ट्रेनिंग का कॉल लेटर नियुक्ति पत्र नहीं; नियुक्तिकर्ता के समान पद वाले अधिकारी द्वारा बर्खास्तगी अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी उम्मीदवार को केवल प्रारंभिक ट्रेनिंग के लिए भेजा गया कॉल लेटर रेलवे सुरक्षा बल (RPF) व्यवस्था के तहत औपचारिक नियुक्ति आदेश नहीं माना जा सकता। अदालत ने निर्णय दिया कि यदि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद वास्तविक नियुक्ति करने वाले अधिकारी के समान पद का कोई अन्य सक्षम अधिकारी कर्मचारी को सेवा से हटाता है, तो संविधान के अनुच्छेद 311(1) के तहत दिए गए संरक्षण का कोई उल्लंघन नहीं होता। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें 72 दिनों की अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण रेलवे सुरक्षा विशेष बल (RPSF) के एक कांस्टेबल को 1983 में सेवा से हटाने के निर्णय को अमान्य ठहराया गया था। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि करते हुए कांस्टेबल को हटाने के आदेश को बहाल कर दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी रामधनी प्रसाद को आरपीएसएफ में रक्षक (कांस्टेबल) के पद पर प्रशिक्षणार्थी (रिक्रूट अंडर ट्रेनिंग) के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। 3 मई, 1979 को कमांडेंट ने एक कॉल लेटर जारी कर उन्हें आरपीएसएफ की दूसरी बटालियन, गोरखपुर के मुख्यालय में ट्रेनिंग के लिए उपस्थित होने का निर्देश दिया। इस पत्र में स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि नियुक्ति प्रारंभिक ट्रेनिंग के सफलतापूर्वक पूरा होने पर ही निर्भर करेगी और इसके बाद परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि भी लागू होगी।

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, असिस्टेंट कमांडेंट ने 4 दिसंबर, 1979 को बटालियन आदेश (संख्या 2BN/9/4/9/409) जारी किया। इसमें दर्ज किया गया कि सफल रंगरूटों को 4 दिसंबर, 1979 से रक्षक के पद पर नियुक्त किया जाता है और संबंधित बटालियनों में उनकी तैनाती की जाती है। प्रतिवादी को पर्सनल नंबर 2612 आवंटित कर सातवीं बटालियन में तैनात किया गया। इसके बाद 25 फरवरी, 1980 को कमांडेंट की ओर से एडजुटेंट द्वारा जारी बटालियन आदेश संख्या 58/1980 में भी यह दोहराया गया कि 4 दिसंबर, 1979 से उन्हें नियमित रक्षक माना गया है।

सेवा के दौरान प्रतिवादी को 9 मई से 26 मई, 1982 तक का अवकाश स्वीकृत किया गया था, लेकिन वे 27 मई, 1982 को ड्यूटी पर वापस नहीं लौटे। वे बिना किसी पूर्व सूचना के 6 अगस्त, 1982 तक यानी 72 दिनों तक अनुपस्थित रहे। रेलवे सुरक्षा बल नियम, 1959 के नियम 44 के तहत 1 अक्टूबर, 1982 को घोर लापरवाही और अनुशासनहीनता के आरोप में आरोप-पत्र जारी किया गया। प्रतिवादी ने आरोप-पत्र प्राप्त कर अपना जवाब भी दिया। इसके बाद जांच अधिकारी ने 1 जनवरी, 1983 को विभागीय जांच की तारीख तय की और इसकी सूचना प्रतिवादी को दी।

निर्धारित तारीख पर प्रतिवादी के उपस्थित न होने पर जांच अधिकारी ने एकतरफा (एक्स-पार्टे) कार्यवाही की और 24 फरवरी, 1983 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें आरोप साबित पाए गए। इसके बाद 26 फरवरी, 1983 को सेवा से हटाने का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसका कोई जवाब नहीं दिया गया। अंततः एडजुटेंट ने 18 मार्च, 1983 को प्रतिवादी को सेवा से हटाने का आदेश जारी कर दिया। इसके खिलाफ की गई विभागीय अपील को कमांडेंट ने 7 नवंबर, 1984 को खारिज कर दिया।

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इसके खिलाफ प्रतिवादी ने गोरखपुर के अतिरिक्त मुंसिफ मजिस्ट्रेट (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष दीवानी मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज करते हुए कहा कि प्रतिवादी की वैध नियुक्ति असिस्टेंट कमांडेंट ने की थी और एडजुटेंट का पद असिस्टेंट कमांडेंट से नीचे का नहीं है, इसलिए हटाने का आदेश वैध था। हालांकि, अतिरिक्त सिविल जज, गोरखपुर (प्रथम अपीलीय अदालत) ने इस फैसले को पलट दिया। अपीलीय अदालत का मानना था कि 3 मई, 1979 के कॉल लेटर के आधार पर प्रतिवादी की नियुक्ति कमांडेंट द्वारा की गई थी, इसलिए अधीनस्थ एडजुटेंट द्वारा उसे सेवा से हटाना अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन है। इसके अलावा एकतरफा जांच को भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत ठहराया गया। 12 जनवरी, 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की द्वितीय अपील खारिज कर प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

पक्षकारों की दलीलें

केंद्र सरकार और रेलवे प्रशासन की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने दलील दी कि हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत का निष्कर्ष तथ्यात्मक रूप से गलत था। उन्होंने कहा कि 3 मई, 1979 का पत्र केवल अनिवार्य प्रारंभिक ट्रेनिंग में शामिल होने का निर्देश था, जबकि वास्तविक नियुक्ति 4 दिसंबर, 1979 को असिस्टेंट कमांडेंट द्वारा की गई थी। उन्होंने रामानंद सिंह बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि नियुक्ति और तैनाती का आदेश एक साथ जारी किया जा सकता है।

सरकार की ओर से यह भी रेखांकित किया गया कि आरपीएफ नियम, 1959 के नियम 20 सहपठित अनुसूची-I के तहत असिस्टेंट सिक्योरिटी ऑफिसर/असिस्टेंट कमांडेंट को रक्षक नियुक्त करने का अधिकार है, तथा नियम 43 सहपठित अनुसूची-II के तहत उन्हें सेवा से हटाने का भी पूरा अधिकार प्राप्त है। भारत संघ बनाम चंद्र पाल पांडे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि नियुक्ति का अधिकार केवल चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर में ही निहित नहीं है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि प्रतिवादी जानबूझकर जांच में शामिल नहीं हुआ और पी. करुप्पैया बनाम महाप्रबंधक, थिरुवल्लुवर ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड के आधार पर “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत भी लागू होता है।

दूसरी तरफ, प्रतिवादी के वकील मनंजय मिश्रा ने तर्क दिया कि कमांडेंट द्वारा जारी 3 मई, 1979 का कॉल लेटर ही वास्तविक नियुक्ति आदेश था जिसके आधार पर प्रतिवादी सेवा में शामिल हुआ था, जबकि 4 दिसंबर का आदेश केवल पोस्टिंग ऑर्डर था। उन्होंने दलील दी कि यदि कमांडेंट को नियुक्तिकर्ता माना जाए, तो उनके अधीनस्थ एडजुटेंट द्वारा पारित निष्कासन आदेश सीधे तौर पर अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन करता है। उन्होंने कृष्ण कुमार बनाम डिवीजनल असिस्टेंट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, सेंट्रल रेलवे मामले पर भरोसा जताते हुए कहा कि शक्तियों के प्रत्यायोजन (डेलिगेशन) से किसी अधीनस्थ अधिकारी का पदानुक्रमित दर्जा नहीं बदल जाता। इसके अलावा उन्होंने दावा किया कि हाथ में फ्रैक्चर होने के कारण प्रतिवादी 29 दिसंबर, 1982 से 7 मार्च, 1983 तक रेलवे अस्पताल में उपचाराधीन था, इसलिए एकतरफा जांच प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन थी।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और प्रमुख टिप्पणियां

दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 3 मई, 1979 का पत्र नियुक्ति आदेश नहीं था। पीठ ने कहा कि इस पत्र में स्पष्ट लिखा था कि नियुक्ति ट्रेनिंग के सफल समापन पर निर्भर करेगी और इसमें “प्रस्ताव स्वीकार करने” तथा “पद के लिए उम्मीदवारी” जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ था। इसके विपरीत, 4 दिसंबर, 1979 के बटालियन आदेश में साफ तौर पर लिखा था कि ट्रेनिंग पूरी होने पर रंगरूटों को रक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है।

अनुच्छेद 311(1) के कानूनी दायरे को स्पष्ट करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“यह सुस्थापित है कि संविधान के अनुच्छेद 311(1) के प्रयोजनों के लिए किसी कर्मचारी को नियुक्त करने वाले प्राधिकारी का निर्धारण करते समय, अदालत को नियुक्ति आदेश तथा उस नियुक्ति को शासित करने वाले वैधानिक या विनियामक ढांचे के संदर्भ में उस प्राधिकारी का पता लगाना आवश्यक होता है जिसने वास्तव में नियुक्ति की थी। एक बार जब उस प्राधिकारी की पहचान हो जाती है, तो अनुच्छेद 311(1) के तहत संवैधानिक संरक्षण का परीक्षण उस प्राधिकारी की पदानुक्रमिक स्थिति के संदर्भ में किया जाना चाहिए जो बाद में बर्खास्तगी या हटाने का आदेश पारित करता है।”

शीर्ष अदालत ने कृष्ण कुमार बनाम डिवीजनल असिस्टेंट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के उस सिद्धांत का उल्लेख किया जिसमें कहा गया था:

“संविधान का अनुच्छेद 311(1) यह प्रावधान करता है कि संघ की सिविल सेवा या अखिल भारतीय सेवा या किसी राज्य की सिविल सेवा का कोई सदस्य अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई सिविल पद धारण करने वाला कोई भी व्यक्ति उस प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाया नहीं जाएगा जिसके द्वारा उसे नियुक्त किया गया था… किसी विशेष नियुक्ति को करने की शक्ति का प्रत्यायोजन, प्रतिनिधि के पदानुक्रमिक दर्जे को बढ़ाता या सुधारता नहीं है। किसी अन्य अधिकारी के अधीनस्थ अधिकारी केवल इस कारण से उसके पद के बराबर नहीं हो जाएगा कि उसे उस दूसरे अधिकारी की कुछ शक्तियां प्राप्त हो गई हैं।”

रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम, 1957 और 1959 के नियमों की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा कि धारा 6 के तहत नियुक्ति का अधिकार चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर में निहित होने के बावजूद, इसके परंतुक (प्रोविजो) और धारा 9 तथा नियम 20 व 43 (अनुसूची I और II) के अनुसार अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी नियुक्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार दिया गया है। अदालत ने भारत संघ बनाम चंद्र पाल पांडे का हवाला देते हुए कहा:

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“हमारी राय में, यह धारा और इसका परंतुक नियुक्ति की शक्ति को केवल चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर में ही निहित नहीं करते हैं। जो परिकल्पित है वह यह है कि नियुक्ति के मामले में समग्र नियंत्रण चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर के पास रहेगा और वह नियंत्रण नियमों के अनुसार प्रयोग किया जाएगा। यदि नियम अन्य वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा नियुक्ति का प्रावधान करते हैं, तो इसे अधिनियम या अधिनियम के उद्देश्यों के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता है।”

पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी के वास्तविक नियुक्तिकर्ता असिस्टेंट कमांडेंट थे जिन्होंने 4 दिसंबर, 1979 का आदेश जारी किया था। 18 मार्च, 1983 को हटाने का आदेश पारित करने वाले एडजुटेंट श्री आई.जे. सिंह का पद असिस्टेंट कमांडेंट के समान ही था और अनुसूची-II के तहत उन्हें रक्षक को सेवा से हटाने का पूर्ण अधिकार था।

पीठ ने महत्वपूर्ण बात रेखांकित करते हुए कहा:

“इस चरण पर, यह ध्यान रखना प्रासंगिक है कि अनुच्छेद 311(1) में निहित संवैधानिक निषेध केवल तभी लागू होता है जब बर्खास्तगी या सेवा से हटाने का आदेश उस प्राधिकारी से नीचे के पद वाले प्राधिकारी द्वारा पारित किया जाता है जिसके द्वारा कर्मचारी को नियुक्त किया गया था, जबकि अनुच्छेद 311 का यह अनिवार्य तत्व वर्तमान मामले के तथ्यों में अनुपस्थित है।”

प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आरोप को खारिज करते हुए कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी को आरोप-पत्र प्राप्त हुआ था, उसने जवाब भी दिया था, उसे जांच की तिथि सूचित की गई थी और बाद में हटाने का कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। पीठ ने माना कि प्रतिवादी को बचाव का उचित अवसर दिया गया था और केवल इसलिए जांच दूषित नहीं मानी जा सकती क्योंकि कर्मचारी के उपस्थित न होने पर जांच अधिकारी को एकतरफा आगे बढ़ना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 12 जनवरी, 2023 के फैसले और प्रथम अपीलीय अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए 18 मार्च, 1983 के उस आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया जिसके तहत प्रतिवादी को सेवा से हटाया गया था।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भारत संघ एवं अन्य बनाम रामधनी प्रसाद

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 13645/2023 से उद्भूत) 

पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली 

निर्णय की तिथि: 24 सितंबर, 2026

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