पीएफआई आरोपियों के ट्रायल में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, लखनऊ की विशेष अदालत से मांगी रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में साल 2021 से जेल में बंद पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के दो कथित सदस्यों के मुकदमे में हो रही देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने लखनऊ स्थित विशेष एनआईए/एटीएस अदालत को निर्देश दिया है कि वह एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपकर स्पष्ट करे कि दो बार दिए गए आदेशों के बावजूद मुकदमे की कार्यवाही में तेजी क्यों नहीं लाई गई। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को तय की है।

गवाहियों की धीमी रफ्तार और बचाव पक्ष की दलील

अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील ने बताया कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज इस मामले की सुनवाई बेहद धीमी गति से चल रही है। उन्होंने पीठ को अवगत कराया कि अभियोजन पक्ष के कुल 18 गवाहों में से केवल दूसरे गवाह की जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) ही अब तक पूरी नहीं हो पाई है, जबकि मुख्य शिकायतकर्ता एटीएस अधिकारी से पूछताछ की शुरुआत भी नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने सुनवाई में अनिश्चितकालीन देरी की आशंका जताई और दोनों आरोपियों के लिए जमानत की मांग की।

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मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस के आरोप

यह मामला फरवरी 2021 का है, जब उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने केरल के रहने वाले अनसद बदरुद्दीन और फिरोज को लखनऊ से गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी का आरोप था कि दोनों आरोपी केरल से हिंदू धार्मिक संगठनों के नेताओं को निशाना बनाने और धार्मिक आयोजनों में धमाके कर दहशत फैलाने की साजिश के तहत आए थे। एटीएस ने उनके पास से हथियार, विस्फोटक और डेटोनेटर बरामद करने का दावा किया था। इसके अलावा, आरोपियों से मलयालम भाषा में लिखी एक डायरी भी जब्त की गई थी, जिसमें ‘हमला’, ‘आगजनी’, ‘यूएस’ और ‘राम मंदिर’ जैसे शब्द सांकेतिक भाषा में लिखे होने का दावा किया गया था।

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अदालती कार्रवाई और पिछला घटनाक्रम

हाईकोर्ट ने इससे पहले दिसंबर 2022 में केस डायरी के आधार पर दोनों की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उनके नापाक इरादों को नकारा नहीं जा सकता। उस समय भी हाईकोर्ट ने निचली अदालत को जल्द सुनवाई पूरी करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद, जनवरी 2024 में धारा 482 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष को गवाहों से जिरह की अनुमति दी थी और बिना वजह सुनवाई स्थगित न करने का आदेश दिया था। हालांकि, 3 अगस्त के अपने आदेश में पीठ ने टिप्पणी की कि विशेष एनआईए/एटीएस अदालत ने हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करने में उचित तत्परता नहीं दिखाई है।

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आरोपियों की सफाई और पीएफआई पर प्रतिबंध

सुनवाई के दौरान आरोपियों ने खुद को बेकसूर बताते हुए कहा कि वे केवल सवारियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने का काम करते थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि केरल में उनके खिलाफ दर्ज पांच मामले मामूली प्रकृति के थे। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 2022 में पीएफआई और उससे जुड़े संगठनों पर टेरर फंडिंग, कट्टरपंथ और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों के तहत बैन लगा दिया था।

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