विरोध प्रदर्शन के नाम पर अदालती कामकाज में बाधा नहीं डाली जा सकती: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार जरूर है, लेकिन इसके नाम पर न्यायिक कार्यों में रुकावट डालना, अदालत परिसर में तोड़फोड़ करना या न्यायिक कर्मचारियों पर हमला करना कतई स्वीकार्य नहीं है। 17 अगस्त के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि बिना किसी हिंसक घटना का इंतजार किए झारखंड के सभी जिलों में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं।

लातेहार जैसी घटना का इंतजार न करे प्रशासन

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने वर्ष 2022 में लातेहार सिविल कोर्ट में हुई हिंसक घटना पर स्वत: संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका का निपटारा करते हुए यह निर्देश जारी किया। पीठ ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का अहम हिस्सा है। किसी भी जज या न्यायिक अधिकारी के निर्भीक होकर काम करने के लिए उनके आसपास सुरक्षित माहौल का होना अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि जजों की सुरक्षा और सम्मान सीधे तौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।

अदालतों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के निर्देश

लातेहार कोर्ट की वर्तमान सुरक्षा स्थिति पर सन्तोष जताते हुए अदालत ने कहा कि राज्य के अन्य सभी जिलों में भी इसी स्तर के सुरक्षा मानक लागू होने चाहिए। सरकार द्वारा पेश हलफनामे के मुताबिक, लातेहार में इस समय सशस्त्र पुलिस बल, त्वरित प्रतिक्रिया टीम (QRT), सीसीटीवी निगरानी और उच्च जोखिम वाले विचाराधीन कैदियों की पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की व्यवस्था की गई है। साथ ही, लातेहार में तैनात प्रत्येक न्यायिक अधिकारी को कम से कम एक बॉडीगार्ड और एक होमगार्ड सुरक्षा के रूप में मुहैया कराया गया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य के सभी जिलों के जजों को भी इसी स्तर का व्यक्तिगत सुरक्षा घेरा प्रदान किया जाए।

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2022 के लातेहार कोर्ट घेराव का मामला

यह पूरा मामला 10 अक्टूबर 2022 की उस घटना से जुड़ा है, जब ताना भगत समुदाय के 500 से अधिक लोगों ने लातेहार सिविल कोर्ट परिसर पर धावा बोल दिया था। लाठी और हसुआ से लैस भीड़ ने अदालत के प्रवेश द्वारों पर ताला लगा दिया था और कामकाज पूरी तरह से ठप कर दिया था। उपद्रवियों की मांग थी कि क्षेत्र में पूर्ण स्वशासन लागू हो और उसमें अदालतों या सरकार का कोई हस्तक्षेप न रहे।

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इस उपद्रव के दौरान भीड़ ने पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की और अदालती संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि तत्कालीन प्रधान एवं जिला सत्र न्यायाधीश को अपनी जान बचाने के लिए एक कमरे के भीतर बंद होना पड़ा था।

याचिका का निपटारा और जांच पूरी करने के आदेश

घटना की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से खुफिया रिपोर्ट, की गई कार्रवाई और सुरक्षा इंतजामों का ब्योरा मांगा था। हाईकोर्ट ने कहा कि शुरुआत में सुरक्षा को लेकर जो तात्कालिक चिंताएं थीं, उन्हें अब काफी हद तक दूर कर लिया गया है। अदालत ने जनहित याचिका को बंद करते हुए उम्मीद जताई कि 2022 की घटना से जुड़ी पुलिस जांच और अदालती कार्यवाही को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाएगा और सभी जिला अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था लगातार बनी रहेगी।

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