फेसबुक पोस्ट पर मानहानि का मुकदमा खारिज: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा—अपमानजनक या व्यंग्यात्मक टिप्पणियों से प्रतिष्ठा घटने का सबूत जरूरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक वकील द्वारा अपनी अलग रह रही पत्नी और उनके परिजनों के खिलाफ दायर 1 लाख रुपये के मानहानि मुकदमे को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद के दौरान सोशल मीडिया पर की गई तंजभरी या अपमानजनक टिप्पणियां तब तक मानहानि नहीं मानी जा सकतीं, जब तक कि इससे समाज या पेशे में व्यक्ति की साख घटने का ठोस सबूत न दिया जाए।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 30 जुलाई के अपने आदेश में जिला अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल किसी बयान से व्यक्तिगत रूप से आहत होना, मानसिक तनाव या झुंझलाहट होना मानहानि का आधार नहीं बन सकता। कानूनन मानहानि साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि संबंधित टिप्पणी से दूसरों की नजरों में उस व्यक्ति का सम्मान कम हुआ है।

मानहानि के लिए व्यावसायिक नुकसान का प्रमाण जरूरी

अदालत ने अवलोकन किया कि याचिकाकर्ता पति की ओर से ऐसा कोई सबूत या गवाह पेश नहीं किया गया—जैसे कि उनके मुवक्किल, सहकर्मी या कानूनी पेशे के सदस्य—जिससे यह साबित हो सके कि इन पोस्ट्स के कारण उनकी व्यावसायिक छवि को कोई नुकसान पहुंचा है या किसी ने उनके बारे में गलत राय बनाई है।

पति की वकील भनिता पाटोवारी ने तर्क दिया था कि फेसबुक पोस्ट्स में झूठे आरोप लगाए गए, जिन्हें तीसरे पक्ष के सामने प्रस्तुत कर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की मंशा थी, जो साइबर मानहानि के दायरे में आता है। दूसरी ओर, पत्नी पक्ष का कहना था कि ये पोस्ट केवल व्यक्तिगत नाराजगी, राय और व्यंग्य थे, तथा मानहानि के आवश्यक कानूनी तत्व इसमें शामिल नहीं हैं।

READ ALSO  यदि पिता की मृत्यु एक दिन बाद होती, तो बेटे को कोई अधिकार नहीं मिलता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को स्पष्ट किया 

200 ग्राम दिमाग और किक हिस ऐस जैसे बयानों पर कोर्ट का रुख

मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी के भाई द्वारा फेसबुक पर की गई कई टिप्पणियों का उल्लेख हुआ, जिनमें “200 ग्राम दिमाग”, “किक हिस ऐस”, “हैप्पी बर्निंग”, “पी फॉर पजामा” और “प्यार से वकील बाबू” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने स्वीकार किया कि ये टिप्पणियां अप्रिय और व्यंग्यात्मक थीं, लेकिन ये मुख्य रूप से पारिवारिक कड़वाहट और व्यक्तिगत शिकायतों को दर्शाती हैं। अदालत ने कहा कि हर कड़वी या अरुचिकर बात को अपने आप में मानहानि नहीं माना जा सकता।

READ ALSO  आंध्र प्रदेश कोर्ट ने चंद्रबाबू नायडू की हिरासत की मांग करने वाली सीआईडी की याचिका पर सुनवाई 22 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दी

2016 से जारी वैवाहिक विवाद

यह विवाद साल 2016 में तब शुरू हुआ था जब पत्नी अपनी बेटी को लेकर अलग रहने लगी थीं। इसके बाद पत्नी के भाई ने सोशल मीडिया पर पति और पिता के रूप में उनके आचरण की आलोचना करते हुए कई टिप्पणियां की थीं। पति ने यह भी आरोप लगाया था कि उनकी सहमति के बिना बेटी का नाम बदल दिया गया। हालांकि, पत्नी और उनके परिवार ने अदालत को बताया कि बच्ची का आधिकारिक नाम वही है और नया नाम सिर्फ प्यार से बुलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

READ ALSO  बार काउन्सिल ने चार फ़र्म को वकालत करने से रोका- जानिए पूरा मामला

अदालत ने अंत में निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि इन पोस्ट्स से पति को व्यक्तिगत स्तर पर दुख पहुंचा हो सकता है, लेकिन समाज या कानूनी पेशे में उनकी साख को कोई क्षति पहुंचने का प्रमाण नहीं मिला है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles