से इनकार कर दिया कि बच्ची केवल नाटक कर रही है। 23 अप्रैल 2018 की सुबह मां ने अपीलकर्ता को फोन किया, जिसके बाद वह दोपहर करीब 12 बजे घर लौटा। घर आते ही उसका पहला सवाल यह था कि क्या बच्ची ने मां को कुछ बताया है। इसके तुरंत बाद जब कमरे से बच्ची की चीख सुनाई दी, तो मां ने दौड़कर देखा कि अपीलकर्ता दोनों हाथों से बच्ची का गला घोंट रहा था।
गला घोंटने से बच्ची की मौत हो गई। अपीलकर्ता ने कुशलगढ़ में ही शव को आनन-फानन में दफनाने का प्रयास किया, लेकिन मां के कड़े विरोध के बाद शव को जावरा स्थित मायके ले जाया गया। वहां परिजनों के पूछने पर अपीलकर्ता ने कबूल किया कि उसने बच्ची का गला घोंटा है। 24 अप्रैल 2018 को हुए पोस्टमार्टम में पुष्टि हुई कि मौत गला घोंटने (एस्फिक्सिया) से हुई थी और उसके जननांगों पर ताजा चोट व खून के निशान पाए गए, जिससे हाल ही में हुए दुष्कर्म की पुष्टि हुई।
जावरा के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 302, 376(2)(एफ), 376(2)(एन), 376एबी और 201 तथा पॉक्सो कानून की धारा 5 व 6 के तहत दोषी ठहराया। ट्रायल कोर्ट ने उसी दिन धारा 302 और धारा 376एबी के तहत उसे फांसी की सजा सुनाई। 18 नवंबर 2019 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर पीठ) ने अपील खारिज करते हुए मृत्युदंड की पुष्टि कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोबारा जिरह का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि ट्रायल कोर्ट ने 16 जुलाई 2018 को—जिस दिन मुख्य गवाह मां (पीडब्लू-1) की गवाही दर्ज की गई थी—उसी दिन अपीलकर्ता के लिए लीगल एड वकील नियुक्त किया था और बिना तैयारी का समय दिए उसी दिन जिरह भी पूरी करा ली थी। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रभावी विधिक सहायता के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई 2025 को सीआरपीसी की धारा 391 और 367 के तहत मां से दोबारा जिरह कराने का निर्देश दिया।
14 जून 2025 को अपीलकर्ता के पसंद के वकील द्वारा मां से विस्तृत जिरह की गई। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस सुधारात्मक कदम से मुकदमे की निष्पक्षता पूरी तरह बहाल हो गई और किसी नए ट्रायल की आवश्यकता नहीं रही।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि पूरा मामला एक अकेली गवाह (मां) के बयान पर टिका है, जिसके बयानों में सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के बयानों की तुलना में महत्वपूर्ण विरोधाभास और नए तथ्य जोड़े गए हैं। बचाव पक्ष ने कहा कि मां का तुरंत शोर न मचाना या भागने की कोशिश न करना अस्वाभाविक था। मोबाइल फोन के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) का हवाला देते हुए कहा गया कि वह किसी बंधक की तरह नहीं रह रही थी। इसके अलावा अपीलकर्ता ने घटना के समय अन्यत्र होने (अलिबाई) और पुलिस द्वारा झूठे मामले में फंसाने का दावा किया। सजा के मुद्दे पर कहा गया कि जेल में उसका आचरण अच्छा रहा है, कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, बचपन अभावों में बीता है और राज्य यह साबित करने में विफल रहा है कि उसमें सुधार संभव नहीं है।
वहीं, राज्य सरकार के वकील ने दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि मां की मुख्य गवाही सात साल बाद हुई दूसरी जिरह में भी अडिग रही। इस गवाही की पुष्टि मेडिकल साक्ष्य, गला घोंटने के निशान, बच्ची द्वारा मरने से पहले मां को बताई गई बात, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अपीलकर्ता के खुद के कबूलनामे से होती है। राज्य ने बच्ची की छोटी उम्र, विश्वासघात और दुष्कर्म छिपाने के लिए की गई हत्या को रेखांकित करते हुए फांसी की सजा बरकरार रखने का अनुरोध किया।
दोषसिद्धि पर सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
फैसला सुनाते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने बचाव पक्ष के प्रत्येक तर्क का विस्तार से विश्लेषण किया:
1. एकल और रिश्तेदार गवाह के साक्ष्य का मूल्यांकन
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 134 और वादीवेलु थेवर बनाम मद्रास राज्य के फैसले का संदर्भ देते हुए पीठ ने दोहराया कि साक्ष्यों को तौला जाता है, गिना नहीं जाता। मां को ‘हितबद्ध गवाह’ बताने के तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने दलीप सिंह बनाम पंजाब राज्य, राजस्थान राज्य बनाम कल्की और गोवर्धन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का हवाला दिया और कहा कि रिश्तेदार गवाह अपने आप में हितबद्ध नहीं होता। पीठ ने टिप्पणी की:
“इस अदालत के सुविचारित दृष्टिकोण में, एक मां आमतौर पर अंतिम व्यक्ति होगी जो अपने ही बच्चे के हत्यारे को बचाएगी और उसकी जगह किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाएगी।”
2. बयानों में छूट और साक्ष्य की परख का नियम
सीआरपीसी की धारा 161 व 162 तथा साक्ष्य अधिनियम की धारा 145 के तहत बयानों में विसंगतियों पर विचार करते हुए अदालत ने संविधान पीठ के फैसले तहसीलदार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और विजयाकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि मां ने अपने शुरुआती बयानों में दुष्कर्म और गला घोंटने के मूल आरोप को कभी नहीं छोड़ा था; केवल घरेलू परिस्थितियों के कुछ विवरण पहले नहीं बताए गए थे। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम एम.के. एंथोनी और सेल्वमणी बनाम तमिलनाडु राज्य के सिद्धांतों को दोहराते हुए पीठ ने कहा कि भारत में ‘एक बात में झूठा, तो सब में झूठा’ (फाल्सस इन यूनो, फाल्सस इन ऑम्निबस) का नियम लागू नहीं होता, और अदालत का कर्तव्य भूसे में से दाने को अलग करना है।
3. विवश गवाह की मानसिक स्थिति और जमीनी वास्तविकताएं
अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि मां का तुरंत शिकायत न करना या दरवाजा खुला होने पर भी न भागना अस्वाभाविक था। राणा प्रताप बनाम हरियाणा राज्य, एक्सवाईजेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य, पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह और तुलसीदास कानोलकर बनाम गोवा राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी पीड़ित या गवाह के व्यवहार को रूढ़िवादी धारणाओं से नहीं तौला जा सकता।
मनोवैज्ञानिक डॉ. लेनोर ई. वॉकर के ‘सीखी गई लाचारी’ (लर्न्ड हेल्पलेसनेस) और डॉ. जूडिथ लुईस हरमन के ‘दमनकारी नियंत्रण’ (कोअर्सिव कंट्रोल) के अध्ययनों के साथ-साथ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा झेलने वाली अधिकांश महिलाएं चुप रहती हैं। पीठ ने सख्त टिप्पणी की:
“कोई व्यक्ति पहले किसी महिला को खामोश रहने पर मजबूर नहीं कर सकता और फिर उसी खामोशी का फायदा उठाकर बरी होने का दावा नहीं कर सकता, न ही वह अपने ही हाथों से पीछे छोड़े गए एकमात्र गवाह के चरित्र पर लांछन लगाकर अपनी रिहाई हासिल कर सकता है।”
अदालत ने कॉल डिटेल के तर्क को भी खारिज किया और माना कि एक अनपढ़ महिला के पास केवल पति द्वारा सेव किए गए नंबरों पर बात करने की सुविधा होना उसकी आजादी का प्रमाण नहीं है।
4. पीड़िता का मृत्युकालिक कथन और चिकित्सीय साक्ष्य
अदालत ने माना कि घटना की रात बच्ची द्वारा अपनी मां को बताई गई आपबीती साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत उसके जीवन को समाप्त करने वाले घटनाक्रम की परिस्थिति के रूप में और धारा 6 के तहत ‘रेस जेस्टे’ (उसी घटनाक्रम का हिस्सा) के रूप में पूरी तरह ग्राह्य है। इसके लिए पकाला नारायण स्वामी बनाम किंग-एम्परर, शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य और रतन सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य का सहारा लिया गया। अदालत ने कहा:
“पीड़िता, जो जीवन में खामोश कर दी गई, वह कानून की नजर में खामोश नहीं है; और उसकी आवाज, अपनी मां के जरिए अदालत तक पहुंचकर और उसके शरीर पर मौजूद निशानों से पुष्ट होकर, इस बात की गवाही देती है कि उसके साथ क्या किया गया था।”
इस कथन की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से हुई, जिसमें जननांगों पर चोट और गला घोंटने से मौत की बात सामने आई। साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 और त्रिमुख मारोती किरण बनाम महाराष्ट्र राज्य के तहत अदालत ने माना कि बंद घर में बच्ची की मौत होने पर वहां मौजूद अपीलकर्ता को उचित स्पष्टीकरण देना था, जिसे देने में वह विफल रहा।
अपीलकर्ता का घटना के समय बाहर होने का दावा दूध नाथ पांडे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और बिनय कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य के सिद्धांतों के तहत खारिज कर दिया गया, क्योंकि कॉल डिटेल और स्वयं उसका बयान हत्या के समय उसकी मौजूदगी को सिद्ध करता था। इसके अलावा परिवार के सामने उसका कबूलनामा (सहदेवन बनाम तमिलनाडु राज्य) और धारा 8 के तहत उसका संदिग्ध आचरण (अनंत चिंतामन लागू बनाम बॉम्बे राज्य) अपराध की पूरी कड़ी जोड़ते हैं। अदालत ने यह भी माना कि जांच में कुछ प्रक्रियात्मक खामियां साबित हो चुके मामले को कमजोर नहीं करतीं (करनैल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य, कर्नाटक राज्य बनाम के. यारप्पा रेड्डी और सी. मुनियप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य)।
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की आईपीसी की धारा 302, 376(2)(एफ), 376(2)(एन), 376एबी, 201 और पॉक्सो कानून की धारा 5 व 6 के तहत दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा।
सजा पर अदालत का विश्लेषण
सजा के पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 235(2) और अल्लाउद्दीन मियां बनाम बिहार राज्य के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए एक ही दिन दोषसिद्धि और फांसी की सजा सुना दी थी। वहीं, हाईकोर्ट ने भी गलती करते हुए अपराध के परीक्षण को 100 प्रतिशत और अपराधी की परिस्थितियों को शून्य मान लिया।
बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य और शंकर किसनराव खाडे बनाम महाराष्ट्र राज्य के ऐतिहासिक सिद्धांतों को दोहराते हुए पीठ ने कहा कि मौत की सजा के लिए अपराध के साथ-साथ अपराधी की व्यक्तिगत परिस्थितियों को तौलना अनिवार्य है:
“मृत्युदंड केवल सबसे गंभीर अपराधों की श्रेणी के लिए ही आरक्षित नहीं है, बल्कि उस गंभीर श्रेणी के उन मामलों के लिए है जिनमें अपराधी की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद आजीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह से बंद पाया जाता है।”
अदालत ने माना कि बच्ची को साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से मारना अत्यंत गंभीर परिस्थिति है, जिसे ‘इंस्ट्रुमेंटल साइलेंसिंग’ कहा जा सकता है, लेकिन यह अकेले इस बात का प्रमाण नहीं है कि दोषी कभी सुधर नहीं सकता।
मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य, राजेंद्र प्रल्हादराव वासनिक बनाम महाराष्ट्र राज्य और मोहम्मद मन्नान बनाम बिहार राज्य के निर्देशों के तहत सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की सामाजिक पृष्ठभूमि रिपोर्ट, जेल आचरण और मेडिकल बोर्ड की मनोवैज्ञानिक जांच रिपोर्ट मंगवाई। अदालत ने पाया कि उसका बचपन घोर अभावों में बीता, मां की जल्दी मृत्यु हो गई, उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, जेल में आठ वर्षों के दौरान उसका व्यवहार अच्छा रहा, उसने हिंदी और अंग्रेजी की बुनियादी साक्षरता सीखने का प्रयास किया और परिवार से उसके संबंध बने हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राज्य सरकार यह सिद्ध करने के लिए कोई भी साक्ष्य पेश नहीं कर सकी कि वह पूरी तरह असुधार्य है।
अदालत ने बाल दुष्कर्म और हत्या से जुड़े पूर्व उदाहरणों जैसे लोचन श्रीवास बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, इरप्पा सिद्दप्पा मुर्गनवर बनाम कर्नाटक राज्य और वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ का भी संज्ञान लिया, जहां फांसी की सजा को बिना रिमिशन के लंबी कैद में बदला गया था।
संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले भारत संघ बनाम वी. श्रीहरन का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि न्यायपालिका के पास फांसी और सामान्य उम्रकैद के बीच ‘मध्यम मार्ग’ उपलब्ध है—अर्थात बिना किसी छूट के ताउम्र कारावास। यह विकल्प समाज को सुरक्षित रखते हुए और कड़ा दंड देते हुए भी जीवन लेने से बचाता है, जब तक कि सुधार की संभावना पूरी तरह समाप्त न मानी जाए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 302 और 376एबी के तहत दी गई मौत की सजा को बदलते हुए निर्देश दिया कि वह अपने शेष प्राकृतिक जीवन तक जेल में रहेगा और उसे किसी भी प्रकार की समयपूर्व रिहाई (रिमिशन) का लाभ नहीं मिलेगा। अन्य धाराओं के तहत दी गई सजाएं और जुर्माने पूर्ववत रहेंगे और सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: वारिस बनाम मध्य प्रदेश राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 429-430/2020
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस विजय बिश्नोई
निर्णय की तिथि: 24 सितंबर 2026

