दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘एन इनिया पोन निलावे’ गाने के सिर्फ संगीत पर इलैयाराजा का अधिकार, साउंड रिकॉर्डिंग और बोल पर सारेगामा का हक

देश के मशहूर संगीतकार और पद्म भूषण से सम्मानित इलैयाराजा को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वर्ष 1981 की बहुचर्चित तमिल मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्म ‘मूडू पानी’ के सदाबहार गीत “एन इनिया पोन निलावे” (En Iniya Pon Nilave) की साउंड रिकॉर्डिंग और इसके बोलों (lyrics) पर इलैयाराजा का कोई कॉपीराइट नहीं है।

जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संगीतकार के रूप में इलैयाराजा का अधिकार केवल गाने की मूल धुन यानी उसके ‘म्यूजिकल कंपोनेंट’ तक ही सीमित है। कोर्ट ने साफ किया कि गाने की साउंड रिकॉर्डिंग पर अंतिम मालिकाना हक रिकॉर्ड लेबल ‘सारेगामा इंडिया लिमिटेड’ का है, जबकि इसके बोलों (lyrics) पर अधिकार केवल इसके गीतकार का है।

क्या है पूरा विवाद?

इस कानूनी लड़ाई की जड़ें आज से करीब 45 साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘मूडू पानी’ (1981) से जुड़ी हैं। के. जे. येसुदास द्वारा गाए गए इस बेहद लोकप्रिय गाने का संगीत इलैयाराजा ने तैयार किया था, जो उनके करियर की 100वीं फिल्म के रूप में दर्ज है। 1980 में, म्यूजिक लेबल सारेगामा इंडिया लिमिटेड (SIL) ने इस फिल्म के निर्माता ‘राजा सिने आर्ट्स’ के साथ एक व्यावसायिक समझौता किया था। इस समझौते के तहत सारेगामा ने फिल्म के सभी गीतों की साउंड रिकॉर्डिंग के कॉपीराइट हासिल कर लिए थे।

विवाद तब शुरू हुआ जब सारेगामा ने इस साल जनवरी में फिल्म वितरण कंपनी ‘वेल्स फिल्म इंटरनेशनल लिमिटेड’ (VFIL), डिवो टीवी प्राइवेट लिमिटेड और खुद इलैयाराजा के खिलाफ अदालत में कॉपीराइट उल्लंघन का मामला दायर किया। दरअसल, वेल्स फिल्म इंटरनेशनल (VFIL) अपनी नई फिल्म ‘अगाथिया’ (Aghathiyaa) में इस गाने का इस्तेमाल करना चाहती थी, जिसके लिए उसने इलैयाराजा से अनुमति ली थी।

शुरुआती सुनवाई में कोर्ट के सिंगल जज ने सारेगामा के पक्ष में फैसला सुनाया था। हालांकि, तब कोर्ट ने सारेगामा द्वारा ₹30 लाख की लाइसेंस फीस स्वीकार करने के बाद वीएफआईएल (VFIL) को नई फिल्म में गाने के इस्तेमाल की अनुमति दे दी थी। एकल न्यायाधीश के इसी फैसले को चुनौती देते हुए इलैयाराजा ने डबल बेंच (खंडपीठ) के समक्ष अपील दायर की थी।

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अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

अदालत के सामने इलैयाराजा के पक्ष ने तर्क दिया कि चूंकि वे इस गाने के संगीतकार हैं, इसलिए वे ही इसके असली रचनाकार और मालिक हैं। उनके पास इस संगीत के किसी भी प्रकार के रूपांतरण (adaptation) या रीमेक की अनुमति देने का अनन्य (exclusive) अधिकार है। उनका यह भी तर्क था कि कॉपीराइट अधिनियम के तहत फिल्म के मूल निर्माता के पास संगीत को कहीं और इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि वह अधिकार हमेशा संगीतकार के पास ही रहता है। इसलिए सारेगामा इस गाने की साउंड रिकॉर्डिंग पर अपना दावा नहीं ठोक सकती।

इसके विपरीत, सारेगामा की ओर से दलील दी गई कि 1980 में फिल्म निर्माता ‘राजा सिने आर्ट्स’ के साथ हुए वैध अनुबंध के तहत वे कानूनी रूप से इस गाने की साउंड रिकॉर्डिंग के मालिक बन चुके हैं। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि इलैयाराजा इस गाने के लेखक (lyricist) नहीं थे, इसलिए वे इसके शब्दों या बोलों पर किसी भी अधिकार का दावा नहीं कर सकते।

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कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी और विश्लेषण

सिंगल जज के फैसले को सही ठहराते हुए खंडपीठ ने अपने फैसले की शुरुआत रचनात्मक कार्यों पर होने वाले कानूनी विवादों को लेकर एक बेहद दिलचस्प टिप्पणी से की:

“एक गाना सिर्फ एक गाना ही होता है, एक नीरस शाम को खुशनुमा बनाने वाली चीज। लेकिन यह तब तक ही रहता है जब तक कि वह अदालत में कॉपीराइट विवाद का विषय न बन जाए, जिसके बाद वह अचानक बहुत कुछ बन जाता है।”

अदालत ने गाने के विभिन्न अंगों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही इलैयाराजा के पास धुन को बदलने या रूपांतरित करने का अधिकार है, लेकिन गाने के शब्द (lyrics) उनके अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर हैं।

संगीतकार के कानूनी दायरे को तय करते हुए बेंच ने कहा:

“विवादित गीत के संगीत पर इलैयाराजा का कॉपीराइट सुरक्षित रहेगा… हालांकि, यह अधिकार केवल गाने के ‘म्यूजिकल कंपोनेंट’ यानी उस धुन तक ही सीमित है जिसके वे संगीतकार हैं। यह अधिकार गाने के शब्दों या उसकी फाइनल साउंड रिकॉर्डिंग पर लागू नहीं होता।”

अदालत ने अधिकारों के इस बंटवारे को और स्पष्ट करते हुए कहा:

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“इलैयाराजा केवल उस संगीत के उपयोग या रूपांतरण के लिए किसी तीसरे पक्ष के साथ अनुबंध करने के हकदार थे। लेकिन इस अधिकार का दायरा ऐसा नहीं हो सकता जिससे वे साउंड रिकॉर्डिंग या उसके बोलों पर अपना मालिकाना हक जता सकें। विवादित गीत की साउंड रिकॉर्डिंग का कॉपीराइट हमेशा फिल्म निर्माता (और समझौते के बाद सारेगामा) के पास रहेगा, जबकि इसके बोलों का अधिकार गीतकार के पास सुरक्षित रहेगा।”

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि सारेगामा वर्ष 1980 के समझौते के आधार पर ही “एन इनिया पोन निलावे” सहित फिल्म की सभी साउंड रिकॉर्डिंग्स की वैध मालिक बनी है।

अदालत ने फैसला सुनाया कि इलैयाराजा कानूनी रूप से वीएफआईएल (VFIL) को इस गाने की साउंड रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल का अधिकार नहीं सौंप सकते थे। इस प्रकार कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए एक बार फिर यह साफ कर दिया कि किसी भी गीत के मूल संगीत (स्कोर), उसके बोल (लिरिक्स) और उसकी अंतिम साउंड रिकॉर्डिंग के कॉपीराइट कानूनन अलग-अलग होते हैं।

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