गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत में भूख से बिलखती अपनी दो साल की बेटी की पिटाई के बाद हुई मौत के मामले में आरोपी गर्भवती महिला लखी सोलंकी को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह त्रासदी किसी एक व्यक्ति का आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक कल्याण प्रणालियों की सामूहिक विफलता को दर्शाती है।
जस्टिस एच डी सुथार की पीठ ने 25 हजार रुपये के निजी मुचलके और एक ज़मानतदार की शर्त पर महिला को रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ता 19 मार्च 2026 से हिरासत में है। उसके साथ एक नवजात बच्चा जेल के भीतर है, जबकि एक अन्य मासूम बच्चा बाहर बिना माता-पिता की देखभाल के रह रहा है। अदालत ने कहा कि चूंकि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल कर दी गई है, इसलिए विचारणा से पहले लंबे समय तक जेल में रखना सजा देने जैसा होगा। इसके साथ ही पीठ ने इस कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि जमानत नियम है और जेल एक अपवाद।
घटना और जांच का विवरण
यह मामला सूरत में दो वर्षीय बच्ची ईशा की मौत से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी लखी सोलंकी का पति लगभग छह महीने से समुद्री यात्रा पर गया हुआ था और उसने परिवार को बिना किसी आर्थिक मदद के भुखमरी की स्थिति में छोड़ दिया था। इसके बाद लखी अपनी दो छोटी बेटियों को लेकर अपने ससुराल से अलग हो गई और ‘मैत्री करार’ (साथ रहने के औपचारिक अनुबंध) के तहत एक अन्य व्यक्ति के साथ रहने लगी।
अभियोजन के मुताबिक, 19 मार्च 2026 को बच्ची ईशा भूख के कारण लगातार रो रही थी। बच्ची के बार-बार खाना मांगने से परेशान होकर लखी ने कथित तौर पर उसकी पिटाई कर दी। इसके बाद बच्ची सो गई, लेकिन जब लखी उसे जगा नहीं पाई, तो वह तुरंत अचेत अवस्था में बच्ची को सूरत के स्मिमर अस्पताल ले गई। वहां डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण शारीरिक हमले से लगी चोटों को बताया गया। अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से मेडिकल रिपोर्ट और मृतक बच्ची की तीन वर्षीय बहन के बयान पर आधारित है, जो इस घटना की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी है।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
जमानत याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और तीन साल की बहन के बयान का हवाला देते हुए कहा कि रिहा किए जाने पर आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकती है।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष के वकील ने अदालत को बताया कि लखी सात महीने से अधिक की गर्भवती है, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जांच एजेंसियों को उससे अब कोई बरामदगी नहीं करनी है। ऐसे में मुकदमे से पहले उसे जेल में रखने का कोई औचित्य नहीं बनता।
अदालत का फैसला और मंशा पर टिप्पणी
मामले के तथ्यों का मूल्यांकन करते हुए जस्टिस सुथार ने कहा कि अपनी बेटी को बेहोश पाने के बाद लखी तुरंत उसे इलाज के लिए अस्पताल ले गई थी। अदालत के अनुसार, महिला का यह आचरण दर्शाता है कि उसका कोई आपराधिक इरादा या दुर्भावना नहीं थी, बल्कि यह अत्यधिक मानसिक तनाव और बच्चे की भूख न मिटा पाने की बेबसी में उठाया गया एक लापरवाह कदम था।
संवैधानिक दायित्व और धार्मिक-साहित्यिक संदर्भ
अदालत ने अपराध के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि अत्यधिक गरीबी और भुखमरी मानव व्यवहार को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। संवैधानिक प्रावधानों को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने शुरुआती बचपन की देखभाल से जुड़े अनुच्छेद 45 और सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पोषण स्तर में सुधार करने के राज्य के कर्तव्य का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि जब भुखमरी किसी मां को ऐसे चरम कदम उठाने पर मजबूर कर देती है, तो यह राज्य और समाज के सहायता तंत्र की नाकामी है।
इस फैसले में गरीबी और अपराध के संबंध को समझाने के लिए कई साहित्यिक, दार्शनिक और धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख किया गया। आदेश में पन्नालाल पटेल के प्रसिद्ध गुजराती उपन्यास ‘मानवी नी भवाई’ (जो अकाल की त्रासदी पर आधारित है) और विक्टर ह्यूगो के ‘ले मिज़रेबल्स’ का हवाला दिया गया। इसके अलावा चार्ल्स डिकेंस और अरस्तू के उन विचारों का भी उल्लेख किया गया जिनमें गरीबी को अपराध और क्रांति का मुख्य कारण बताया गया है।
अदालत ने भगवद्गीता, बाइबल और इस्लामी पवित्र ग्रंथों के उन अंशों को भी उद्धृत किया जो भूखों को भोजन कराने का संदेश देते हैं। फैसले में कहा गया कि किसी व्यक्ति को भुखमरी से मरने देना समाज की नैतिक और आध्यात्मिक विफलता है।
जमानत मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला करुणा, सामाजिक जिम्मेदारी और यह सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता का आह्वान करता है कि कोई भी मां या बच्चा भुखमरी के अपमान को न सहने पाए। आदेश के अंत में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि एक भूखे व्यक्ति को दर्शन से पहले रोटी की आवश्यकता होती है।

