रिश्वत को ‘एक्स्ट्रा चार्ज’ कहने से नहीं बदलेगा उसका स्वरूप: झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे क्लर्क की दोषसिद्धि रखी बरकरार

झारखंड हाईकोर्ट ने 31 साल पुराने 100 रुपये की रिश्वत के मामले में रेलवे के एक पूर्व पार्सल क्लर्क की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा है कि कोई लोक सेवक अवैध रूप से मांगी गई रकम को केवल ‘एक्स्ट्रा चार्ज’ बताकर रिश्वत की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। कानूनी शुल्क से अधिक मांगी गई रकम, यदि आधिकारिक काम करने के बदले ली जा रही है, तो वह अवैध पारिश्रमिक के दायरे में आएगी।

जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अपीलकर्ता की उम्र, स्वास्थ्य, नौकरी से बर्खास्तगी और मामले के तीन दशक से अधिक पुराने होने को देखते हुए उसकी सजा घटाकर एक साल कर दी।

ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया कुल 10,000 रुपये का जुर्माना बरकरार रखा गया है। यह रकम अपीलकर्ता पहले ही जमा कर चुका है।

मोटरसाइकिल बुक करने के लिए 100 रुपये अतिरिक्त मांगने का आरोप

मामला 27 अप्रैल 1995 का है। शिकायतकर्ता अपनी मोटरसाइकिल को मौर्य एक्सप्रेस के जरिए बिहार के समस्तीपुर भेजने के लिए हटिया रेलवे स्टेशन पहुंचा था।

आरोप था कि उस समय पार्सल क्लर्क ने उसे 203 रुपये बुकिंग शुल्क जमा करने और जरूरी फॉर्म भरने को कहा। निर्धारित बुकिंग शुल्क के अलावा उसने कथित तौर पर 100 रुपये और मांगे।

शिकायतकर्ता ने जब पूछा कि वास्तविक बुकिंग शुल्क से अधिक रकम क्यों मांगी जा रही है, तो क्लर्क ने कथित तौर पर कहा कि अतिरिक्त 100 रुपये दिए बिना मोटरसाइकिल बुक नहीं की जाएगी।

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इसके बाद शिकायतकर्ता ने सीबीआई से संपर्क किया और मामले में एफआईआर दर्ज हुई। सीबीआई ने ट्रैप कार्रवाई की, जिसमें आरोपी को 100 रुपये की रिश्वत मांगते और स्वीकार करते हुए पकड़ा गया। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

ट्रायल कोर्ट ने 28 मई 2004 के आदेश में उसे दोषी ठहराते हुए जेल की सजा सुनाई और कुल 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया। इसी फैसले को पूर्व रेलवे कर्मचारी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

‘एक्स्ट्रा’ शब्द इस्तेमाल करने से खत्म नहीं होगी आपराधिक जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने अपने 10 सितंबर के आदेश में पाया कि रिश्वत की मांग, उसे स्वीकार किए जाने और आरोपी से रकम की बरामदगी से जुड़े बुनियादी तथ्य संदेह से परे साबित हुए हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई लोक सेवक अपने वैध आधिकारिक कर्तव्य को पूरा करने के लिए कानूनी शुल्क से अलग कोई रकम मांगता है, तो ऐसी मांग रिश्वत या अवैध पारिश्रमिक मानी जाएगी।

कोर्ट के अनुसार, अपीलकर्ता केवल इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसने रकम मांगते समय सीधे ‘रिश्वत’ शब्द का इस्तेमाल न करके उसे ‘एक्स्ट्रा’ कहा था।

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उम्र और लंबे समय से लंबित मामले के आधार पर सजा घटाने की मांग

अपीलकर्ता की ओर से एडवोकेट समीर सौरभ ने सजा को संबंधित अपराधों के लिए निर्धारित न्यूनतम अवधि तक कम करने की मांग की। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल की उम्र 75 वर्ष हो चुकी है और वह कई बीमारियों से पीड़ित हैं।

यह भी दलील दी गई कि मामला शुरू हुए तीन दशक से अधिक समय गुजर चुका है और अपीलकर्ता ने लंबे समय तक मुकदमे की प्रक्रिया का सामना किया है। बचाव पक्ष ने सजा को उसके अपराध की तुलना में अधिक बताते हुए इसमें कमी की मांग की।

सीबीआई की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया प्रशांत पल्लव ने कहा कि अपीलकर्ता का लोक सेवक होना स्वीकार्य तथ्य है। उन्होंने दलील दी कि अभियोजन ने रिकॉर्ड पर मौजूद विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए रिश्वत की मांग, उसे स्वीकार किए जाने और रकम की बरामदगी को साबित किया है।

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तीन दशक से अधिक पुराने मामले में सजा घटाकर एक साल की

हाईकोर्ट ने सजा पर फैसला करते समय इस बात को ध्यान में रखा कि घटना 1995 की थी, जबकि ट्रायल कोर्ट ने करीब नौ साल बाद 2004 में मामले का फैसला किया। इसके बाद अपील भी दो दशक से अधिक समय तक लंबित रही।

कोर्ट ने यह भी देखा कि अपीलकर्ता अब 75 वर्ष से अधिक उम्र का है और उम्र से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित है। यह उसका पहला अपराध था और उसे रेलवे की नौकरी से भी बर्खास्त किया जा चुका है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित अपराधों के लिए निर्धारित न्यूनतम सजा इस मामले में न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगी।

कोर्ट ने दोषसिद्धि और 10,000 रुपये के जुर्माने को बरकरार रखते हुए जेल की सजा घटाकर एक साल कर दी। साथ ही अपीलकर्ता को दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर कर सजा भुगतने का निर्देश दिया।

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