सोशल मीडिया पर प्रभाव और जवाबदेही: मधु किश्वर केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अग्रिम जमानत याचिका खारिज

सोशल मीडिया पर बिना सोचे-समझे सामग्री साझा करने और उसके समाज पर पड़ने वाले व्यापक असर को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने चर्चित शिक्षाविद और लेखिका मधु पूर्णिमा किश्वर की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एक बड़ी सोशल मीडिया फॉलोइंग अपने साथ समाज के प्रति बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी लाती है।

यह पूरा मामला एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक कथित तौर पर छेड़छाड़ किए गए (फेक) 14 सेकंड के वीडियो को साझा करने और उसके जरिए अशांति फैलाने के आरोपों से जुड़ा है। जस्टिस अमन चौधरी की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक आलोचना के नाम पर किसी को ट्रोल करने या समाज में वैमनस्य फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

अदालत की दो टूक: ‘जब देखना ही विश्वास बन जाए, तो नियमन जरूरी’

सुनवाई के दौरान अदालत ने डिजिटल युग में तेजी से फैलने वाली अफवाहों और उनके वास्तविक जीवन पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभावों पर चिंता जताई। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा:

“आज के समय में जहां केवल देखना ही लोगों के लिए विश्वास करने का आधार बन जाता है, वहां नियमन (Regulatory provisions) की सख्त जरूरत है।”

अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह एक सामान्य भूल थी। याचिकाकर्ता के रसूख और विद्वता का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि मधु किश्वर जैसी जानी-मानी शख्सियत इस बात से बेखबर नहीं हो सकतीं कि उनके एक पोस्ट का समाज पर क्या असर होगा। इस तरह की संवेदनशील पोस्ट्स समाज में विभाजनकारी और अलगाववादी भावनाओं को भड़का सकती हैं, जिससे देश की एकता को खतरा पैदा हो सकता है।

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क्या है पूरा विवाद?

चंडीगढ़ पुलिस ने मधु किश्वर के खिलाफ मानहानि, नफरत फैलाने और जालसाजी से जुड़ी विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार:

  • साधारण री-ट्वीट नहीं, सीधा अपलोड: चंडीगढ़ प्रशासन के वकील ने दलील दी कि यह केवल किसी पोस्ट को री-ट्वीट करने का मामला नहीं था। यह वीडियो पहले फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर अपलोड हुआ था। किश्वर ने इसे वहां से डाउनलोड किया और सीधे अपने निजी एक्स हैंडल से पोस्ट किया।
  • विशाल दर्शक वर्ग: एक्स पर किश्वर के लगभग 18 लाख फॉलोअर्स हैं। उनके द्वारा पोस्ट किए जाने के बाद इस वीडियो को 1,74,000 से अधिक बार देखा गया।
  • संवैधानिक पद की गरिमा: वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर यह कयास लगाए जाने लगे कि इसमें दिख रहा व्यक्ति देश के एक बेहद महत्वपूर्ण और संवैधानिक पद पर बैठा शख्स है। अभियोजन के मुताबिक, इस पोस्ट ने न केवल अफवाह को हवा दी, बल्कि सरकार के मुखिया की छवि को भी नुकसान पहुंचाया।
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बचाव पक्ष का तर्क: ‘भावना दुर्भावनापूर्ण नहीं थी’

अदालत में मधु किश्वर का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और सरताज सिंह नरूला ने अग्रिम जमानत की मांग करते हुए कई दलीलें दीं:

  • कोई जालसाजी नहीं की: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि चूंकि वीडियो को बनाने या एडिट करने में किश्वर की कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए उन पर जालसाजी (Forgery) के आरोप लागू नहीं होते।
  • बेदाग इतिहास: वे एक वरिष्ठ शिक्षाविद हैं, कई स्थापित पुस्तकों की लेखिका हैं और उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है।
  • कमेंट्स पर नियंत्रण नहीं: वकीलों का कहना था कि सोशल मीडिया पर पोस्ट अपलोड होने के बाद आम लोग या सह-आरोपी उस पर क्या टिप्पणी करते हैं, इसके लिए किश्वर को कानूनन जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
  • पुराने पोस्ट्स का हवाला गलत: बचाव पक्ष ने दलील दी कि पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में जिन पुराने संवेदनशील पोस्ट्स का जिक्र किया गया है, वे इस केस में अप्रासंगिक हैं क्योंकि उन पर पहले कभी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई।
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क्यों खारिज हुई जमानत याचिका?

हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करने के पीछे दो सबसे मुख्य वजहें बताईं:

  1. जांच में असहयोग: पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट से पता चला कि चंडीगढ़ पुलिस ने किश्वर को उनके दिल्ली स्थित पते पर 20 अप्रैल, 26 अप्रैल और 5 मई को जांच में शामिल होने के लिए तीन बार समन भेजा था, लेकिन वह एक बार भी पेश नहीं हुईं। अदालत ने इसे जांच एजेंसी के साथ असहयोग का स्पष्ट उदाहरण माना।
  2. शुरुआती दौर की जांच: कोर्ट ने कहा कि इस समय चंडीगढ़ पुलिस की जांच बेहद शुरुआती चरण में है और कई महत्वपूर्ण पहलुओं का सामने आना बाकी है। ऐसी स्थिति में मामले में किसी भी आपराधिक मंशा की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।

इन्हीं आधारों पर अदालत ने मधु पूर्णिमा किश्वर को किसी भी प्रकार की राहत या प्री-अरेस्ट बेल देने से इनकार कर दिया।

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