केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: साइबर फ्रॉड के मामले में 21 साल की युवती पर संगठित अपराध का मुकदमा दर्ज करने का आदेश

केरल हाईकोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी से जुड़े एक बैंक खाते को बहाल (अनफ्रीज) करने की मांग करने वाली 21 वर्षीय युवती की याचिका को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने पुलिस को आदेश दिया है कि इस मामले में युवती के खिलाफ संगठित अपराध (ऑर्गनाइज्ड क्राइम) का मुकदमा दर्ज कर आगे की जांच की जाए।

जस्टिस एम ए अब्दुल हकीम ने याचिकाकर्ता की उस अर्जी को नामंजूर कर दिया जिसमें उन्होंने अपनी याचिका वापस लेने की गुहार लगाई थी। कोर्ट ने तनूर पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी (एसएचओ) को निर्देश दिया कि वे इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 111 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करें। अदालत ने कहा कि पुलिस को इस बात की गहराई से जांच करनी चाहिए कि क्या इस खेल के पीछे कुछ अन्य लोग भी काम कर रहे हैं जो इस युवती का इस्तेमाल कर रहे थे या उसके साथ मिलकर इस रैकेट को चला रहे थे।

युवाओं के बीच तेजी से बढ़ रहा है ‘म्यूल अकाउंट’ का चलन

हाईकोर्ट ने 10 जुलाई को जारी अपने आदेश में एक बेहद चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि हाल ही में बालिग हुए युवा आसानी से पैसा कमाने के लिए अलग-अलग बैंकों में कई खाते खोल रहे हैं। इन खातों का इस्तेमाल ‘म्यूल अकाउंट’ (यानी अवैध पैसों के लेन-देन के लिए इस्तेमाल होने वाले डमी खाते) के तौर पर किया जाता है। आजकल कुछ युवा इन खातों को बनाए रखना बिना किसी मेहनत के कमाई करने का एक आसान जरिया मानते हैं।

इस तरह के घपलों में साइबर अपराध से कमाई गई अवैध रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है। इसके बाद जांच एजेंसियों की नजरों से बचने और पैसे के स्रोत को छिपाने के लिए इसे अलग-अलग बैंक खातों के एक जाल में घुमाया जाता है। इस अवैध लेन-देन की सुविधा देने के बदले खाताधारकों को कमीशन या इनाम के तौर पर रकम का एक हिस्सा मिलता है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि तकनीकी प्रगति और डिजिटल लेन-देन ने आम जीवन को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन इसने जालसाजों के काम को भी सुगम कर दिया है, जिससे अब साइबर फ्रॉड एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है।

READ ALSO  आगरा किले में छत्रपति शिवाजी कार्यक्रम के सह-आयोजन के लिए एनजीओ की याचिका पर शीघ्र विचार करें: एएसआई से दिल्ली हाईकोर्ट 

साइबर अपराधियों के निशाने पर जूनियर वकील

इस फैसले में हाईकोर्ट ने एक और गंभीर मुद्दे की तरफ ध्यान खींचा है। कोर्ट ने कहा कि साइबर अपराधी अब बैंकों द्वारा फ्रीज किए गए इन खातों को दोबारा चालू कराने के लिए जूनियर वकीलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अपराधी या उनके सहयोगी इन युवा वकीलों के जरिए अदालतों में एक जैसे प्रारूप (स्टैंडर्ड पिटीशन) में याचिकाएं दायर करवाते हैं। अक्सर तो असली खाताधारकों को यह पता भी नहीं होता कि उनके नाम पर ऐसी कोई याचिका दायर की गई है।

READ ALSO  जमानत अर्जियों पर 2 महीने में करें फैसला: देशभर के हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश

अदालत ने पाया कि चूंकि अदालतें अक्सर विवादित रकम के लेन-देन पर रोक लगाकर बाकी खाते को चालू करने की अनुमति दे देती हैं, इसलिए जूनियर वकीलों के लिए यह एक आसान और तय नतीजों वाला काम बन गया है जिसमें कम मेहनत में बेहतर परिणाम मिल जाते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कई जूनियर वकील पूरी तरह से प्रामाणिक मामलों में ही खाताधारकों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

कोर्ट ने युवा कानून स्नातकों की प्रतिभा, उनके मूट कोर्ट के अनुभव और व्यावहारिक कौशल की सराहना की और कहा कि यदि इन तेज दिमागों को सही दिशा दी जाए तो हमारे कानूनी तंत्र का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। इसके बावजूद, कोर्ट ने उन वकीलों से स्पष्टीकरण मांगा है जिन्होंने कथित तौर पर फर्जी वकालतनामा, झूठे हलफनामे या बिना मुवक्किल की सहमति के याचिकाएं दायर की थीं। कोर्ट ने कहा कि कुछ वकीलों की दलीलें बुनियादी कानूनी ज्ञान की कमी को दर्शाती हैं, और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी, इस पर फैसला होना अभी बाकी है।

बेरोजगार युवती और 3.5 लाख रुपये का संदिग्ध लेन-देन

यह पूरा मामला केरल ग्रामीण बैंक के एक खाते से जुड़ा था, जो कि याचिकाकर्ता युवती का था। इस खाते में मदुरै पुलिस की सिफारिश पर रोक लगा दी गई थी क्योंकि इसमें 3.5 लाख रुपये का एक संदिग्ध लेन-देन देखा गया था।

READ ALSO  आपसी सहमति से बने रिश्ते को अपराध में नहीं बदला जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बलात्कार का मामला रद्द किया

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह पैसा उसने बाइनेंस ऐप पर यूएसडीटी (USDT) क्रिप्टोकरेंसी की ट्रेडिंग और शेयर बाजार के जरिए वैध तरीके से कमाया है, हालांकि वह इस रकम के असली स्रोत की जानकारी देने में असमर्थ रही।

हाईकोर्ट ने पाया कि युवती के पास आय का कोई स्थिर साधन या नौकरी नहीं है और उसने क्रिप्टो ट्रेडिंग के दावों को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज या सबूत भी पेश नहीं किया। जब युवती के वकील को लगा कि कोर्ट याचिका को खारिज कर सकता है, तो उन्होंने अर्जी वापस लेने की अनुमति मांगी। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए याचिका वापस लेने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आजकल यह एक आम चलन बन गया है कि जब याचिकाकर्ता को लगता है कि कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी, तो वे याचिका वापस लेने या उसे डिफॉल्ट रूप से खारिज कराने का प्रयास करते हैं ताकि बाद में फिर से कोशिश की जा सके।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles