स्त्रीधन वापस न करने का सामान्य आरोप परिवार के हर सदस्य पर धारा 406 IPC का मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि स्त्रीधन वापस न करने का सामान्य आरोप वैवाहिक परिवार के हर सदस्य के खिलाफ IPC की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। शिकायत और चार्जशीट में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित आरोपी को संपत्ति सौंपी गई थी या उस पर उसका नियंत्रण था और बाद में उसने उस संपत्ति के संबंध में बेईमानी से कोई कृत्य किया। जस्टिस मधु जैन ने एक पति के खिलाफ धारा 406 IPC की कार्यवाही रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। हालांकि, धारा 498A सहपठित धारा 34 IPC के तहत कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई।

हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में महिला ने खुद कहा था कि उसने अपने आभूषण याचिकाकर्ता की भाभी सुखजीत कौर को उनके लॉकर में रखने के लिए दिए थे। ऐसा कोई आरोप नहीं था कि बाद में वे आभूषण याचिकाकर्ता को सौंपे गए या उसके नियंत्रण में आए। इस आधार पर कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं थे।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता एक मेडिकल प्रैक्टिशनर और अमेरिकी नागरिक है, जो 1995 से अमेरिका में रह रहा है। उसकी शादी 16 अक्टूबर 2007 को नई दिल्ली में प्रतिवादी नंबर 2 से हुई थी। इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई। शादी के बाद याचिकाकर्ता अमेरिका लौट गया और पत्नी को वहां ले जाने के लिए स्पाउसल वीजा हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

दिसंबर 2013 में याचिकाकर्ता ने अमेरिका के मिसौरी स्थित सर्किट कोर्ट ऑफ ग्रीन काउंटी में विवाह निरस्तीकरण की कार्यवाही शुरू की। 15 जनवरी 2015 के फैसले से वहां की कोर्ट ने धोखाधड़ी के आधार पर विवाह को निरस्त कर दिया।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने दिल्ली की फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत याचिका दाखिल की, जिसे जनवरी 2019 में वापस ले लिया गया।

प्रतिवादी नंबर 2 ने बाद में क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल में शिकायत की। इसमें वैवाहिक क्रूरता, नकद और वाहन की मांग, जमीन खरीदने और अस्पताल स्थापित करने के लिए करीब ₹16-17 करोड़ की मांग और याचिकाकर्ता की भाभी सुखजीत कौर को सौंपे गए आभूषण वापस नहीं करने के आरोप लगाए गए।

जांच के बाद 23 जून 2019 को पुलिस स्टेशन कीर्ति नगर में IPC की धारा 498A और 406 सहपठित धारा 34 के तहत FIR दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 498A और 406 IPC के तहत चार्जशीट दाखिल की गई। सुखजीत कौर को चार्जशीट के कॉलम नंबर 12 में रखा गया और उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिलने की बात दर्ज की गई।

याचिकाकर्ता ने कार्यवाही रद्द करने की मांग की

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याचिकाकर्ता ने धारा 482 CrPC के तहत हाईकोर्ट का रुख करते हुए FIR रद्द करने की मांग की। उसकी ओर से दलील दी गई कि आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और भारत में उसके द्वारा शुरू की गई वैवाहिक कार्यवाही के जवाब में FIR दर्ज कराई गई।

याचिकाकर्ता ने धारा 468 CrPC के तहत लिमिटेशन का मुद्दा भी उठाया। दलील दी गई कि धारा 498A और 406 IPC के अपराधों में अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है और शिकायत निर्धारित समय-सीमा के बाद की गई थी। उसने अमेरिकी कोर्ट के विवाह निरस्तीकरण के आदेश, वीजा रिकॉर्ड और इमिग्रेशन वकीलों के साथ हुए पत्राचार पर भी भरोसा किया।

दूसरी ओर, प्रतिवादी नंबर 2 ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि शिकायत में विशिष्ट आरोप लगाए गए हैं। उनकी ओर से शारीरिक और यौन क्रूरता, इनोवा वाहन की मांग, करीब ₹16-17 करोड़ की मांग, याचिकाकर्ता के भाई को कथित रूप से ₹7 लाख दिए जाने और आभूषण वापस नहीं किए जाने के आरोपों का उल्लेख किया गया।

धारा 498A के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों को केवल अस्पष्ट या सामान्य नहीं कहा जा सकता। शिकायत में बार-बार अपमान और दुर्व्यवहार, पैसों की मांग तथा शारीरिक और यौन क्रूरता के विशिष्ट आरोप लगाए गए थे।

कोर्ट ने कहा:

“इन आरोपों को वर्तमान कार्यवाही के सीमित उद्देश्य के लिए उनके प्रथम दृष्टया स्वरूप में स्वीकार करने पर याचिकाकर्ता द्वारा क्रूरता और उत्पीड़न का प्रथम दृष्टया मामला सामने आता है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कथित घटनाएं वास्तव में हुईं या नहीं, वित्तीय लेनदेन की प्रकृति क्या थी और प्रतिवादी नंबर 2 इन आरोपों को अंततः साबित कर पाएगी या नहीं, ये सभी साक्ष्य से जुड़े प्रश्न हैं। धारा 482 CrPC की कार्यवाही में याचिकाकर्ता के पक्ष को प्रतिवादी के पक्ष पर वरीयता देकर इनका फैसला नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विदेशी कोर्ट का आदेश, वीजा रिकॉर्ड और इमिग्रेशन वकीलों के साथ पत्राचार याचिकाकर्ता के बचाव में सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे भारत में हुई बताई गई विशिष्ट घटनाओं को निर्णायक रूप से खारिज नहीं करते।

