मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति को अपनी पत्नी और नाबालिग बेटे को याचिका दायर करने की तारीख से ही बढ़ा हुआ भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) देना होगा। अदालत ने कहा कि छह साल से भी अधिक समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया की वजह से आश्रितों को उनके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस गजेंद्र सिंह की पीठ ने इंदौर के पति द्वारा दायर उस संशोधन याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने 30 अक्टूबर 2018 से बकाया राशि के भुगतान के निर्देश को बदलने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने इससे पहले इंदौर फैमिली कोर्ट के फैसले को बदलते हुए बच्चे का भत्ता 3,000 रुपये से बढ़ाकर 9,000 रुपये प्रति माह कर दिया था और इसे आवेदन करने की मूल तारीख से लागू करने का आदेश दिया था।
न्यायिक देरी की सजा पत्नी और बच्चे को नहीं दी जा सकती
मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस गजेंद्र सिंह ने टिप्पणी की कि यदि भरण-पोषण का आदेश केवल फैसला आने की तारीख या भविष्य की तिथि से लागू किया जाता है, तो यह महिला और बच्चे को उचित वित्तीय सहायता से वंचित करने जैसा होगा। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक केस लंबित रहने की स्थिति में नुकसान पति का नहीं, बल्कि आश्रितों का होता है।
अदालत ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के उन दिशानिर्देशों का भी संदर्भ दिया, जो संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तय किए गए हैं। इनके अनुसार, भरण-पोषण का भत्ता सामान्यतः आवेदन जमा करने की तारीख से ही लागू होना चाहिए।
आर्थिक तंगी और उत्पीड़न का तर्क अमान्य
सुनवाई के दौरान पति की तरफ से पेश अधिवक्ता संगीता चौधरी ने तर्क दिया था कि उनका मुवक्किल 2018 से ही अंतरिम भरण-पोषण का नियमित भुगतान कर रहा है। ऐसे में अचानक छह साल का पिछला बढ़ा हुआ बकाया एक साथ देना उनके लिए असहनीय आर्थिक बोझ होगा और यह उनके साथ अन्याय व उत्पीड़न के समान है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को मानने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि पति द्वारा अब तक दिए गए अंतरिम भरण-पोषण और अन्य कानूनी कार्यवाहियों के तहत मिली रकम को कुल बकाया राशि में से समायोजित (एडजस्ट) कर दिया जाएगा। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि केस के दौरान दिया जा रहा अंतरिम भत्ता बेहद मामूली था।
2013 में हुई थी शादी, 2018 में कोर्ट पहुंची थी पत्नी
यह विवाद इंदौर के एक दंपत्ति से जुड़ा है, जिनका विवाह 30 जनवरी 2013 को हुआ था। 10 अप्रैल 2017 को उनके बेटे का जन्म हुआ। इसके बाद वैवाहिक मतभेदों के चलते पत्नी ने 30 अक्टूबर 2018 को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत इंदौर की फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया था।
फैमिली कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को फैसला सुनाते हुए पत्नी के लिए 7,000 रुपये और बच्चे के लिए 3,000 रुपये प्रति माह का भत्ता तय किया, लेकिन इसे केवल आदेश की तारीख से लागू करने को कहा। इस फैसले को दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 17 अप्रैल को हाईकोर्ट ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए बच्चे का भत्ता बढ़ाकर 9,000 रुपये कर दिया और इसे 30 अक्टूबर 2018 से लागू करने का निर्देश दिया था, जिसे अब अंतिम रूप से बरकरार रखा गया है।

