उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने देवरिया की जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) शालिनी श्रीवास्तव की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला एक सहायक शिक्षक, कृष्णा मोहन सिंह की आत्महत्या से जुड़ा है, जिन्होंने कथित तौर पर प्रशासनिक प्रताड़ना और लाखों रुपये की जबरन वसूली से तंग आकर मौत को गले लगा लिया था।
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने मामले के तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यह फैसला सुनाया।
भ्रष्टाचार और मानसिक उत्पीड़न का दर्दनाक अंत
मृतक शिक्षक की पत्नी गुड़िया सिंह द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, यह आत्महत्या कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं बल्कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा किए जा रहे सुनियोजित उत्पीड़न का नतीजा थी।
आरोप है कि बेसिक शिक्षा विभाग के कार्यालय में तैनात एक क्लर्क संजीव सिंह ने कृष्णा मोहन सिंह और उनके दो अन्य सहयोगियों से नौकरी बहाल रखने के एवज में ₹16 लाख की भारी-भरकम रिश्वत मांगी थी। क्लर्क ने धमकी दी थी कि यदि समय पर रकम नहीं दी गई, तो उनकी बर्खास्तगी के पुराने आदेशों को दोबारा लागू कर दिया जाएगा। अपनी मेहनत की नौकरी बचाने के लिए शिक्षकों ने मिलकर यह बड़ी रकम चुका भी दी।
लेकिन भ्रष्टाचार का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। आरोप है कि इसके बाद भी बीएसए शालिनी श्रीवास्तव ने अपने क्लर्क के माध्यम से और अधिक पैसों की मांग जारी रखी।
जब आर्थिक रूप से टूट चुके कृष्णा मोहन सिंह ने और पैसे देने में असमर्थता जताई और पहले दी गई रकम वापस मांगी, तो उन्हें 20 फरवरी 2026 को देवरिया कार्यालय बुलाया गया। आरोप के मुताबिक, दफ्तर में बीएसए शालिनी श्रीवास्तव और क्लर्क संजीव सिंह ने शिक्षक को बुरी तरह अपमानित किया, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाने की खुली धमकी दी।
विभाग की प्रताड़ना से टूट गए थे शिक्षक
इस प्रशासनिक अपमान और धमकी से बुरी तरह टूट चुके कृष्णा मोहन सिंह ने उसी रात (20-21 फरवरी 2026 की दरमियानी रात) पंखे से लटककर अपनी जान दे दी। आत्महत्या करने से पहले उन्होंने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था, जिसमें उन्होंने अपनी इस खौफनाक मौत के लिए शिक्षा विभाग के जिम्मेदारों और उनके उत्पीड़न को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया था।
सालों तक चला नौकरी बचाने का कानूनी संघर्ष
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में कानूनी और प्रशासनिक खींचतान का एक लंबा इतिहास रहा है:
- 1 जुलाई 2016: कृष्णा मोहन सिंह को गौरी बाजार, देवरिया के कृषक लघु माध्यमिक विद्यालय (मदारसन) में सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था।
- साल 2023: कुछ सेवा-संबंधी आरोपों के आधार पर कृष्णा मोहन सिंह, ओमकार सिंह और अपर्णा तिवारी नाम के तीन सहायक शिक्षकों की नियुक्तियों को गलत ढंग से रद्द कर दिया गया।
- 4 अप्रैल 2022: शिक्षकों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां अदालत ने कृष्णा के पक्ष में फैसला सुनाया।
- मार्च-अप्रैल 2023: कोर्ट की राहत के बावजूद, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 24 मार्च और 1 अप्रैल 2023 को नए आदेश जारी कर उनकी सेवाएं फिर से समाप्त कर दीं।
- 13 फरवरी: दोबारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने विभाग के बर्खास्तगी के आदेशों को पूरी तरह रद्द कर दिया और बीएसए को नए सिरे से नियमानुकूल आदेश जारी करने का निर्देश दिया।
आरोप है कि हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद शिक्षा विभाग ने जानबूझकर कोई नया प्रशासनिक आदेश जारी नहीं किया, ताकि इस देरी का इस्तेमाल शिक्षकों से मोटी रकम वसूलने के लिए एक हथियार के रूप में किया जा सके।
हाईकोर्ट ने केस की संवेदनशीलता, सुसाइड नोट में दर्ज तथ्यों और पीड़ित पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद आरोपी बीएसए शालिनी श्रीवास्तव को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार करते हुए उनकी अग्रिम जमानत अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया।