याचिकाकर्ता को स्त्रीधन सौंपे जाने का आरोप नहीं

धारा 406 IPC के आरोप की अलग से जांच करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक विश्वासघात के लिए आरोपी को संपत्ति सौंपा जाना या उस संपत्ति पर उसका नियंत्रण होना आवश्यक है। इसके बाद उस संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग, इस्तेमाल या निपटान भी दिखाया जाना चाहिए।

कोर्ट ने पाया कि शिकायत में याचिकाकर्ता को आभूषण सौंपे जाने का बुनियादी आरोप ही मौजूद नहीं था। प्रतिवादी नंबर 2 ने स्वयं कहा था कि आभूषण याचिकाकर्ता की भाभी सुखजीत कौर को उनके लॉकर में रखने के लिए दिए गए थे।

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शिकायत में यह नहीं कहा गया कि बाद में ये आभूषण याचिकाकर्ता को दिए गए या उसके नियंत्रण में आए। न ही ऐसा आरोप था कि याचिकाकर्ता से आभूषण वापस मांगे गए और उसने बेईमानी की नीयत से उन्हें लौटाने से इनकार किया, उनका इस्तेमाल किया या उनका निपटान कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि चार्जशीट से भी यह कमी दूर नहीं होती। चार्जशीट में खुद यह दर्ज था कि आभूषण सुखजीत कौर के पास थे। जांच एजेंसी ने उन्हें कॉलम नंबर 12 में रखा था और उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिलने की बात दर्ज की थी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आभूषण या अन्य सामान खरीदे जाने या कुछ वस्तुएं याचिकाकर्ता को उपहार में दिए जाने का आरोप अपने आप में धारा 405 IPC के तहत संपत्ति सौंपे जाने की आवश्यकता को पूरा नहीं करता।

इसी तरह, सुखजीत कौर के पास कथित रूप से आभूषण होने को केवल पारिवारिक संबंध के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ नहीं माना जा सकता, जब दोनों के बीच आभूषण रखने या उनका दुरुपयोग करने के संबंध में समान आशय का कोई आरोप या सामग्री मौजूद न हो।

हर पारिवारिक सदस्य के खिलाफ धारा 406 का मुकदमा नहीं चल सकता

हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले Raj Kumar Khanna v. State (NCT of Delhi) का उल्लेख किया। उस मामले में भी संपत्ति सौंपे जाने का आरोप नहीं मिलने पर धारा 406 IPC की कार्यवाही रद्द कर दी गई थी, जबकि धारा 498A IPC की कार्यवाही जारी रखी गई थी।

मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने कहा:

“उपरोक्त निर्णय से सामने आने वाला सिद्धांत यह है कि स्त्रीधन वापस न करने का सामान्य आरोप वैवाहिक परिवार के प्रत्येक सदस्य के खिलाफ धारा 406 IPC के तहत अभियोजन को कायम नहीं रख सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“शिकायत और चार्जशीट में संबंधित आरोपी को संपत्ति सौंपे जाने या उस पर उसके नियंत्रण तथा इसके बाद सौंपी गई संपत्ति के साथ बेईमानीपूर्ण व्यवहार का खुलासा होना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन की पूरी सामग्री को सही मान लेने के बाद भी याचिकाकर्ता के खिलाफ ये आवश्यक तथ्य सामने नहीं आते। इसलिए उसके खिलाफ धारा 406 IPC की कार्यवाही जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

लिमिटेशन का सवाल ट्रायल कोर्ट तय करेगा

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हाईकोर्ट ने लिमिटेशन के मुद्दे पर कहा कि धारा 468(2)(c) CrPC के तहत तीन साल की समय-सीमा लागू होती है। हालांकि, केवल तारीखों की गणना के आधार पर इस स्तर पर कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती क्योंकि धारा 470 और 473 CrPC के प्रावधानों पर भी विचार करना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि धारा 470(4)(a) CrPC के तहत आरोपी के भारत से बाहर रहने की अवधि को लिमिटेशन की गणना से बाहर रखा जाना है। रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता का पूरा पासपोर्ट, इमिग्रेशन या एंट्री-एग्जिट रिकॉर्ड मौजूद नहीं था, इसलिए इस स्तर पर निर्णायक गणना संभव नहीं थी।

प्रतिवादी नंबर 2 ने देरी के पीछे यह कारण बताया था कि उसे विवाह बचने की उम्मीद थी। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“यह कोर्ट न तो देरी को माफ कर रहा है और न ही इस स्पष्टीकरण पर कोई अंतिम निष्कर्ष दर्ज कर रहा है।”

कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों पर न्यायिक विचार जरूरी है और धारा 468 CrPC को मौजूदा कार्यवाही में FIR रद्द करने का स्वतः आधार नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ FIR, चार्जशीट और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को केवल धारा 406 IPC के अपराध की सीमा तक रद्द कर दिया।

वहीं, धारा 498A सहपठित धारा 34 IPC के तहत FIR, चार्जशीट और आगे की कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रहेगी।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि शेष अपराध का संज्ञान लेने से पहले लिमिटेशन के सवाल पर स्वतंत्र रूप से निर्णय करे। इस दौरान धारा 470 CrPC के तहत बाहर रखी जाने वाली अवधि और धारा 473 CrPC की लागू होने की स्थिति पर भी उपलब्ध सामग्री के आधार पर विचार किया जाए।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि फैसले में कही गई किसी बात को शेष अभियोजन के गुण-दोष पर राय या याचिकाकर्ता के खिलाफ उसके आवश्यक तत्व स्थापित होने के निष्कर्ष के रूप में नहीं माना जाएगा।

Case Title: Harcharanjeet Bains v. State & Anr.

Case No.: CRL.M.C. 4517/2023 & CRL.M.A. 17279/2023

Bench: जस्टिस मधु जैन

Date: 16 सितंबर 2026

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