फांसी की सजा की संवैधानिक वैधता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के जरिए मृत्युदंड देने की वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। अदालत ने फांसी की सजा को संवैधानिक ठहराने वाले 1983 के तीन जजों की पीठ के फैसले को किसी बड़ी पीठ के समक्ष भेजने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह साफ किया कि भविष्य में नए वैज्ञानिक या चिकित्सीय प्रमाण सामने आने पर इस विषय पर पुनर्विचार के रास्ते बंद नहीं हुए हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) के तहत फांसी की सजा के मौजूदा प्रावधानों पर पुनर्विचार करने का कोई पर्याप्त आधार नजर नहीं आता।

वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर समीक्षा का विकल्प खुला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि इस याचिका को खारिज करने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में इस मामले की संवैधानिक जांच नहीं हो सकती। अदालत की टिप्पणी थी कि संविधान की व्याख्या एक जीवंत और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे कानूनी सिद्धांतों के विकास और आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति के साथ तालमेल बनाए रखना होता है।

पीठ के अनुसार, यदि भविष्य में कोई ऐसे ठोस चिकित्सीय, वैज्ञानिक या व्यावहारिक साक्ष्य सामने आते हैं जिनसे यह साबित हो कि 1983 के फैसले का आधार अब अप्रासंगिक हो चुका है, तो इस मुद्दे पर दोबारा कानूनी समीक्षा की जा सकती है।

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सरकार विशेषज्ञ समिति का कर सकती है गठन

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि उसके फैसले से केंद्र सरकार के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ता। सरकार चाहे तो फांसी के विकल्पों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञों का एक आयोग या अध्ययन समूह गठित करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

इस प्रस्तावित विशेषज्ञ निकाय में कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और क्रिमिनोलॉजी जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है। यह समिति अध्ययन कर सकती है कि क्या फांसी के बजाय कोई अन्य तरीका उपलब्ध है, जिससे कैदी की मानवीय गरिमा बनी रहे और उसे कम से कम कष्ट हो।

याचिकाकर्ता ने फांसी को बताया था अमानवीय

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यह याचिका अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर की गई थी। उन्होंने अदालत में तर्क दिया था कि फांसी के जरिए मृत्युदंड देना एक क्रूर, बर्बर और अमानवीय तरीका है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों के भी विपरीत है।

याचिका में जहरीले इंजेक्शन का विकल्प देते हुए कहा गया था कि इसके जरिए मृत्यु होने में 5 मिनट से ज्यादा का समय नहीं लगता, जबकि फांसी की प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम 40 मिनट लग जाते हैं।

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