पत्नी को खुदकुशी के लिए उकसाने के 28 साल पुराने मामले में पति की सजा बरकरार, झारखंड हाईकोर्ट ने दिया सरेंडर का आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने 1998 के एक चर्चित मामले में फैसला सुनाते हुए पत्नी को प्रताड़ित करने और उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोपी पति की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने माना कि शराब की लत, गहने बेचना, पैसों की मांग और रोज-रोज की मारपीट से महिला का जीवन अभिशाप बन गया था। इसके साथ ही अदालत ने दोषी पति को दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर बची हुई सजा काटने का निर्देश दिया है।

ट्रायल कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने 12 अगस्त को जारी अपने आदेश में स्पष्ट किया कि महिला ने 10 अक्टूबर 1998 की रात कुएं में कूदकर अपनी जान दी थी और इसकी मुख्य वजह उसके पति का व्यवहार ही था। अदालत ने टिप्पणी की कि भारतीय समाज में महिलाएं आमतौर पर पति द्वारा शराब पीने और हिंसा करने को लेकर बेहद संवेदनशील होती हैं। यदि महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो और उसकी अपनी आय का जरिया न हो, तो लगातार शारीरिक उत्पीड़न और पति की शराबखोरी उसे स्वाभाविक रूप से खुदकुशी की ओर धकेल देती है।

मामले में आरोपी के दो अन्य रिश्तेदारों की भी सजा पर निर्णय आया। हाईकोर्ट ने पाया कि एक रिश्तेदार के खिलाफ क्रूरता का कोई विशिष्ट साक्ष्य या आरोप नहीं है, इसलिए उसकी अपील स्वीकार करते हुए उसकी सजा को निरस्त कर दिया गया। वहीं, दूसरे रिश्तेदार की अगस्त 2012 में सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो चुकी थी, जिसके कारण उनके खिलाफ अपील समाप्त हो गई।

क्या था पूरा मामला और पिता के आरोप

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यह मामला फरवरी 1997 में हुई एक शादी से जुड़ा है। पीड़िता के पिता के अनुसार, विवाह के समय बेटी को गृहस्थी का सामान और गहने दिए गए थे। शादी के बाद दंपती की एक बेटी भी हुई। लेकिन जल्द ही पति ने शराब और जुए जैसी बुरी आदतों के लिए अपनी पत्नी के गहने बेचने शुरू कर दिए।

पिता का आरोप था कि अतिरिक्त पैसों की मांग पूरी न होने पर पति और उसके परिजनों ने महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। इस संबंध में ग्रामीणों को भी सूचित किया गया था, लेकिन उन्होंने पिता को कानूनी कार्रवाई करने से रोक दिया। 10 अक्टूबर 1998 की रात करीब 11 बजे पिता को सूचना मिली कि उनकी बेटी कुएं में गिर गई है। मौके पर पहुंचने पर पिता ने बेटी का शव कुएं के पास पड़ा देखा और दावा किया कि उसके हाथ बंधे हुए थे। हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में साफ किया कि महिला को कुएं में फेंका नहीं गया था, बल्कि उसने पति के प्रताड़न से तंग आकर खुदकुशी की थी।

निचली अदालत का फैसला और कानूनी बहस

यह याचिका मार्च 2004 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने पति को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) और धारा 498ए (पति या रिश्तेदार द्वारा क्रूरता) के तहत 7 साल की कैद की सजा सुनाई थी, जबकि दो रिश्तेदारों को 2-2 साल की सजा दी थी।

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हाईकोर्ट में बचाव पक्ष के वकील आलोक आनंद ने तर्क दिया कि धारा 498ए के तहत प्रताड़ना का मामला नहीं बनता क्योंकि दहेज की कोई मांग नहीं की गई थी। उन्होंने दावा किया कि महिला की मौत कुएं में गिरने से हुई एक दुर्घटना थी। इसके अलावा उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र गवाहों के बयानों को नजरअंदाज कर केवल करीबी रिश्तेदारों की गवाही पर सजा सुनाई, जो कानूनी रूप से सही नहीं है।

वहीं, अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक लोक अभियोजक तरुण कुमार ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने सभी साक्ष्यों का बारीकी से मूल्यांकन किया था और आरोपियों को दोषी ठहराने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की थी। इसलिए सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए।

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