कर्नाटक हाईकोर्ट ने विशेष चिकित्सा आवश्यकताओं वाली एक सात वर्षीय बच्ची की स्थायी कस्टडी उसकी मां को सौंपने का फैसला सुनाया है। इसके साथ ही अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस पिछले आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कस्टडी पिता को दी गई थी। जस्टिस डी. के. सिंह और जस्टिस टी. एम. नदाफ की पीठ ने 12 अगस्त को जारी अपने फैसले में कहा कि इतनी कम उम्र की बच्ची को अपनी मां की निरंतर देखभाल, स्नेह और इलाज की जरूरत है। अदालत ने पिता द्वारा देय मासिक गुजारा भत्ता भी 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दिया है।
फैमिली कोर्ट का फैसला बदला, बच्ची के लिए मां की निरंतर देखभाल को बताया जरूरी
यह मामला फैमिली कोर्ट के फरवरी 2024 के फैसले के खिलाफ मां की याचिका पर आया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि एक बच्ची जिसे विशेष चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता है, उसे मां की छत्रछाया से अलग नहीं किया जा सकता।
अदालत ने पाया कि बच्ची के पिता बेंगलुरु में अकेले रहते हैं, जबकि उनका मूल निवास स्थान महाराष्ट्र में है। ऐसे में बच्ची को पिता के पास अकेले छोड़ना उसके सर्वोत्तम हित में नहीं होगा। इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि मां द्वारा डॉक्टर की सलाह के विपरीत बच्ची को डे-केयर सेंटर में छोड़ने की एक अकेली घटना को आधार बनाकर कस्टडी का अधिकार नहीं छीना जा सकता।
भत्ते में बढ़ोतरी और मुलाकात के नियम तय
बच्ची के लगातार होने वाले इलाज और देखभाल के खर्च को देखते हुए हाईकोर्ट ने पिता को हर महीने 25,000 रुपये का भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश दिया है। इससे पहले फैमिली कोर्ट ने यह राशि 15,000 रुपये तय की थी।
इसके साथ ही अदालत ने पिता के लिए बच्ची से मिलने का समय भी निर्धारित किया है। पिता हर रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच मां की मौजूदगी में अपनी बेटी से मिल सकेंगे। इसके अलावा, वह रोजाना शाम को 10 से 15 मिनट की वीडियो कॉल कर सकते हैं और अपनी सुविधा के अनुसार बच्ची को मेडिकल चेकअप के लिए ले जाते समय मां के साथ जा सकते हैं।
वैवाहिक जीवन बचाने की उम्मीद
अदालत में मां की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. सुशीला ने पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी मुवक्किल ने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत तलाक की अर्जी खारिज होने के फैसले को चुनौती नहीं दी है और वह केवल कस्टडी के आदेश से व्यथित थीं।
दूसरी ओर, पिता ने अदालत में स्वयं अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वह अपनी बेटी के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हैं, अपनी पत्नी के वापस लौटने का इंतजार कर रहे हैं और शादी को बचाना चाहते हैं।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने आशा व्यक्त की कि बेटी के प्रति दोनों माता-पिता का साझा प्रेम उनके आपसी मतभेदों को दूर करने और भविष्य में एक साथ पुनर्मिलन का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक होगा।

